हम दाऊद के जीवन से क्या सीख सकते हैं?


प्रश्न: हम दाऊद के जीवन से क्या सीख सकते हैं?

उत्तर:
हम दाऊद के जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। वह परमेश्‍वर के मन के अनुसार एक व्यक्ति था (1 शमूएल 13:13-14; प्रेरितों 13:22)! शाऊल के बाद हम पहली बार दाऊद से मिलते हैं, लोगों के आग्रह पर, उसे राजा बनाया जाता है (1 शमूएल 8:5, 10:1)। शाऊल परमेश्‍वर के राजा के रूप में मापदण्ड को पूरा नहीं करता है। जब राजा शाऊल एक के बाद दूसरी गलती करते चले जा रहा था, तब परमेश्‍वर ने शमूएल को उसके चुने हुए चरवाहे, दाऊद, यिशै के पुत्र को अभिषेक करने के लिए भेजा (1 शमूएल 16:10, 13)।

माना जाता है कि जब वह इस्राएल का राजा बना, तब दाऊद की आयु बारह से सोलह वर्षों की रही होगी। मानवीय रूप से कहना, वह यिशै के पुत्रों में सबसे छोटा था और राजा बनाए जाने के लिए एक असम्भव विकल्प था। शमूएल ने सोचा कि दाऊद का सबसे बड़ा भाई एलीआब निश्‍चित रूप से अभिषिक्‍त किया हुआ था। परन्तु परमेश्‍वर ने शमूएल से कहा, "न तो उसके रूप पर दृष्‍टिकर, और न उसके कद की ऊँचाई पर, क्योंकि मैं ने उसे अयोग्य जाना है; क्योंकि यहोवा का देखना मनुष्य का सा नहीं है; मनुष्य तो बाहर का रूप देखता है, परन्तु यहोवा की दृष्‍टि मन पर रहती है" (1 शमूएल 16:7)। यिशै के सातों पुत्र शमूएल के सामने से निकल गए, परन्तु परमेश्‍वर ने उनमें से किसी को भी नहीं चुना। शमूएल ने पूछा कि क्या यिशै के और भी कोई पुत्र हैं? सबसे कम आयु का दाऊद, भेड़ चरा रहा था। इसलिए उन्होंने उस लड़के को बुलाया और शमूएल ने तेल से दाऊद का अभिषेक किया "और उस दिन से लेकर भविष्य को यहोवा का आत्मा दाऊद पर बल से उतरता रहा" (1 शमूएल 16:13)।

बाइबल यह भी कहती है कि प्रभु यहोवा का आत्मा राजा शाऊल के ऊपर उठ गया और उसे एक दुष्ट आत्मा घबराने लगा (1 शमूएल 16:14)। शाऊल के सेवकों ने उसे एक वीणावादक को लाने के लिए सुझाव दिया, और किसी एक ने दाऊद के लिए अनुशंसा करते हुए कहा, "मैंने बैतलहमवासी यिशै के एक पुत्र को देखा जो वीणा बजाना जानता है, और वह वीर योद्धा भी है, और बात करने में बुद्धिमान और रूपवान भी है; और यहोवा उसके साथ रहता है” (1 शमूएल 16:18)। इस प्रकार, दाऊद राजा की सेवा में आ गया (1 शमूएल 16:21)। शाऊल युवा दाऊद से प्रसन्न हुआ, और वह शाऊल के हथियार ढोने वालों में से एक बन गया।

