क्यों दूसरों को प्रेम करना अक्सर इतना अधिक कठिन होता?


प्रश्न: क्यों दूसरों को प्रेम करना अक्सर इतना अधिक कठिन होता?

उत्तर:
दूसरों को प्रेम करना कई बार कठिन हो सकता है। उन लोगों को सन्दर्भित करने के लिए एक सामान्य वाक्यांश "अतिरिक्त अनुग्रह की आवश्यकता वाले लोग" है, जिनके लिए हम स्वयं को निरन्तर प्रेम करने की चुनौती में पाते हैं। परन्तु यहाँ तक कि जिन लोगों को हम सामान्य रूप से पसन्द करते हैं, उन्हें भी कई बार प्रेम करना कठिन हो सकता है। दूसरों से प्रेम करने की कठिनाइयों में पड़ने का मुख्य कारण पाप है, दोनों अर्थात् हमारे जानने वालों और उन लोगों में से जिन्हें हम प्रेम करने का प्रयास करते हैं। मनुष्य पाप में पतित प्राणी है। परमेश्‍वर और उसकी सामर्थ्य के अतिरिक्त, हम स्वार्थी हैं, और स्वयं को प्रेम करना दूसरों से प्रेम करने की तुलना में हमारे लिए अधिक स्वाभाविक रूप से आता है। परन्तु प्रेम स्वार्थी नहीं है; यह दूसरों के लिए सर्वश्रेष्ठ बात की खोज करता है (1 कुरिन्थियों 13:5; फिलिप्पियों 2:3)। अपने स्वयं के स्वार्थ और पापी प्रवृत्तियों और दूसरों के स्वार्थ और उनकी पापी प्रवृत्तियों से निपटने के लिए प्रेम बहुत अधिक परेशान हो सकता है।

दूसरों के साथ प्रेम करना हमारे लिए एक और कारण से कठिन हो सकता है, जिसे हम कई बार गलत समझते हैं कि सच्चा प्रेम क्या है। हम मुख्य रूप से भावनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में प्रेम के बारे में सोचते हैं। समस्या यह है कि हम सदैव अपनी भावनाओं को नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। भावनाओं के कारण हम जो कुछ भी करते हैं, उसे हम निश्‍चित रूप से नियन्त्रित कर सकते हैं, परन्तु प्रायः भावनाएँ स्वयं ऐसे ही घटित हो जाती हैं। परन्तु जिस तरह के प्रेम से दूसरों को प्रेम करने के लिए परमेश्‍वर हमें बुलाता है, वह उसी तरह का प्रेम है, जो उसके पास हमारे लिए है। यह अगापे प्रेम है, जिसका सार बलिदान है। हमारे लिए परमेश्‍वर का प्रेम एक बलिदानात्मक प्रेम है, यह ऐसा है कि जिसमें होकर उसने हमारे पापों के लिए अपने पुत्र को क्रूस के ऊपर मरने के लिए भेज दिया। उसने हमें इसलिए नहीं बचाया क्योंकि हम प्रेम किए जाने के योग्य थे; उसने हमें इसलिए बचाया क्योंकि उसका प्रेम हमारे लिए उसके बलिदान का कारण बन गया। क्या हम दूसरों के लिए बलिदान देने के लिए पर्याप्त प्रेम करते हैं, चाहे वे प्रेम किए जाने के योग्य भी क्यों न हों? दूसरों को प्रेम करना भावनाओं का नहीं, अपितु इच्छाओं का विषय है।

अपने पापों के मध्य में, जब हम पूरी तरह से प्रेम न किए जाने के योग्य थे (रोमियों 5:8; यूहन्ना 15:13) तब प्रभु हमारे लिए सबसे बुरी मृत्यु से मरा। जब हम किसी से प्रेम करने के लिए बलिदान करते हैं, तब हमें हमारे लिए परमेश्‍वर के प्रेम की गहराई की झलक मिलती है, और हम उसे इस संसार को भी प्रतिबिम्बित करते हैं। यीशु ने अपने चेलों से कहा, "मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो; जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो" (यूहन्ना 13:34–35)। ध्यान दें कि उसने यह नहीं कहा, "एक दूसरे के लिए प्रेम को महसूस करें।" उसने कहा, "एक दूसरे से प्रेम करो।" उसने एक भावना का नहीं, अपितु गतिविधि को किए जाने का आदेश दिया।

दूसरों से प्रेम करना कठिनाई का एक भाग यह है कि हम अक्सर इसे स्वयं से ही करने का प्रयास करते हुए, प्रेम की भावनाओं को उस ओर झुका देते हैं, जहाँ कुछ भी विद्यमान नहीं होता है। यह प्रेम किए जाने व्यक्ति के प्रति पाखण्ड और "कृत्रिम व्यवहार" के दिखावे की ओर अगुवाई कर सकता है, जबकि वास्तव में हमारे मन उसकी ओर ठण्डे ही रहते हैं। हमें समझना चाहिए कि हम परमेश्‍वर से अलग नहीं हो सकते हैं। यह तब घटित होता है, जब हम यीशु में रहते हैं (यूहन्ना 15) और पवित्र आत्मा हमारे भीतर वास करता रहता है, जिस से हमें प्रेम के फल को उत्पन्न करने में सक्षम होना है (गलातियों 5:22-23)। हमें बताया गया है कि परमेश्‍वर प्रेम है और एक दूसरे के लिए हमारा प्रेम दोनों परमेश्‍वर के द्वारा सक्षम किया गया है और हम में उसके प्रेम की एक प्रतिक्रिया है (1 यूहन्ना 4:7-12)। हमारे लिए परमेश्‍वर के ऊपर भरोसा करना और स्वयं को उसके प्रति समर्पित करना कठिन हो सकता है, परन्तु वह इस कठिनाई को भी आने की अनुमति देता है, ताकि उसकी महिमा को और भी अधिक देखा जा सके। जब हम कठिन लोगों से प्रेम करते हैं या जब हम ऐसा महसूस नहीं करते हैं, तब भी प्रेम करना चुनते हैं, तो हम परमेश्‍वर के ऊपर निर्भरता को प्रदर्शित करते हैं, और तब वह उसकी सामर्थ्य को हम में और हमारे द्वारा प्रदर्शित करने की अनुमति देता है।

दूसरों को प्रेम करना इसलिए कठिन है, क्योंकि वे मनुष्य हैं, और हम भी मनुष्य हैं। परन्तु इस कठिनाई में हम स्वयं के लिए परमेश्‍वर के प्रेम के गुण की सर्वोत्तम रीति से सराहना करने लगते हैं। और जब हम दूसरों को प्रेम की कमी के पश्‍चात् भी प्रेम करते हैं, तो परमेश्‍वर की आत्मा चमकता है, उसे महिमा मिलती है, दूसरों की आत्मिक उन्नति होती है, और संसार हमारे भीतर मसीह को देखती है।

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