हमें मूसा के जीवन से क्या सीखना चाहिए?


प्रश्न: हमें मूसा के जीवन से क्या सीखना चाहिए?

उत्तर:
मूसा पुराने नियम में सबसे मुख्य पात्रों में से एक है। जबकि अब्राहम को "विश्‍वासियों का पिता" और उसके लोगों के लिए परमेश्‍वर की बिना शर्त वाली अनुग्रह की वाचा का प्राप्तकर्ता कहा जाता है, मूसा परमेश्‍वर के लोगों के लिए छुटकारा लाने के लिए चुना गया व्यक्ति था। परमेश्‍वर ने विशेष रूप से मिस्र को इस्राएल की बन्धुवाई से छुटकारा देते हुए प्रतिज्ञा की हुई के लिए इस्राएल को नेतृत्व प्रदान करने के लिए चुना था। मूसा को पुरानी वाचा के मध्यस्थक के रूप में भी जाना जाता है और उसे सामान्य रूप से व्यवस्था को प्रदान करने वाले के रूप में भी उद्धृत किया जाता है। अन्त में, मूसा पंचग्रन्थ का मुख्य लेखक है, जो कि सम्पूर्ण बाइबल के लिए नींव की पुस्तकों के रूप में कार्य करती है। पुराने नियम में मूसा की भूमिका नए नियम में यीशु की भूमिका की छाया और प्रकार है। इस कारण, उसका जीवन निश्‍चित रूप से जाँच किए जाने योग्य है।

निर्गमन की पुस्तक के आरम्भिक अध्यायों में हम सबसे पहले मूसा से मिलते हैं। अध्याय 1 में, हम पाते हैं कि, कुलपति यूसुफ ने अपने परिवार को बड़े अकाल से बचाया और उन्हें गोशेन (मिस्र में) की भूमि में बसने दिया, अब्राहम के वंशज की कई पीढ़ियाँ शान्ति के साथ वास करती रहीं, जब तक मिस्र में एक नया शासक फिरौन नहीं आ गया, जो “यूसुफ को नहीं जानता था” (निर्गमन 1:8)। इस फिरौन ने इब्री लोगों को अपने अधीन कर लिया और उन्हें अपनी विशाल निर्माण परियोजनाओं के लिए गुलामों के रूप में उपयोग किया। क्योंकि परमेश्‍वर ने तेजी से गिनती में बढ़ने के लिए इब्रानी लोगों को आशीर्वाद दिया, मिस्रियों को अपनी भूमि में रहने वाले यहूदियों की बढ़ती हुई गिनती से डर लगने लगा। इसलिए, फिरौन ने इब्री स्त्रियों से जन्म लेने वाले नर बच्चों को मार दिए जाने का आदेश दिया (निर्गमन 1:22)।

निर्गमन अध्याय 2 में, हम देखते हैं कि मूसा की माँ अपने बच्चे को टोकरी में रखकर और नील नदी में डालकर उसे बचाने का प्रयास करती है। टोकरी अन्ततः फिरौन की पुत्री को मिल जाती है, और वह उसे अपना बनाते हुए गोद ले लेती है और उसका पालन पोषण फिरौन के महल में किया जाता है। जब मूसा वयस्क हो जाता है, वह अपने लोगों की दुर्दशा के साथ सहानुभूति दिखाना आरम्भ कर देता है, और एक मिस्री को एक इब्री दास को मारते हुए देखने पर हस्तक्षेप करते हुए मार डालता है। एक अन्य घटना में, मूसा ने दो इब्रियों के मध्य में हो रहे विवाद को सुलझाने में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया, परन्तु इब्रियों में से एक ने मूसा को फटकार लगाते हुए और व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि, "जिस भाँति तू ने मिस्री को घात किया, क्या उसी भाँति तू मुझे भी घात करना चाहता है?" (निर्गमन 2:14)। यह जानते हुए कि उसकी आपराधिक गतिविधि सार्वजनिक हो गई है, मूसा मिद्यान की भूमि पर भाग गया, जहाँ उसने फिर से हस्तक्षेप किया - इस बार यित्रो की पुत्रियों को कुछ लुटेरों से बचाया। कृतज्ञता में, यित्रो (जिसे रूएल भी कहा जाता है) ने अपनी पुत्री सिप्पोरा को विवाह में मूसा को दे दिया (निर्गमन 2:15–21)। मूसा लगभग चालीस वर्षों तक मिद्यान में रहा।