जैसे ही दाऊद की सामर्थ्य और प्रतिष्ठा बढ़ी, शाऊल का दाऊद के प्रति आनन्द शीघ्र ही लुप्त हो गया। कदाचित् बाइबल के सबसे अधिक प्रसिद्ध वृतान्तों में से एक, दाऊद ने विशाल गोलियत को मार दिया था। पलिश्ती इस्राएलियों के साथ युद्ध कर रहे थे और उन्होंने अपने सैन्य बलों के साथ अपने शूरवीर, गत नगर के गोलियत के साथ उन्हें ललकारा था। उन्होंने गोलियत के साथ युद्ध किए जाने का प्रस्ताव दिया और कहा कि इस्राएलियों में से कोई भी उसके साथ जय या पराजय के लिए युद्ध करे। परन्तु इस्राएल में किसी ने भी विशाल दैत्य के साथ लड़ने के लिए अपनी इच्छा प्रगट नहीं की। दाऊद का बड़ा भाई शाऊल की सेना में था; गोलियत के द्वारा चालीस दिनों तक इस्राएलियों को ललकारते रहने के पश्‍चात्, दाऊद युद्ध के मैदान में अपने भाइयों से मिलने के लिए आता है और उसने पलिश्तियों की घमण्ड करते हुए सुना। युवा चरवाहे ने पूछा, "जो उस पलिश्ती को मारके इस्राएलियों की नामधराई दूर करेगा उसके लिये क्या किया जाएगा? वह खतनारहित पलिश्ती क्या है कि जीवित परमेश्‍वर की सेना को ललकारे?" (1 शमूएल 17:26)। दाऊद का सबसे बड़ा भाई क्रोधित हो गया और उसने दाऊद के घमण्ड करने और केवल युद्ध को देखने के लिए आने का आरोप लगाया। परन्तु दाऊद इसी विषय के ऊपर बात करता रहा।

शाऊल ने सुना कि दाऊद क्या कह रहा था और उसने उसे अपने पास लाने के लिए कहा। दाऊद ने शाऊल से कहा, "किसी मनुष्य का मन उसके कारण कच्‍चा न हो; तेरा दास जाकर उस पलिश्ती से लड़ेगा" (1 शमूएल 17:32)। शाऊल सन्देह करने वाला व्यक्ति था; क्योकि दाऊद एक प्रशिक्षित सैनिक नहीं था। दाऊद ने परमेश्‍वर को महिमा देने के लिए सावधान होकर, एक चरवाहे के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को उसे बताया कि दाऊद ने अपनी भेड़ों के मारने के लिए उनके पीछे आने वाले शेरों और भालुओं को मार डाला था, और उसने दावा किया कि वह पलिश्ती उनकी तरह मर जाएगा क्योंकि उसने "जीवित परमेश्‍वर की सेना को ललकारा है। यहोवा जिसने मुझे सिंह और भालू दोनों के पंजे से बचाया है, वह मुझे उस पलिश्ती के हाथ से भी बचाएगा” (1 शमूएल 1:36-37)। शाऊल ने उसकी बात को इस शर्त के ऊपर स्वीकार किया, कि दाऊद लड़ाई में शाऊल के अस्त्र-वस्त्र पहन कर जाएगा। परन्तु दाऊद ने हथियारों का उपयोग नहीं किया और उन्हें पीछे ही छोड़ दिया। दाऊद अपने साथ केवल अपनी लाठी, पाँच चिकने पत्थर, अपने चरवाहे का थैला और एक गोफन लेकर गया था। गोलियत दाऊद से भयभीत नहीं हुआ, परन्तु न ही दाऊद को उस दैत्य ने भयभीत किया। "दाऊद ने पलिश्ती से कहा, 'तू तो तलवार और भाला और साँग लिये हुए मेरे पास आता है; परन्तु मैं सेनाओं के यहोवा के नाम से तेरे पास आता हूँ, जो इस्राएली सेना का परमेश्‍वर है, और उसी को तू ने ललकारा है। आज के दिन यहोवा तुझ को मेरे हाथ में कर देगा'” (1 शमूएल 17:45-46)। परमेश्‍वर में दाऊद का भरोसा और परमेश्‍वर की महिमा के लिए उसका उत्साह उल्लेखनीय है। दाऊद ने गोलियत को मार डाला। उसने पूरे समय के लिए शाऊल की सेवा में प्रवेश किया, अब वह आगे के लिए अपने पिता की भेड़ों को नहीं चरा रहा था।

यही वह समय था, जब शाऊल के पुत्र, योनातान, "का मन दाऊद पर लग गया" (1 शमूएल 18:1)। दाऊद और योनातान की मित्रता आज की मित्रता के लिए शिक्षाप्रद है। यद्यपि उसका पिता राजा था और योनातान सिंहासन के लिए एक स्वाभाविक उत्तराधिकारी था, तथापि योनातान ने दाऊद का समर्थन करना चुना। उसने परमेश्‍वर की योजना को समझा और स्वीकार किया और अपने मित्र को अपने हत्यारे पिता से बचाया (1 शमूएल 18:1-4, 19-20)। योनातान विनम्रता और निस्वार्थ प्रेम को प्रदर्शित करता है (1 शमूएल 18:3; 20:17)। शाऊल और योनातान की मृत्यु के पश्‍चात्, दाऊद के शासन के समय, दाऊद ने शाऊल के घराने में बचे हुए किसी भी व्यक्ति की खोज की, जिस पर वह योनातान के कारण दया दिखा सके (2 शमूएल 9:1)। स्पष्ट रूप से, दोनों पुरुषों ने एक-दूसरे की बहुत अधिक चिन्ता की और एक-दूसरे को सम्मान दिया।

