परमेश्‍वर का जन होने का क्या अर्थ है?


प्रश्न: परमेश्‍वर का जन होने का क्या अर्थ है?

उत्तर:
"परमेश्‍वर का जन" एक ऐसे व्यक्ति के लिए दिया गया वर्णन है, जो हर तरह से परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन करता है, जो उसके आदेशों का पालन आनन्द से करता है, जो इस जीवन की बातों के लिए जीवन व्यतीत नहीं करता है, अपितु अनन्त काल की बातों के लिए जीवन व्यतीत करता है, जो स्वेच्छा से सभी संसाधनों के साथ परमेश्‍वर की सेवा स्वतन्त्रता से करने के लिए स्वयं को दे देता है, और जो दु:ख को स्वीकार करता है, ऐसा दु:ख जो आनन्द के साथ उसके विश्‍वास के परिणामस्वरूप आता है। कदाचित् मीका 6:8 परमेश्‍वर के जन के सार को एक स्पष्ट वचन में बताता है: "हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्‍वर के साथ नम्रता से चले?"

परमेश्‍वर का जन अपने कार्यस्थल पर कार्य के समय में काम न करके या कार्यस्थल पर कार्य के लिए समय पर न पहुँच कर, या दिए हुए कार्य को न करने जैसी बातों में भाग न लेते हुए अपने नियोक्ता को ठगता या धोखा नहीं देता है; वह व्यर्थ की बातों की निन्दा नहीं करता है; वह संसार की गन्दगी से अपनी आँखों और कानों की रक्षा करके अपने मन और हृदय को शुद्ध रखता है। यदि वह अविवाहित है, तो वह शुद्ध रहेगा और केवल एक मसीही स्त्री से ही विवाह करेगा (2 कुरिन्थियों 6:14)। यदि वह विवाहित है, तो वह अपनी पत्नी से प्रेम करेगा, उसका सम्मान करेगा और उसकी देखभाल करेगा और घर का मुखिया होगा (इफिसियों 5:22-24, 33)। वह सांसारिक मूल्यों को स्वीकार नहीं करता है, परन्तु बुद्धिमान और अच्छा क्या है, को देखने के लिए परमेश्‍वर के वचन में देखता है। वह उन लोगों के ऊपर ध्यान देना है, जो "वंचित" हैं या जिन्हें समाज के द्वारा त्याग दिया गया है, जो अकेले हैं या जो निराशा में हैं; वह अन्य लोगों की समस्याओं को सुनता और उन पर दोष नहीं लगाता है।

इन सब बातों से अधिक, परमेश्‍वर का जन समझता है कि जब हमारे प्रभु ने उसे आदेश दिया है कि "तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है" (मत्ती 5:48), तो वह इसे इसलिए पूरा करने में सक्षम है, क्योंकि परमेश्‍वर उसे अपनी दृष्टि में "पवित्र और निर्दोष" (इफिसियों 1:4) उसकी सामर्थ्य और अपने आत्मा को उसके भीतर वास करने के द्वारा किया है। अपने स्वयं में, हम पवित्रता और पूर्णता के सक्षम नहीं हैं, परन्तु मसीह के द्वारा जो हमें सामर्थ्य देता है, हम "सब कुछ कर सकते हैं" (फिलिप्पियों 4:13)। परमेश्‍वर के जन को पता है कि उनका नया स्वभाव मसीह की धार्मिकता है, जो क्रूस के ऊपर हमारे पापी स्वभाव के साथ परिवर्तित किया गया था (2 कुरिन्थियों 5:17; फिलिप्पियों 3:9)। अन्तिम परिणाम यह है कि वह परमेश्‍वर के साथ नम्रता के साथ चलता है, यह जानते हुए कि उसे परमेश्‍वर के ऊपर पूर्णता के जीवन को यापन करने और अन्त तक दृढ़ बने रहने में सक्षम होने के लिए पूरी तरह से भरोसा करना चाहिए।

यही सब कुछ एक सरल धर्म के विषय में होता है: संकट में पड़े हुओं लोगों की सहायता करना और स्वयं को संसार से प्रदूषित होने से बचाना (याकूब 1:27)। हम सभी बाइबल के धर्मसिद्धान्तों के बारे में जागरूक हो सकते हैं, हम सभी धर्मवैज्ञानिक शब्दावलियों को जान सकते हैं, हम मूल यूनानी भाषा से बाइबल का अनुवाद करने में और ऐसी ही अन्य बातों के विषयों में सक्षम हो सकते हैं, परन्तु मीका 6:8 ही वह सिद्धान्त है, जिसका पालन परमेश्‍वर के जन को करना चाहिए: अर्थात् न्याय से काम करना, कृपा से प्रीति रखना, और परमेश्‍वर के साथ नम्रता से चलना।

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परमेश्‍वर का जन होने का क्या अर्थ है?