मूसा के जीवन की अगली मुख्य घटना परमेश्‍वर के साथ जलती हुई झाड़ी में मुलाकात करने में पाई जाती है (निर्गमन 3–4), जहाँ परमेश्‍वर ने मूसा को उसके लोगों का उद्धारकर्ता होने के लिए कहा। अपने आरम्भिक बहानों को बनाने और बिल्कुल सीधे तरीके से मना करने के पश्‍चात् भी कि परमेश्‍वर उसके स्थान पर किसी और को भेज दे, मूसा ने परमेश्‍वर की आज्ञा पालन करने में अपनी सहमति व्यक्त की। परमेश्‍वर ने हारून, मूसा के भाई, को उसके साथ भेजने का प्रतिज्ञा की। शेष कहानी एक बड़ी सीमा में परियों की कथा जैसी प्रतीत होती है। मूसा और उसका भाई, हारून, परमेश्‍वर के नाम में फिरौन के पास जाते हैं और माँग करते हैं कि वह लोगों को उनके परमेश्‍वर की आराधना करने के लिए जाने दे। फिरौन हठ करते हुए इन्कार कर देता है, और परमेश्‍वर का न्याय दस विपत्तियाँ के रूप में लोगों और भूमि के ऊपर आ पड़ता है, अन्तिम विपत्ति में पहिलौठों की मृत्यु होती है। इस अन्तिम विपत्ति से पहले, परमेश्‍वर मूसा को फसह की स्थापना करने की आज्ञा देता है, जो कि मिस्र में उसके लोगों को बन्धन से छुड़ाने में परमेश्‍वर के छुटकारे की गतिविधि का स्मारक है।

निर्वासन के पश्‍चात्, मूसा लोगों को लाल सागर के किनारे पर ले जाया, जहाँ परमेश्‍वर ने पानी को दो भागों में बाँटने और इब्रियों को इसमें से पार हो जाने और मिस्र की सेना को डूबने की अनुमति देते हुए आर्श्चकर्म को प्रगट किया (निर्गमन 14)। मूसा लोगों को सीनै पर्वत की तराई पर ले आया जहाँ व्यवस्था और परमेश्‍वर और इस्राएल के मध्य नवगठित राष्ट्र के रूप में पुरानी स्थापित वाचा को प्रदान किया गया (निर्गमन 19-24)।

निर्गमन की शेष पुस्तक और लैव्यव्यवस्था की पूरी पुस्तक तब घटित होती है, जब इस्राएली सीनै की तराई में छावनी डाले हुए होते हैं। परमेश्‍वर ने मूसा को मिलाप वाले तम्बू का निर्माण करने - जो कि यात्रा में साथ चलने वाला एक तम्बू था, जिसे आसानी से इकट्ठा किया जा सकता और कहीं भी ले जाया जा सकता था – और आराधना के लिए बर्तनों, और याजकीय वस्त्रों को बनाने के लिए विस्तृत निर्देश दिए और वाचा का सन्दूक उसके लोगों के मध्य में परमेश्‍वर की उपस्थिति का प्रतीक और साथ ही साथ ऐसा स्थान था, जहाँ पर महायाजक प्रति वर्ष प्रायश्‍चित के कार्य को पूरा करेगा। परमेश्‍वर ने मूसा को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि परमेश्‍वर की आराधना कैसे की जानी चाहिए और लोगों के मध्य शुद्धता और पवित्रता को बनाए रखने के लिए दिशा निर्देश दिए गए। गिनती की पुस्तक इस्राएलियों को सीनै से प्रतिज्ञा की गई भूमि के किनारे तक पहुँचते हुए देखती है, परन्तु जब बारहों में से दस जासूस इस्राएल की भूमि को अपने अधीन करने की अपनी क्षमता के बारे में एक बुरी रिपोर्ट को प्रस्तुत करते हैं, तब वे इसमें जाने से मना कर देते हैं। परमेश्‍वर यहूदियों की इस पीढ़ी को उनकी अवज्ञा के लिए जंगल में ही मरने के लिए ठहरा देता है और उन्हें जंगल में ही चालीस वर्षों तक भटकने देता है। गिनती की पुस्तक के अन्त में, इस्राएलियों की अगली पीढ़ी प्रतिज्ञा किए गए देश की सीमाओं के ऊपर खड़ी मिलती है और परमेश्‍वर के ऊपर भरोसा करने और इस भूमि को विश्‍वास के द्वारा ले लेने के लिए तैयार है।