गोलियत के साथ घटित हुई घटना के पश्‍चात्, दाऊद की प्रसिद्धि बढ़ती चली गई। शाऊल की छावनी में होने वाली बातें उसके प्रति ताना मारने जैसी थीं, क्योंकि लोग दाऊद की प्रशंसा करते थे और राजा शाऊल को नीचा दिखाते थे, जिससे शाऊल में क्रोध भरी ईर्ष्या उत्पन्न हो गई, जो कभी भी नहीं रूकी (1 शमूएल 18:7–8)।

शाऊल की दाऊद के प्रति ईर्ष्या उसके प्राणों की खोज में परिवर्तित हो गई। उसने पहली बार दाऊद को अपना दामाद बनने के लिए कहते हुए पलिश्तियों के हाथ से मारने का प्रयास किया। राजा ने दाऊद को सैन्य सेवा के बदले में अपनी पुत्री को देने का प्रस्ताव दिया। दाऊद, ने विनम्रता में रहते हुए, इसका इन्कार कर दिया, और शाऊल की पुत्री को किसी दूसरे को दे दिया गया (1 शमूएल 18:17-19)। शाऊल की दूसरी पुत्री, मीकल, दाऊद को प्रेम करती थी, इसलिए शाऊल ने एक बार फिर से उसे पूछा। एक राजा की पुत्री के लिए दुल्हन का मूल्य चुकाने में असमर्थता और धन की कमी के कारण दाऊद ने एक बार फिर से इन्कार कर दिया। शाऊल ने सौ पलिश्तियों की खिलड़ी की मांग इस सोच के साथ की, कि दाऊद को शत्रु के द्वारा मार डाला जाएगा। जब दाऊद ने दो सौ पलिश्तियों को मारते हुए, आवश्यक मूल्य को दोगुना कर दिया, तो शाऊल ने पहचान लिया कि उसने मूल्य से कहीं अधिक अदा किया है, और दाऊद के प्रति उसका डर बढ़ गया (1 शमूएल 18:17–29)। योनातान और मीकल ने दाऊद को उनके पिता के ओर उसके प्राण लेने की मंशा के प्रति उसे चेतावनी दी, और दाऊद ने अपने जीवन के अगले वर्ष राजा से बच कर भागने में व्यतीत किए। दाऊद ने इस अवधि कई भजनों को लिखा, जिनमें भजन संहिता 57, 59 और 142 सम्मिलित हैं।

यद्यपि शाऊल ने उसे मारने के प्रयास से उसका पीछा करना कभी नहीं छोड़ा, परन्तु दाऊद ने अपने राजा और परमेश्‍वर के अभिषिक्त के विरूद्ध कभी भी अपना हाथ नहीं उठाया (1 शमूएल 19:1-2; 24:5–7)। जब शाऊल अन्त में मर गया, तब दाऊद ने विलाप किया (2 शमूएल 1)। यह जानते हुए भी कि वह परमेश्‍वर का अभिषिक्त था, दाऊद ने सिंहासन को पाने के लिए प्रयास नहीं किया। उसने परमेश्‍वर की प्रभुता का सम्मान किया और अधिकारियों को सम्मानित किया, जिन्हें परमेश्‍वर उसके ऊपर ठहराया था, उसने यह भरोसा किया कि परमेश्‍वर अपनी इच्छा को अपने समय में पूरा करेगा।

