हमें अब्राहम के जीवन से क्या सीखना चाहिए?


प्रश्न: हमें अब्राहम के जीवन से क्या सीखना चाहिए?

उत्तर:
मूसा के अतिरिक्त, पुराने नियम में पाए जाने वाले व्यक्ति अब्राहम का नए नियम में किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में अधिक उल्लेख किया गया है। याकूब अब्राहम को "परमेश्‍वर के मित्र" के रूप में सन्दर्भित करता है (याकूब 2:23), यह पदवी पवित्रशास्त्र में किसी और के लिए उपयोग नहीं की गई है। अभी तक की सभी पीढ़ियों में विश्‍वासियों को "अब्राहम की सन्तान" कहा गया है (गलातियों 3:7)। छुटकारे के इतिहास में अब्राहम का महत्व और प्रभाव स्पष्ट रूप से पवित्र शास्त्र में देखा जाता है।

अब्राहम का जीवन उत्पत्ति 11:26 में अपने पहले उल्लेख से लेकर उसकी उत्पत्ति 25:8 में दी हुई मृत्यु तक उत्पत्ति की कहानी के एक बड़े भाग को पूरा करता है। यद्यपि हम अब्राहम के जीवन के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, तथापि हम उसके जन्म और आरम्भिक जीवन के बारे में बहुत ही कम जानते हैं। जब हम पहली बार अब्राहम से मिलते हैं, तो वह पहले से ही 75 वर्ष की आयु का हो चुका होता है। उत्पत्ति 11:28 लिपिबद्ध करती है कि अब्राहम का पिता, तेरह, ऊर में रहता था, जो कि फरात नदी के ऊपर स्थित दक्षिणी मेसोपोटामिया में एक प्रभावशाली नगर था, जो कि फारस की खाड़ी के मुख्य और बगदाद के आधुनिक-नगर के मध्य लगभग आधे रास्ते पर स्थित था। हम यह भी सीखते हैं कि तेरह ने अपने परिवार को वहाँ से लिया और कनान देश में रहने के लिए चल दिया, परन्तु वहाँ जाने की अपेक्षा उत्तरी मेसोपोटामिया के हारान नगर में बस गया (जो कि प्राचीन बेबीलोन की ओर से निकलने वाले व्यापारिक मार्ग पर नीनवे और दमिश्क के लगभग आधे मध्य में स्थित है)।

अब्राहम की कहानी वास्तव में उत्पत्ति अध्याय 12 के आरम्भ में ही रूचिपूर्ण हो जाती है। पहले तीन वचनों में, हम परमेश्‍वर के द्वारा अब्राहम को बुलाए जाने को देखते हैं:

“यहोवा ने अब्राम से कहा, 'अपने देश, और अपने कुटुम्बियों, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा। और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान् करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा। जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे" (उत्पत्ति 12:1-3)।

परमेश्‍वर अब्राहम को उसके घर हारान से बाहर निकल आने के लिए बुलाता है और उसे एक देश में जाने के लिए कहता है, जिसे वह उसे दिखाएगा। परमेश्‍वर ने अब्राहम से तीन प्रतिज्ञाएँ भी कीं :1) उसकी अपनी भूमि होने की प्रतिज्ञा; 2) उसे एक बड़ी जाति बना दिए जाने की प्रतिज्ञा; और 3) आशीर्वाद को दिए जाने की प्रतिज्ञा। ये प्रतिज्ञाएँ उस नींव को निर्मित करती हैं, जिसे बाद में अब्राहम आधारित वाचा कहा जाएगा (इसे उत्पत्ति 15 में स्थापित किया गया है और उत्पत्ति 17 में इसकी पुन: पुष्टि की गई है)। जो बात अब्राहम को विशेष बनाती है, वह यह है कि उसने परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन किया। उत्पत्ति 12:4 लिपिबद्ध करती है कि परमेश्‍वर के द्वारा बुलाए जाने के पश्‍चात् अब्राहम "यहोवा के इस वचन के अनुसार अब्राम चला।" इब्रानियों का लेखक अब्राहम को कई बार विश्‍वास के लिए उदाहरण के रूप में उपयोग करता है, और विशेष रूप से इस प्रभावशाली कार्य को सन्दर्भित करता है: "विश्‍वास ही से अब्राहम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेनेवाला था; और यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ, तौभी निकल गया” (इब्रानियों 11:8)।