व्यवस्था विवरण की पुस्तक मूसा के द्वारा लोगों को परमेश्‍वर की बचाने वाली सामर्थ्य और विश्‍वासयोग्यता का स्मरण दिलाते हुए लोगों को कई प्रकार के उपदेशों को देती हुई दिखाती है। वह व्यवस्था का दूसरा पठन् देता है (व्यवस्थाविवरण 5) और इस्राएलियों की इस पीढ़ी को परमेश्‍वर की प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने के लिए तैयार करता है। स्वयं मूसा को मरीबा नामक स्थान में अपने पाप के कारण भूमि में प्रवेश करने से वर्जित कर दिया जाता है (गिनती 20:10-13)। व्यवस्थाविवरण की पुस्तक के अन्त में, मूसा की मृत्यु को लिपिबद्ध किया गया है (व्यवस्थाविवरण 34)। वह नबो पहाड़ी के ऊपर चढ़ जाता है और जहाँ से उसे प्रतिज्ञा किए गए देश को देखने की अनुमति मिलती है। जब वह मरा तब मूसा 120 वर्ष का था, और बाइबल लिपिबद्ध करती है कि "न तो उसकी आँखें धुंधली पड़ीं, और न उसका पौरुष घटा था" (व्यवस्थाविवरण 34:7)। स्वयं प्रभु परमेश्‍वर ने मूसा को मिट्टी दी (व्यवस्थाविवरण 34:5-6), और यहोशू ने लोगों के अगुवे के रूप में पदभार सम्भाला (व्यवस्थाविवरण 34:9)। व्यवस्थाविवरण 34:10-12 कहता है कि, "और मूसा के तुल्य इस्राएल में ऐसा कोई नबी नहीं उठा, जिससे यहोवा ने आमने-सामने बातें कीं, और उसको यहोवा ने - फ़िरौन और उसके सब कर्मचारियों के सामने और उसके सारे देश में, सब चिह्न और चमत्कार करने को भेजा था, और उसने सारे इस्राएलियों की दृष्‍टि में बलवन्त हाथ और बड़े भय के काम कर दिखाए।"