अपने प्राणों को बचाने के लिए भागते समय, दाऊद ने एक सामर्थी सेना को खड़ा किया और परमेश्‍वर की सामर्थ्य से अपने मार्ग में आने वाले सभों को पराजित किया, उसने युद्ध में जाने से पहले सदैव परमेश्‍वर से अनुमति और निर्देश मांगे, यह एक ऐसा अभ्यास था, जिसे उसने राजा के रूप में बनाए रखा (1 शमूएल 23:2–6; 9–13; 2 शमूएल 5:22-23)। एक बार राजा बनने के पश्‍चात्, दाऊद एक सामर्थी सेनापति और सैनिक भी बने रहा। दूसरे शमूएल अध्याय 23 ने दाऊद के कुछ "शूरवीर लोगों" के वृतान्तों को लिपिबद्ध किया है। परमेश्‍वर ने दाऊद को आज्ञा पालन करने के कारण प्रतिफल और सम्मान दिया और उसके प्रत्येक काम में उस सफलता दिलाई (2 शमूएल 8:6)।

दाऊद अपने और भी पत्नियों को करने लगा। उसने कर्मेल की एक विधवा अबीगैल से विवाह किया, इस समय वह शाऊल से बचते हुए भाग रहा था (1 शमूएल 25)। दाऊद ने यिज्रेल की अहिनोअम से भी विवाह किया। शाऊल ने दाऊद की पहली पत्नी, मीकल को एक अन्य व्यक्ति को दिया था (1 शमूएल 25:43-44)। शाऊल की मृत्यु के पश्‍चात्, दाऊद को यहूदा के घराने के ऊपर सार्वजनिक रूप से राजा होने के लिए अभिषेक किया गया (2 शमूएल 2:4) और तब उसे तीस वर्ष की आयु में पूरे इस्राएल का राजा होने के लिए शाऊल के घराने के विरूद्ध लड़ना पड़ा (2 शमूएल 5:3-4)। अब राजा, दाऊद ने मीकल को फिर से अपनी पत्नी के रूप में वापस प्राप्त किया (2 शमूएल 3:14)। दाऊद ने यरुशलेम को भी, यबूसियों से लेते हुए जीत लिया, और अधिक से अधिक सामर्थी होता चला गया क्योंकि परमप्रधान यहोवा परमेश्‍वर उसके साथ था (2 शमूएल 5:7)।

वाचा के सन्दूक को पहले पलिश्तियों ने अपने अधीन कर लिया था (1 शमूएल 4)। इसके इस्राएल में वापल लौटने पर, यह किर्यत्यारीम में रखा गया था (1 शमूएल 7:1)। दाऊद सन्दूक को वापस यरूशलेम लाना चाहता था। परन्तु दाऊद ने परमेश्‍वर के कुछ निर्देशों को छोड़ दिया कि कैसे सन्दूक को ले जाया जाए और किसे ले जाना है। इसके परिणामस्वरूप उज्जा की मृत्यु हो गई, जिसने उत्सव के मध्य में, अपने हाथ से सन्दूक को थामा था। परमेश्‍वर ने उज्जा को वहीं पर मार दिया, और वह सन्दूक के पास वहीं मर गया (2 शमूएल 6:1-7)। प्रभु यहोवा के डर से, दाऊद ने सन्दूक को वहीं छोड़ दिया और उसे ओबेदेदोम के घर में ही रहने दिया (2 शमूएल 6:11)।

तीन महीनों पश्‍चात्, दाऊद ने सन्दूक को यरूशलेम में लाने की योजना फिर से आरम्भ किया। इस बार, उसने निर्देशों का पालन किया। इस बार वह "यहोवा के सम्मुख तन मन से नाचता [नाचा] रहा" (2 शमूएल 6:14)। जब मीकल ने दाऊद को इस तरह से आराधना करते हुए देखा तो, "उसे मन ही मन तुच्छ जाना" (2 शमूएल 6:16)। उसने दाऊद से पूछा कि वह राजा के रूप में कैसे अपने लोगों के सामने इतना अधिक तुच्छ काम कर सकता था। "दाऊद ने मीकल से कहा, 'यहोवा, जिसने तेरे पिता और उसके समस्त घराने के बदले मुझ को चुनकर अपनी प्रजा इस्राएल का प्रधान होने को ठहरा दिया है, उसके सम्मुख मैं ऐसा नाचा—और मैं यहोवा के सम्मुख इसी प्रकार नाचा करूँगा। और मैं इससे भी अधिक तुच्छ बनूँगा, और अपनी दृष्‍टि में नीच ठहरूँगा" (2 शमूएल 6:21–22)। दाऊद समझ गया कि सच्ची उपासना केवल परमेश्‍वर के लिए होती है। हम दूसरों की धारणाओं के लाभ की प्राप्ति के लिए नहीं अपितु परमेश्‍वर के प्रति विनम्र प्रतिक्रिया के लिए उसकी आराधना करते हैं (यूहन्ना 4:24)।