हम में से कितने लोग अपने पीछे अपना सब कुछ छोड़ कर आगे जाना चाहेंगे और यहाँ कि उस ओर आगे बढ़ेंगे जहाँ का गंतव्य हम नहीं जानते हैं? परिवार की अवधारणा का अर्थ अब्राहम के समय में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए सब कुछ था। उस समय में, परिवारिक इकाइयाँ दृढ़ता से आपस में बुनी हुईं थीं; परिवार के सदस्यों के लिए एक-दूसरे से सैकड़ों मील दूर रहना असामान्य बात था। इसके अतिरिक्त, हमें अब्राहम के धार्मिक जीवन और उसकी बुलाहट के आने से पहले उसके परिवार के बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है। ऊर और हारान के लोग प्राचीन बेबीलोन के देवताओं, विशेष रूप से सिन नामक चन्द्रमा देवता की पूजा करते थे, इसलिए परमेश्‍वर ने अब्राहम को मूर्तिपूजक संस्कृति से बाहर बुलाया। अब्राहम ने यहोवा परमेश्‍वर को जाना और उसकी बुलाहट को पहचान लिया, और स्वेच्छा से उसका पालन, बिना किसी संकोच के किया।

अब्राहम के विश्‍वास के जीवन का एक और उदाहरण उसके पुत्र, इसहाक के जन्म में देखा जाता है। अब्राहम और सारा निःसंतान थे (यह उस संस्कृति में शर्म के लिए एक वास्तविक स्रोत की बात थी), तौभी परमेश्‍वर ने प्रतिज्ञा की कि अब्राहम का एक पुत्र होगा (उत्पत्ति 15:4)। यह पुत्र अब्राहम की उस विशाल समृद्धि का उत्तराधिकारी होगा जिसकी प्राप्ति के लिए परमेश्‍वर ने उसे आशीर्वाद दिया था, और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह उस प्रतिज्ञा का उत्तराधिकारी होगा और शेत की धर्मी वंशावली को आगे बढ़ाएगा। अब्राहम ने परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा में विश्‍वास किया, और यह विश्‍वास उसके लेखे में धार्मिकता गिना गया (उत्पत्ति 15:6)। परमेश्‍वर ने उत्पत्ति 17 में अब्राहम से की हुई अपनी प्रतिज्ञा को पुन: दोहराया, और उसके विश्‍वास को उत्पत्ति 21 में इसहाक के जन्म के साथ पुरस्कृत किया गया।

अब्राहम के विश्‍वास की उसके पुत्र इसहाक के सम्बन्ध में परीक्षा की जाएगी। उत्पत्ति 22 में, परमेश्‍वर अब्राहम को इसहाक को मोरिय्याह पहाड़ी की चोटी पर बलि देने की आज्ञा देता है। हम नहीं जानते कि अब्राहम ने इस आदेश के ऊपर आन्तरिक मन से कैसे प्रतिक्रिया दी होगी। हम जो देखते वह यह है कि अब्राहम ईमानदारी से उस परमेश्‍वर का पालन कर रहा है, जो उसकी ढाल था (उत्पत्ति 15:1) और जो इस बिन्दु तक उसके प्रति असाधारण रूप से अनुग्रहपूर्ण और भला रहा था। अपने घर और परिवार को छोड़ने के लिए दी गई पहली आज्ञा के अनुसार, अब्राहम ने इस आज्ञा का भी पालन किया (उत्पत्ति 22:3)। हम जानते हैं कि कहानी अब्राहम के द्वारा इसहाक को बलि दिए जाने से रोकने के साथ समाप्त होती है, परन्तु कल्पना कीजिए कि अब्राहम को कैसा महसूस हुआ होगा। वह अपने स्वयं के लिए एक पुत्र होने की दशकों से प्रतीक्षा कर रहा था, और परमेश्‍वर, जिसने इस सन्तान की उससे प्रतिज्ञा की थी, वह उसे उससे लेने वाला था। मुख्य विषय यह है कि अब्राहम का परमेश्‍वर के प्रति विश्‍वास अपने पुत्र के प्रति प्रेम से कहीं अधिक था, और उसने भरोसा किया कि चाहे उसने इसहाक का बलिदान भी क्यों न किया हो, परमेश्‍वर उसे मृतकों से वापस लाने में सक्षम था (इब्रानियों 11:17-19)।