उपरोक्त केवल मूसा के जीवन का एक संक्षिप्त विवरण है और परमेश्‍वर के साथ उसका वार्तालाप, जिस तरह से उसने लोगों का नेतृत्व किया, ऐसे कुछ विशेष तरीके जिसमें होकर उसने यीशु मसीह की प्रतिछाया को दिखाया है, यहूदी विश्‍वास के प्रति उसकी केन्द्रीयता, यीशु के रूपान्तरण के समय उसका प्रगटीकरण, और अन्य किसी विवरण के बारे में बात नहीं करता है। परन्तु यह हमें एक व्यक्ति के बारे में कुछ रूपरेखा को प्रदान करता है। इसलिए, अब हम मूसा के जीवन से क्या सीख सकते हैं? सामान्य रूप से मूसा के जीवन को 40 वर्षों की तीन अवधियों में विभाजित किया जा सकता है। उसके जीवन की पहली अवधि फिरौन के महल में पाई जाती है। फिरौन की पुत्री के दत्तक पुत्र के रूप में, मूसा के पास मिस्र के एक राजकुमार को मिलने वाले सारे लाभ और विशेषाधिकार थे। उसे "मिस्रियों की सारी विद्या पढ़ाई गई, और वह वचन और कर्म दोनों में सामर्थी था" (प्रेरितों के काम 7:22)। जैसे ही इब्रियों की दुर्दशा से उसकी आत्मा विचलित होने लगी, मूसा ने स्वयं को अपने लोगों के लिए उद्धारकर्ता मान लिया। जैसा कि स्तिफनुस सत्तारूढ़ यहूदी महासभा के सामने कहता है कि, "[मूसा] ने सोचा कि उसके भाई समझेंगे कि परमेश्‍वर उसके हाथों से उनका उद्धार करेगा, परन्तु उन्होंने न समझा" (प्रेरितों 7:25)। इस घटना से, हमें पता चलता है कि मूसा एक परिश्रमी व्यक्ति होने के साथ ही एक गर्म स्वभाव वाला व्यक्ति भी था और शीघ्रता में काम करता था। क्या परमेश्‍वर अपने लोगों को बचाना चाहता था? हाँ, चाहता था। क्या परमेश्‍वर उद्धार के लिए अपने चुने हुए साधन के रूप में मूसा का उपयोग करना चाहता था? हाँ, चाहता था। परन्तु मूसा को, इब्रियों के उद्धार में अपनी भूमिका के बारे में सही अर्थों में पता था या नहीं, तथापि उसने उतावली और अधीरता से काम किया। उसने अपने समय में वह करने का प्रयास किया, जिसे परमेश्‍वर अपने समय में करना चाहता था। हमारे लिए इससे प्राप्त होने वाली शिक्षा स्पष्ट है: हमें न केवल परमेश्‍वर की इच्छा को पूरा करने के बारे में पता होना चाहिए, अपितु परमेश्‍वर की इच्छा को उसके समय में पूरा करना चाहिए, न कि हमारे समय के ऊपर। जैसा कि बाइबल की कई अन्य घटनाओं में हुआ है, जब हम अपने समय में परमेश्‍वर की इच्छा को पूरा करने का प्रयास करते हैं, तब हम वास्तव में विद्यमान गड़बड़ी से कहीं अधिक को प्रगट करने की गलती करते हैं।

मूसा को विकसित होने और परिपक्व होने और परमेश्‍वर के सामने नम्र और दीन होने के लिए समय की आवश्यकता थी, और यह हमें मूसा के जीवन के अगले पड़ाव की ओर ले जाता है, जो कि मिद्यान की भूमि में उसके द्वारा व्यतीत किए हुए 40 वर्ष हैं। समय की अवधि में, मूसा ने एक चरवाहे, एक पति और एक पिता के सरल जीवन को सीखा। परमेश्‍वर ने आवेश में आ जाने वाले और गर्म स्वभाव वाले जवान को लिया और परमेश्‍वर के लिए उपयोग होने के लिए उसे सही साधन में ढालने और आकार देने की प्रक्रिया को आरम्भ किया। हम उसके जीवन की इस अवधि से क्या सीख सकते हैं? यदि पहली शिक्षा परमेश्‍वर के समय की प्रतीक्षा करनी है, तो दूसरी शिक्षा परमेश्‍वर के समय की प्रतीक्षा करते समय निष्क्रिय नहीं रहने की है। जबकि बाइबल मूसा के जीवन के इस हिस्से के विवरण के ऊपर बहुत अधिक समय व्यतीत नहीं करती है, तथापि ऐसा नहीं है कि मूसा परमेश्‍वर की बुलाहट की प्रतीक्षा में निष्क्रिय बैठा हुआ था। उसने अपने जीवन के 40 वर्षों को सर्वोत्तम रीति से एक चरवाहे के तरीके को सीखने और परिवार का समर्थन और पालन पोषण करने में व्यतीत किए थे। ये बातें तुच्छ नहीं हैं! जबकि हम परमेश्‍वर के साथ "पहाड़ की चोटी" पर रहने वाले अनुभव की लालसा करते हैं, तथापि हमारे जीवन का 99 प्रतिशत समय सांसारिक, दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों वाली घाटी में ही व्यतीत होता है। इससे पहले कि वह हमें युद्ध में सम्मिलित करे, हमें "घाटी में" परमेश्‍वर के लिए रहने की आवश्यकता है। यह अक्सर जीवन की तुच्छ बातों में आभासित होता है कि परमेश्‍वर अगली ऋतु में जाने के लिए उसकी बुलाहट के लिए हमें प्रशिक्षित और तैयार करता है।

