क्या बाइबल मन का नियन्त्रण करती है?


प्रश्न: क्या बाइबल मन का नियन्त्रण करती है?

उत्तर:
कुछ लोग बाइबल को मन-का-नियन्त्रण करने वाले हथियार के रूप में उपयोग किए जाने का आरोप लगाते हैं। एक कलीसिया को निर्मित करने और सदस्यों को इसमें बनाए रखने के लिए एकमात्र तरीका, वे कहते हैं कि, लोगों की जीवनशैली और व्यावहारिक परिवर्तनों में जबरदस्ती मत परिवर्तन करने के लिए मन की रणनीतियों का उपयोग करना होता है। यह आरोप आधारहीन है, परन्तु जो लोग पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को नहीं जानते हैं, उन्हें लोगों के जीवन में परिवर्तन की व्याख्या करने के लिए कुछ तरीके चाहिए।

यद्यपि यह सच है कि ऐसे सम्प्रदाय, जिनमें से कई लोग मसीही होने का दावा करते हैं, मन को नियन्त्रण करने के अभ्यास के रूप में कार्य करते हैं, सच्चा मसीही विश्‍वास किसी भी तरह से कोई जबरदस्ती नहीं करता है। पास्टर जो परमेश्‍वर से प्रेम करते हैं, अपनी मण्डलियों को पोषित करने, सुधारने और उनकी रक्षा करने की इच्छा रखते हैं (यूहन्ना 21:15-19)। कलीसिया के अगुवों को व्यक्तिगत् लाभ के बारे में न सोचते हुए, निःस्वार्थ और नम्रता के साथ सेवा करनी होती है (1 पतरस 5:2-3)। इस कारण, नहीं, बाइबल मन का नियन्त्रण नहीं करती है, और यह मनोवैज्ञानिक कार्यक्रम या मन को जबरदस्ती परिवर्तित कर दिए जाने के लिए मन का नियन्त्रण करने की वकालत भी नहीं करती है।

यद्यपि, बाइबल एक व्यक्ति के मन को नियन्त्रित करने की बात अवश्य करती है। पश्‍चाताप में मन में परिवर्तन सम्मिलित है। मसीहियों को "[अपने] मन के आत्मिक स्वभाव को नया बनाना" है (इफिसियों 4:23)। उन्हें एक मन का होना चाहिए, ताकि झगड़े से बचा जाए (फिलिप्पियों 2:2)। उन्हें मसीह का मन दिया गया है (1 कुरिन्थियों 2:16)। इसका परिणाम एक नया बर्ताव और नया व्यवहार होता है — वास्तव में वह एक पूरी रीति से नई सृष्टि होता है (2 कुरिन्थियों 5:17)। परिवर्तन एक गुरु की निर्णायक योजना या सावधानीपूर्वक नियन्त्रित वातावरण के कारण नहीं है; परिवर्तन आन्तरिक, आत्मिक, और वास्तविक होता है। यह पवित्र आत्मा के काम के कारण होता है, मानव मध्यस्थक के द्वारा नहीं (तीतुस 3:5)।

मनुष्य के पास आदम से विरासत में मिला पापी स्वभाव है (रोमियों 5:12)। उस पापी स्वभाव का एक व्यक्ति के ऊपर नियन्त्रण होता है और वही विभिन्न पापों को एक व्यक्ति के जीवन में प्रकट करने का कारण बनता है (गलतियों 5:17-21; इफिसियों 5:17-19)। उस पापी स्वभाव से नियन्त्रित, मनुष्य किसी भी तरह से परमेश्‍वर को नहीं जान सकता और परमेश्‍वर को प्रसन्न नहीं कर सकता है। वास्तव में, वह परमेश्‍वर का शत्रु है (रोमियों 5:10; 8:5-7)। बाइबल कहती है कि पापी, जो अपने पापी स्वभाव से नियन्त्रित होता है, को पाप की सामर्थ्य से छुटकारा पाते हुए नए स्वभाव और उद्धार की आवश्यकता होती है। वह व्यक्ति जो व्यक्तिगत् उद्धारकर्ता के रूप में यीशु मसीह को स्वीकार करता है, नए स्वभाव को प्राप्त करता है (2 पतरस 1:4), और पवित्र आत्मा उसमें वास करने लगता है, जो विश्‍वास करने वाले को पाप "नहीं" करने के लिए और परमेश्‍वर की धार्मिकता के प्रति "हाँ" कहने की सामर्थ्य देता है (गलतियों 5:16; रोमियों 6:12-23)। मसीह में एक विश्‍वासी स्वतन्त्र किया गया है (यूहन्ना 8:32)। वह अब पापी स्वभाव के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है, क्योंकि उसके पास मसीह में स्वतन्त्रता है, ताकि वह वही कर सके जिसे परमेश्‍वर चाहता है और अपने जीवन में उसकी महिमा करे।

बाइबल मन का नियन्त्रण नहीं करती है। इसकी अपेक्षा, बाइबल पाप द्वारा नियन्त्रित जीवन के लिए एक विकल्प प्रदान करती है। बाइबल हमें दिखाती है कि कैसे आत्म-नियन्त्रित होना चाहिए। हाँ, एक विश्‍वासी के पास मन में परिवर्तन होगा, क्योंकि वह उन झूठों को अस्वीकार करता है, जिन पर उस ने एक बार विश्‍वास किया था और मसीह में पाए जाने वाले सत्य को अपना लेता है। आत्मा से भरे-हुए विश्‍वासी के पास परमेश्‍वर के साथ यापन करने वाले रोमांचकारी जीवन होगा – यह जीवन उत्साह, अनन्तकालीन पूर्ति और आशा के साथ परमेश्‍वर की सेवा करने के लिए स्वतन्त्र होगा।

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