दाऊद का अपने महल में बसने और अपने शत्रुओं से विश्राम पाने के पश्‍चात्, वह प्रभु यहोवा के लिए एक मन्दिर बनाना चाहता था (2 शमूएल 7:1-2)। भविष्यद्वक्ता नातान ने पहले तो दाऊद से कहा था कि वह जैसा चाहे वैसा करे। परन्तु तब परमेश्‍वर ने नातान से कहा कि दाऊद उसका मन्दिर नहीं बनाने पाएगा। इसकी अपेक्षा, परमेश्‍वर ने दाऊद को अपने लिए एक घर बनाने की प्रतिज्ञा दी। इस प्रतिज्ञा में एक भविष्यद्वाणी सम्मिलित थी कि सुलैमान मन्दिर का निर्माण करेगा। परन्तु साथ ही यह आने वाले मसीह, दाऊद के पुत्र की भी बात करती है, जो सदैव के लिए शासन करेगा (2 शमूएल 7:4-17)। दाऊद ने विनम्रता और विस्मय में भर कर उत्तर दिया: "हे प्रभु यहोवा, क्या कहूँ, और मेरा घराना क्या है, कि तू ने मुझे यहाँ तक पहुँचा दिया है?" (2 शमूएल 7:18; दाऊद की पूरी प्रार्थना के लिए 2 शमूएल 7:18–29 को देखें)। अपनी मृत्यु से पहले, दाऊद ने मन्दिर की तैयारियों को पूरा किया। परमेश्‍वर के दाऊद को मन्दिर न बनाने देने का कारण यह दिया कि उसने बहुत अधिक लहू बहाया था, परन्तु दाऊद का पुत्र शान्ति का जन होगा, युद्ध का व्यक्ति नहीं। सुलैमान मन्दिर का निर्माण करेगा (1 इतिहास 22)।

दाऊद के द्वारा बहुत अधिक लहू का बहाया जाना युद्ध का परिणाम था। परन्तु, एक घिनौनी घटना में, दाऊद ने अपने एक सामर्थी शूरवीर को भी मार डाला था। यद्यपि दाऊद परमेश्‍वर के मन के अनुसार एक व्यक्ति था, तथापि वह एक मनुष्य और पापी भी था। जब उसकी सेनाएँ वसन्त की ऋतु में युद्ध कर रही थीं, तब दाऊद घर पर ही था। उसने अपनी छत से एक सुन्दर स्त्री को नहाते हुए देखा। उसने पता लगाया कि वह बतशेबा है, जो कि हित्ती ऊरिय्याह की पत्नी थी, जो उसके सामर्थी पुरुषों में से एक था, और युद्ध में था, और दाऊद ने उसे अपने पास ले आने के लिए दूत भेजे। दाऊद बतशेबा के साथ सोया, और वह गर्भवती हो गई। दाऊद ने ऊरिय्याह को युद्ध से इस अपेक्षा के साथ वापस बुलाया, कि वह अपनी पत्नी के साथ सोएगा और यह विश्‍वास करेगा कि यह बच्चा उसका है, परन्तु ऊरिय्याह ने घर जाने से इन्कार कर दिया क्योंकि उसके साथी युद्ध में थे। इसलिए दाऊद ने ऊरिय्याह को युद्ध में मारे जाने की व्यवस्था की। दाऊद ने तब बतशेबा से विवाह किया (2 शमूएल 11)। दाऊद के जीवन की यह घटना हमें दिखाती है कि प्रत्येक, यहाँ तक कि हम, जो स्वयं को बहुत ऊँचे सम्मान से देखते हैं, पाप के साथ संघर्ष करते हैं। यह परीक्षा के बारे में सावधान करने के लिए एक कहानी के रूप में भी कार्य करती है और इस बात के लिए कि जिस तरीके से पाप शीघ्रता से गुणन कार्य कर सकता है।