मिद्यान में बिताए उसके समय में एक और बात जिसे हम मूसा में देखते हैं, वह यह है कि जब परमेश्‍वर ने अन्त में उसे सेवा में बुलाया, तो मूसा अनिच्छुक था। ऐसा व्यक्ति जो अपने जीवन के आरम्भिक समय में सक्रिय रहा था, मूसा, जो अब 80 वर्ष का है, अत्यधिक भयभीत हो गया। जब परमेश्‍वर के लिए बोलने के लिए कहा गया, तो मूसा ने कहा कि वह "मुँह और जीभ का भद्दा" है (निर्गमन 4:10)। कुछ टिप्पणीकारों का विश्‍वास है कि मूसा को बोलने में हकलाहट हो सकती है। कदाचित्, परन्तु तब स्तिफनुस के लिए यह कहना विषम बात होगी कि मूसा "वचन और कर्म दोनों में सामर्थी था" (प्रेरितों 7:22)। कदाचित् मूसा मिस्र में वापस नहीं जाना चाहता और असफल नहीं होना चाहता था। यह एक असमान्य भावना नहीं है। हम में से कितने लोगों ने कुछ करने का प्रयास किया है (चाहे यह परमेश्‍वर के लिए हो या नहीं) और असफल रहे हैं, और इसके पश्‍चात् इसे पुन: करने में हिचकिचा रहे थे? ऐसी दो बातें हैं, जिसे मूसा ने अनदेखा किया। पहला एक स्पष्ट परिवर्तन जो 40 वर्षों के अन्तराल में उसके स्वयं के जीवन में घटित हुआ था। दूसरा, और अधिक महत्वपूर्ण, परिवर्तन यह था कि परमेश्‍वर उसके साथ रहेगा। मूसा पहली बार इसलिए असफल नहीं हुआ क्योंकि उसने आवेश में आकर कार्य किया था, अपितु इसलिए कि उसने परमेश्‍वर के बिना कार्य किया था। इसलिए, यहाँ प्राप्त होने वाली शिक्षा यह है कि जब आप परमेश्‍वर से स्पष्ट बुलाहट को प्राप्त करते हैं, तो विश्‍वास में आगे, यह जानते हुए बढ़ें कि परमेश्‍वर आपके साथ जाता है! डरपोक न बनें, परन्तु प्रभु में और उसकी शक्‍ति के प्रभाव में बलवन्त बनें (इफिसियों 6:10)।

