क्या हमें पापियों से प्रेम करना परन्तु पाप से घृणा करनी चाहिए?



प्रश्न: क्या हमें पापियों से प्रेम करना परन्तु पाप से घृणा करनी चाहिए?

उत्तर:
बहुत से मसीही विश्‍वासी चलन से बाहर हुए इस मुहावरे "पापियों से प्रेम करो, पाप से घृणा करो" का उपयोग करते हैं। तथापि, हमें यह जान लेना चाहिए कि यह हम अपूर्ण मनुष्यों के लिए दिया हुआ एक उपदेश है। परमेश्‍वर और हमारे मध्य में प्रेम करने और घृणा करने के संदर्भ में एक बहुत विशाल अन्तर है। यहाँ तक कि मसीही विश्‍वासी होने पर भी, हम हमारी मानवता में अपूर्ण ही रहते हैं, और सिद्ध रीति से प्रेम नहीं कर पाते हैं, न ही हम सिद्ध रीति से घृणा (दूसरे शब्दों में, बिना किसी द्वेष के) कर सकते हैं। परन्तु परमेश्‍वर इन दोनों को सिद्धता के साथ कर सकता है, क्योंकि वह परमेश्‍वर है। परमेश्‍वर बिना किसी पाप से भरी हुई मंशा के घृणा कर सकता है। इसलिए, वह पाप और पापियों से सिद्ध पवित्र तरीके से घृणा कर सकता है और फिर भी पापी व्यक्ति के द्वारा किए जाने वाले पश्चाताप और विश्‍वास के क्षण में ही उसे प्रेम से भरी क्षमा भी प्रदान कर सकता है (मलाकी 1:3; प्रकाशितवाक्य 2:6; 2 पतरस 3:9)।

बाइबल बड़ी स्पष्टता के साथ शिक्षा देती है, कि परमेश्‍वर प्रेम है। पहला यूहन्ना 4:8-9 कहता है, "जो प्रेम नहीं रखता वह परमेश्‍वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्‍वर प्रेम है। जो प्रेम परमेश्‍वर हम से रखता है, वह इस से प्रगट हुआ कि परमेश्‍वर ने अपने एकलौते पुत्र को जगत में भेजा है, कि हम उसके द्वारा जीवन पाएँ।" यह तथ्य रहस्यमय तो है तथापि सत्य है, कि परमेश्‍वर सिद्धता के साथ एक ही समय में एक व्यक्ति को प्रेम और घृणा दोनों ही कर सकता है। इसका अर्थ यह हुआ, कि वह एक व्यक्ति को इसलिए प्रेम कर सकता है, क्योंकि उसने उसकी रचना की है और वह उसे छुटकारा दे सकता है, साथ ही साथ वह उसे उसके अविश्‍वास और पाप से भरी हुई जीवनशैली के कारण घृणा कर सकता है। हम, अपूर्ण मनुष्य होने के नाते, यह नहीं कर सकते हैं; इस कारण, हमें स्वयं को "पापियों से प्रेम करो, पाप से घृणा करो" की उक्ति को स्मरण दिलाना चाहिए।

यह वास्तव में किस प्रकार कार्य करता है? हम पाप से घृणा इसमें न भाग लेने और जब हम इसे देखते हैं, तब इसकी निन्दा करने के द्वारा करते हैं। पाप के प्रति घृणा की जानी चाहिए, न कि इसके लिए बहाना बनाना या इसे हल्के में लेना चाहिए। हम पापियों को विश्‍वासयोग्यता के साथ उस क्षमा की गवाही देते हुए प्रेम करते हैं, जो यीशु मसीह के द्वारा उपलब्ध है। प्रेम का एक सच्चा कार्य किसी के प्रति सम्मान और दयालुता से भरा हुआ व्यवहार है, यद्यपि वह जानता/ जानती है, कि आप उसकी जीवनशैली और/या उसके निर्णयों को स्वीकृत नहीं करते हैं। ऐसा प्रेम करना किसी व्यक्ति को पाप में फँसे रहने के लिए नहीं है। एक पुरूष/स्त्री को यह बताना घृणा से भरी हुई बात नहीं है, कि वह पाप में पड़ा/पड़ी हुई है। सच्चाई तो यह है, कि इसके ठीक विपरीत बात सत्य है। हम पापियों को प्रेम में सत्य बोलने के द्वारा प्रेम करते हैं। हम पाप की निन्दा करने, इसे अनदेखा करने या इसके प्रति बहाना बनाने से इन्कार करते हुए पाप से घृणा करते हैं।



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