भविष्यद्वक्ता नातान ने बतशेबा के किए हुए उसके पाप के विषय में दाऊद का सामना किया। दाऊद ने पश्‍चाताप में उत्तर दिया। उसने इस समय भजन संहिता 51 को लिखा। यहाँ हम दाऊद की विनम्रता और प्रभु यहोवा के प्रति उसके सच्चे मन को देखते हैं। यद्यपि नातान ने दाऊद से कहा कि उसका पुत्र उसके पाप के परिणामस्वरूप मर जाएगा, तथापि दाऊद ने अपने पुत्र के जीवन के लिए प्रभु यहोवा से विनती की। परमेश्‍वर के साथ दाऊद का सम्बन्ध ऐसा था कि वह विश्‍वास में बने रहने के लिए तैयार था और यह आशा करता था कि परमेश्‍वर अपने मन को परिवर्तित कर लेगा। जब परमेश्‍वर ने अपना न्याय सुनाया, तो दाऊद ने इसे पूरी तरह से स्वीकार कर लिया (2 शमूएल 12)। इस कहानी में हम परमेश्‍वर के अनुग्रह और प्रभुता को भी देखते हैं। सुलैमान, दाऊद का पुत्र, जो उसका उत्तराधिकारी था और जिसके माध्यम से यीशु का देहधारण हुआ, वह दाऊद और बतशेबा से उत्पन्न हुआ था।

परमेश्‍वर ने भी नातान के माध्यम से दाऊद से कहा था, कि तलवार उसके घर से नहीं हटेगी। वास्तव में, दाऊद के घराने को उस समय से लेकर बहुत अधिक परेशानी हुई। हम इसे दाऊद की सन्तानों के मध्य देखते हैं, जब अम्नोन ने तामार का बलात्कार किया, जिसके परिणाम स्वरूप अबशालोम ने अम्नोन की हत्या की और अबशालोम ने दाऊद के विरूद्ध राजद्रोह की गोष्ठी रची। नातान ने दाऊद से यह भी कहा था कि उसकी पत्नियाँ उसे दे दी जाएँगी, जो उसका निकट सम्बन्धी होगा; यह गुप्त रूप से घटित नहीं होगा, जैसा कि बतशेबा के साथ दाऊद का पाप था, परन्तु यह सार्वजनिक रूप से घटित होगा। भविष्यद्वाणी तब पूरी हुई जब सबके देखते हुए अबशालोम अपने पिता की रखैलियों के साथ छत पर सोया (2 शमूएल 16)।

दाऊद कई भजनों का लेखक है। उनमें हम उस तरीके को देखते हैं, जिसमें उसने प्रभु यहोवा की खोज की और उसे महिमा दी। उसे अक्सर एक चरवाहा राजा और एक योद्धा कवि के रूप में सोचा जाता है। पवित्रशास्त्र उसे "इस्राएल का मधुर भजन गानेवाला" कहता है (2 शमूएल 23:1)। दाऊद का जीवन मानवीय भावनाओं की बातों से भरा हुआ था - एक सामान्य चरवाहा लड़का, जिसका परमेश्‍वर में बहुत अधिक विश्‍वास था, जो अपने अधिकारियों को सम्मान देता था, अपने प्राणों को बचाने के लिए भागता है, और वह राजा बन जाता है, जिसकी तुलना में इस्राएल के सभी भावी राजाओं को मापा जाएगा। उसने कई सैन्य विजयों को देखा। वह गम्भीर पाप में गिर गया, और उसके परिवार को इसका परिणाम भुगतना पड़ा। परन्तु इन सभी बातों के होते हुए भी दाऊद परमेश्‍वर की ओर मुड़ता है और उस पर भरोसा करता है। भजन संहिता में भी जब दाऊद का मन गिरा जाता है या जब वह उदास हो जाता है, तो हम देखते हैं कि वह अपने सृष्टिकर्ता की ओर अपनी आँखें उठाकर देखता है और उसकी स्तुति करता है। परमेश्‍वर पर यह निर्भरता और परमेश्‍वर के साथ अपने सम्बन्ध को निरन्तर बनाए रखना ही वहीं बातें हैं, जो दाऊद को परमेश्‍वर के मन के अनुसार होना बनाता है।

परमेश्‍वर ने दाऊद को उसके सिंहासन के ऊपर सदैव के लिए राज करने के लिए वंशज् देने की प्रतिज्ञा की। वह शाश्‍वतकालीन राजा यीशु, प्रतिज्ञा किया हुआ मसीह और दाऊद का पुत्र है।

English


हिन्दी के मुख्य पृष्ठ पर वापस जाइए
हम दाऊद के जीवन से क्या सीख सकते हैं?