मूसा के जीवन का तीसरा और अन्तिम पड़ाव वह अध्याय है, जिसके ऊपर ऐतिहासिक रूप से पवित्रशास्त्र अपने सबसे अधिक समय को व्यतीत करता है, अर्थात्, इस्राएल के छुटकारे में उसकी भूमिका। मूसा के जीवन के इस अध्याय से कई शिक्षाओं को एकत्र किया जा सकता है। पहला यह है कि लोगों के लिए प्रभावी अगुवा कैसे बनें। मूसा के ऊपर अनिवार्य रूप से बीस लाख इब्री शरणार्थियों का दायित्व था। जब बातें उसे थकाने लगीं, तो उसके ससुर, यित्रों ने सुझाव दिया कि वह अन्य विश्‍वासयोग्य पुरुषों को उत्तरदायित्व सौंपें, यह एक ऐसी शिक्षा है, जिसे दूसरों के ऊपर अधिकार रखने वाले कई लोगों को सीखने की आवश्यकता है (निर्गमन 18)। हम साथ ही एक ऐसे व्यक्ति को भी देखते हैं, जो अपने कार्य में सहायता प्राप्त करने के लिए परमेश्‍वर के अनुग्रह के ऊपर निर्भर था। मूसा परमेश्‍वर के सामने लोगों की ओर से निरन्तर प्रार्थना कर रहा था। क्या अधिकार को रखने वाले सभी लोग लोगों की ओर से परमेश्‍वर के आगे याचना करेंगे, जिनके ऊपर उनको ठहराया गया है! मूसा को परमेश्‍वर की उपस्थिति की आवश्यकता के बारे में अच्छी तरह से पता था और उसने परमेश्‍वर की महिमा को देखने का अनुरोध भी किया (निर्गमन 33)। मूसा जानता था, कि परमेश्‍वर के अतिरिक्त, मिस्र से निर्वासित होना व्यर्थ होगा। यह परमेश्‍वर ही था, जिसने इस्राएलियों को विशेष रीति से रचा था, और उन्हें उसकी ही सबसे अधिक आवश्यकता थी। मूसा का जीवन हमें यह भी शिक्षा देता है कि कुछ ऐसे पाप होते हैं, जो हमें जीवन पर्यन्त परेशान करते रहते हैं। मिस्र में मूसा को परेशानी में डालने वाले उसी गर्म स्वभाव ने जंगल में भटकने के समय भी उसे मुसीबत में डाल दिया था। मरीबा नामक स्थान में घटित हुई उक्त घटना में, लोगों के लिए पानी उपलब्ध कराने के लिए मूसा ने गुस्से में आकर चट्टान के ऊपर आक्रमण किया। यद्यपि, उसने परमेश्‍वर को महिमा नहीं दी, न ही उसने परमेश्‍वर के आदेशों का सटीकता से पालन किया। इस कारण, परमेश्‍वर ने उसे प्रतिज्ञा की हुई भूमि में प्रवेश करने से मना कर दिया। इसी तरह, हम सभी लोग अपने कुछ निश्‍चित घिनौने पापों के आगे झुक जाते हैं, जो हमें अपने जीवन के सभी दिनों में, दु:ख देते रहते हैं, ये ऐसे पाप हैं, जिसने हमें निरन्तर सतर्क रहने की आवश्यकता होती है।

