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प्रश्न

परमेश्‍वर के अस्तित्व के लिए नैतिक तर्क क्या है?

उत्तर


नैतिक तर्क या दलील इस तथ्य से आरम्भ होता है कि सभी लोग कुछ नैतिक संहिता को पहचानते हैं (कि कुछ बातें सही हैं, और कुछ बातें गलत हैं)। प्रत्येक बार जब हम सही और गलत के ऊपर वाद विवाद करते हैं, तो हम एक उच्च कानून को मानने की ओर अपील करते हैं, जिसके लिए हम मानते हैं कि सभी इसे जानते हैं, उसका पालन करते हैं, और मनमाने तरीके से इसे परिवर्तित करने के लिए स्वतन्त्र नहीं है। सही और गलत एक उच्च माप दण्ड या व्यवस्था के तात्पर्य को देता है, और कानून को दिए जाने के लिए एक कानून देने वाले की आवश्यकता होती है। क्योंकि नैतिक कानून मनुष्य से श्रेष्ठ होता है, इसलिए इस सार्वभौमिक कानून को दिए जाने के लिए सार्वभौमिक कानूनदाता की आवश्यकता होती है। तर्क यह दिया जाता है कि, यह कानूनदाता परमेश्‍वर है।

नैतिक तर्क के समर्थन में, हम देखते हैं कि सबसे दूरस्थ जनजातियों के पास भी जो सभ्य सभ्यता से दूर हो चुकी हैं, सभों की जैसी नैतिक संहिता दिखाई देती हैं। यद्यपि मतभेद निश्‍चित रूप से नागरिक विषयों में विद्यमान हैं, साहस और निष्ठा और लोभ और कायरता जैसे गुण सार्वभौमिक रीति से ही पाए जाते हैं। यदि लोग उस नैतिक संहिता के प्रति उत्तरदायी थे, तो यह उतने ही भिन्न होंगे जितने कि लोगों ने आविष्कार किए हैं। इसके अतिरिक्त, यह केवल इस बात के वर्णन का ही लिपिबद्ध किया जाना नहीं है कि मनुष्य क्या करता है — कदाचित् ही लोग अपनी नैतिक संहिता की सीमा तक जीवन यापन करते रहे हैं। तो फिर, हम इन विचारों को कहाँ से प्राप्त करते हैं कि क्या किया जाना चाहिए? रोमियों 2:14-15 कहता है कि नैतिक कानून (या विवेक) मनुष्य के ऊपर कानून को देने वाले अन्तिम कानूनदाता से आता है। यदि यह सत्य है, तो जो कुछ भी हमने देखा है, उसे सटीकता से वैसे ही पाने की अपेक्षा करें जैसा कि हमने पालन किया था। कानून या व्यवस्था देने वाला यह तत्व परमेश्‍वर है।

इसे नकारात्मक रूप से बोलना, नास्तिकवाद नैतिकता के लिए किसी आधार को प्रदान नहीं करता है और जीवन के लिए कोई अर्थ नहीं देता है। यद्यपि यह स्वयं में नास्तिकवाद को अस्वीकार नहीं करता है, यदि एक विश्‍वास पद्धति की तार्किक पूर्णता उस बात को बताने में असफल हो जाती है, जिसे हम सहज ज्ञान से जानते हैं, तो इसे त्याग दिया जाना चाहिए। परमेश्‍वर के बिना नैतिकता, जीवन, और इसे जीने के तर्क का कोई आधार ही नहीं है। तौभी ये सभी बातें विद्यमान हैं, और इसी तरह परमेश्‍वर भी हैं। इस प्रकार, यह परमेश्‍वर के अस्तित्व के लिए नैतिक तर्क है।

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परमेश्‍वर के अस्तित्व के लिए नैतिक तर्क क्या है?
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