परमेश्वर का स्वभाव के बारे में समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बातें क्या हैं?


प्रश्न: परमेश्वर का स्वभाव के बारे में समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बातें क्या हैं?

उत्तर:
परमेश्वर के स्वभाव का सबसे महत्वपूर्ण तत्व उसकी पवित्रता है। पवित्र का अर्थ है "अलग करना" से है, और परमेश्वर अपने स्वभाव और गुणों के आधार पर उसकी सृष्टि से स्पष्ट रूप से अलग है। पवित्रता परमेश्वर के चरित्र के अन्य सभी पहलुओं की नींव है। प्रकाशितवाक्य 15:4 परमेश्वर के बारे में कहते हैं, "केवल तू ही पवित्र है।" प्रकाशितवाक्य 4:8 उन चार जीवित प्राणियों का वर्णन करता है जो दिन-रात परमेश्वर के लिए गाते रहते हैं, "पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्‍वर, सर्वशक्‍तिमान, जो था और जो है और जो आनेवाला है।" यह परमेश्वर की पवित्रता है जो उसे "भस्म करने वाली आग" बनाती है जो सभी पापों का न्याय करेगी (इब्रानियों 12:29)। परमेश्‍वर की पवित्रता का महिमागान करते हुए सुन्दर स्तुति के वचन, पूरे भजन संहिता में पाए जाते हैं, जिसमें 99:9; भजन संहिता 33:21; भजन संहिता 77:13; भजन संहिता 89:18; भजन संहिता 105:3; और अन्य भी सम्मिलित हैं।

यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर एक शाश्वत आत्मा है (यूहन्ना 4:24)। वह एक परमेश्वर है (व्यवस्थाविवरण 6:4), जो सदैव तीन भिन्न व्यक्तियों: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रूप में अस्तित्व में रहा है। उसके पास एक भौतिक शरीर नहीं है (यद्यपि पुत्र का देहधारण हुआ)। वह धर्मसिद्धान्त झूठा होता है, जो त्रिएकत्व इन्कार करता है, परमेश्वर पिता को एक मनुष्य के रूप में देखता है, या मसीह की मनुष्यत्व और ईश्वरत्व को नकार देता है (2 यूहन्ना 1:7 को देखें)।

परमेश्वर भी, अपने स्वभाव से, प्रभुता सम्पन्न है। वह किसी के द्वारा नहीं देखा जाता है और पूरे ब्रह्माण्ड और उसमें पाए जाने वाले सब कुछ के ऊपर उसका पूर्ण अधिकार है। उसकी सम्प्रभुता कई तरह से व्यक्त की जाती है, जिसमें उसका सर्वशक्तिमान होना भी सम्मिलित है। उसके सभी तरीके सही हैं (भजन संहिता 145:17), और चाहे मनुष्य यह विश्वास करे या नहीं कि परमेश्वर के तरीके "निष्पक्ष" हैं, उसके लिए अप्रासंगिक है। प्रभु परमेश्वर समय या स्थान की सीमा से बाध्य नहीं हैं। उसके पास एक योजना है, यह उसके पास अनन्त काल से है, और उसका उद्देश्य पूरा होगा (दानिय्येल 4:37; भजन संहिता 115:3)।

परमेश्वर के स्वभाव का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू उसकी अपरिवर्तनीयता है। वह नहीं बदलता, वह "आज, कल और युगानुयुग" एक ही सा रहता है (इब्रानियों 13:8)। वह मलाकी 3:6 में स्पष्ट रूप से कहता है कि, "मैं यहोवा बदलता नहीं।" उसके अपरिवर्तनीय स्वभाव के कारण, हम उसकी आशीष के ऊपर निर्भर हो सकते हैं: "एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है" (याकूब 1:17)।

सर्वशक्तिमान की सम्प्रभुता जो कुछ भी वह चाहती है, उसे करने के लिए उसके अधिकार के प्रति बात करती है, और उसकी सर्वशक्तिमानता उसके ऐसा करने की क्षमता के लिए बात करती है। वह सब कुछ जानता है, अनादि से लेकर अनन्त काल तक का भविष्य, वह सब कुछ जो हम सोचते हैं, करते हैं, और कहते हैं। उसके पास प्रत्येक उस व्यक्ति का व्यक्तिगत् ज्ञान है जो कभी रहा है या जीवित रहेगा, वह उन्हें प्रत्येक तरह से गहनता से जानना है। यिर्मयाह 1:5 में परमेश्वर के वचनों को सुनना उत्साहजनक है, "गर्भ में रचने से पहले ही मैं ने तुझ पर चित्त लगाया, और उत्पन्न होने से पहले ही मैं ने तेरा अभिषेक किया।"

हमें परमेश्वर के क्रोध की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जो उसकी पवित्रता से बहता है। उसके पास पाप के विरुद्ध धार्मिकता से भरा हुआ क्रोध है (भजन संहिता 7:11), और परमेश्वर के निकट में घटित होने वाले न्याय के कारण, मानव जाति को अनुग्रह और उद्धार के सुसमाचार सन्देश की आवश्यकता है। यह प्रेम करने के लिए परमेश्वर का स्वभाव है (1 यूहन्ना 4:16), और संसार के लिए उसके प्रेम में, उसने हमें छुड़ाने के लिए अपना एकमात्र पुत्र, यीशु मसीह भेजा (यूहन्ना 3:16)। इसके लिए एक आदर्श बलिदान से कम कुछ और काम नहीं करेगा।

प्रेम परमेश्वर के एक गुण से कहीं अधिक बढ़कर है; वही शाब्दिक प्रेम का सार है। यह 1 यूहन्ना 4:8 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, "जो प्रेम नहीं रखता वह परमेश्‍वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्‍वर प्रेम है।" परमेश्वर का प्रेम शाश्वत है। क्योंकि वह अपरिवर्तनीय है, उसका प्रेम कभी नहीं बदलता है। उनका प्रेम परिपूर्ण और पवित्र है।

"क्योंकि मैं निश्‍चय जानता हूँ कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्‍टि हमें परमेश्‍वर के प्रेम से जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी" (रोमियों 8:38-39)।

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