यहाँ केवल कुछ ही मुट्ठी भर व्यावहारिक शिक्षाएँ पाई जाती हैं, जिन्हें हम मूसा के जीवन से सीख सकते हैं। यद्यपि, यदि हम पवित्रशास्त्र के व्यापक प्रकाश में मूसा के जीवन को देखते हैं, तो हमें बड़े धर्मवैज्ञानिक सत्य दिखाई देते हैं, जो कि छुटकारे की कहानी के अनुरूप पाए जाते हैं। अध्याय 11 में इब्रानियों के लेखक ने विश्‍वास के उदाहरण के रूप में मूसा का उपयोग किया है। हम सीखते हैं कि यह विश्‍वास ही था कि मूसा ने फिरौन के महल की महिमा को अपने लोगों की दुर्दशा के कारण छोड़ दिया। इब्रानियों का लेखक कहता है कि, "[मूसा] ने मिस्र को छोड़ दिया, क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा" (इब्रानियों 11:26)। मूसा का जीवन विश्‍वासी जीवनों में से एक था, और हम जानते हैं कि विश्‍वास के बिना परमेश्‍वर को प्रसन्न करना अनहोना है (इब्रानियों 11:6)। इसी तरह, यह विश्‍वास ही है कि हम स्वर्गीय धन को देखते रहने के लिए तत्पर रहते हुए, जीवन पर्यन्त अस्थायी कठिनाइयों को सहन कर सकते हैं (2 कुरिन्थियों 4:17-18)।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, हम यह भी जानते हैं कि मूसा का जीवन मसीह की प्रतिछाया था। मसीह की तरह, मूसा एक वाचा का मध्यस्थ था। एक बार फिर से, इब्रानियों का लेखक इस बात को प्रदर्शित करने के लिए बहुत अधिक समय को व्यतीत करता हैं (इब्रानियों 3; 8–10 से तुलना करें)। प्रेरित पौलुस 2 कुरिन्थियों 3 में भी यही बात कहता है। भिन्नता केवल इतनी है कि मूसा जिस वाचा का मध्यस्थक बना वह लौकिक और सशर्त थी, जबकि मसीह की मध्यस्थता वाली वाचा शाश्‍वतकालीन और बिना किसी शर्त के है। मसीह की तरह, मूसा ने अपने लोगों को छुटकारा प्रदान किया। मूसा इस्राएल के लोगों को मिस्र की गुलामी और बन्धुवाई से बाहर निकाल ले आया और उन्हें कनान की प्रतिज्ञा की हुई भूमि में ले गया। मसीह अपने लोगों को पाप और निन्दा के बन्धुवाई और गुलामी से बाहर निकालता है और उन्हें एक नए सिरे से पृथ्वी के ऊपर अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा की हुई भूमि पर ले आता है, तब जब मसीह अपने प्रथम आगमन के समय राज्य का उद्घाटन करने के पश्‍चात् उसे पूरा करने के लिए वापस आएगा। मसीह की तरह, मूसा अपने लोगों के लिए एक भविष्यद्वक्ता था। मूसा ने परमेश्‍वर से इस्राएलियों के लिए वैसा ही वचन बोले जैसा कि मसीह ने कहे थे (यूहन्ना 17:8)। मूसा ने भविष्यद्वाणी की कि यहोवा परमेश्‍वर अपने लोगों के मध्य से एक और भविष्यद्वक्ता को खड़ा करेगा (व्यवस्थाविवरण 18:15)। यीशु और आरम्भिक कलीसिया ने शिक्षा दी और स्वीकार किया कि मूसा यीशु के बारे में बात कर रहा था, जब उसने इन शब्दों को लिखा था (यूहन्ना 5:46, प्रेरितों 3:22, 7:37 के साथ तुलना करें)। कई तरीकों से, मूसा का जीवन मसीह के जीवन का अग्रदूत है। इस तरह, हम इस बात की झलक प्राप्त कर सकते हैं कि परमेश्‍वर पूरे मानवीय इतिहास में विश्‍वासयोग्य लोगों के जीवन में छुटकारे की अपनी योजना के लिए कैसे काम कर रहा था। इससे हमें यह आशा प्राप्त होती है, कि जैसे परमेश्‍वर ने अपने लोगों को बचाया और उन्हें मूसा के कार्यों के माध्यम से विश्राम प्रदान किया, वैसे ही, परमेश्‍वर हमें भी बचाएगा और हमें भी मसीह में एक शाश्‍वतकालीन विश्राम के अवसर को अभी और आने वाले जीवन में दोनों में प्रदान करेगा।

अन्त में, यह ध्यान देना अत्यन्त रूचिपूर्ण है, कि चाहे मूसा ने अपने पूरे जीवन में प्रतिज्ञा किए हुए देश में कभी भी पैर नहीं रखा, परन्तु उसे उसकी मृत्यु के पश्‍चात् प्रतिज्ञा किए गए देश में प्रवेश करने का अवसर प्रदान किया गया। रूपान्तरण के पर्वत पर, जब यीशु ने अपने शिष्यों को अपनी पूर्ण महिमा का स्वाद चखने के लिए दिया, तो उसके साथ पुराने नियम के दो पुरूष, मूसा और एलिय्याह थे, जिन्होंने व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं का प्रतिनिधित्व किया। मूसा, इन दिनों में, मसीह में पाए जाने वाले सच्चे सब्त के विश्राम का अनुभव कर रहा है, जिसे हम सभी मसीही विश्‍वासी एक दिन मसीह के साथ साझा करेंगे (इब्रानियों 4:9)।

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