यह सुनिश्‍चित हो, कि अब्राहम के जीवन में असफलता और पाप के क्षण भी आए थे (जैसा कि हम सभों के जीवन में आते हैं), और बाइबल उन्हें लिखने से पीछे नहीं हटती है। हम कम से कम दो ऐसे अवसरों के बारे में जानते हैं, जिनमें अब्राहम ने सारा के साथ अपने सम्बन्धों के बारे में झूठ बोला था, ताकि वह सम्भावित शत्रुतापूर्ण भूमि में स्वयं को बचा सके (उत्पत्ति 12:10-20; 20:1-18)। इन दोनों घटनाओं में, परमेश्‍वर अब्राहम में विश्‍वास की कमी होने के पश्‍चात् भी उसकी रक्षा करता और उसे आशीर्वाद देता है। हम यह भी जानते हैं कि बच्चा न होने की हताशा अब्राहम और सारा दोनों पर ही थी। सारा ने सुझाव दिया कि अब्राहम के द्वारा उसके लिए सारा की दासी, हाजिरा से एक बच्चा हो; अब्राहम इस बात के लिए सहमत हुआ (उत्पत्ति 16:1-15)। इश्माएल का जन्म न केवल अब्राहम की मूर्खता और विश्‍वास की कमी, अपितु परमेश्‍वर के अनुग्रह की निरर्थकता को भी दर्शाता है (अर्थात् इश्माएल को जन्म दिए जाने की अनुमति देना और यहाँ तक कि उसे आशीर्वाद भी देना)। रूचिपूर्ण बात यह है, कि उस समय अब्राहम और सारा को अब्राम और सारै कहा जाता था। परन्तु जब इश्माएल तेरह वर्ष का था, तब परमेश्‍वर ने अब्राम को खतने की वाचा देते हुए एक नया नाम दिया और उसे सारै के माध्यम से एक पुत्र देने के द्वारा उसे एक नई प्रतिज्ञा दी, सारै को भी परमेश्‍वर ने एक नया नाम दिया (उत्पत्ति 17)। अब्राम, जिसका अर्थ "उन्नत पिता" है, अब अब्राहम बन गया जिसका अर्थ, "बहुतों का पिता" होता है। वास्तव में, अब्राहम के कई शारीरिक वंशज हैं, और वे सभी जो यीशु के माध्यम से परमेश्‍वर में अपने विश्‍वास को रखते हैं, उन्हें अब्राहम के आत्मिक उत्तराधिकारी के रूप में भी गिना जाता है (गलातियों 3:29)। "विश्‍वासियों के पिता" के जीवन में बहुत अधिक सन्देह और अविश्‍वास के क्षण पाए जाते हैं, तौभी वह विश्‍वासयोग्यता से भरे हुए जीवन को यापन करने के उदाहरण के रूप में लोगों के मध्य अभी भी महान् है।

अब्राहम के जीवन से प्राप्त होने वाली एक स्पष्ट शिक्षा यह है कि हमें विश्‍वास के जीवन को व्यतीत करना है। अब्राहम अपने पुत्र इसहाक को मोरिय्याह पर्वत पर इस लिए ले जा सका, क्योंकि वह जानता था कि परमेश्‍वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में विश्‍वासयोग्य था। अब्राहम का विश्‍वास अंध विश्‍वास नहीं था; उसका विश्‍वास इस दृढ़ आश्‍वासन और भरोसे के ऊपर टिका हुआ था, जिसमें परमेश्‍वर ने स्वयं को विश्‍वासयोग्य और सच्चा प्रमाणित किया था। यदि हमें अपने जीवन को पीछे की ओर मुड़ कर देखना पड़े, तो हम इसके ऊपर परमेश्‍वर के विधान के पूरे किए जाने वाले कार्यों के हाथ को देखेंगे। परमेश्‍वर को हमसे मुलाकात करने के लिए स्वर्गदूतों के साथ आने की या जलती हुई झाड़ियों से बोलने की या हमारे जीवनों में सक्रिय होने के लिए समुद्र के पानी का दो भागों में बाँटने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्‍वर हमारे जीवन की घटनाओं का संचालन कर रहा और इसके ऊपर व्याप्त है। कभी-कभी ऐसा नहीं प्रतीत होता है, परन्तु अब्राहम का जीवन इस बात का प्रमाण है कि हमारे जीवन में परमेश्‍वर की उपस्थिति वास्तविक है। यहाँ तक कि अब्राहम की असफलताएँ भी यही प्रदर्शित करती हैं कि परमेश्‍वर हमें हमारे पापों के कारण आने वाले परिणामों से हमारी रक्षा नहीं करता है, तथापि वह हम में और हमारे द्वारा उसकी अनुग्रह से भरी हुई इच्छा के अनुकूल कार्य करता है; हम ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते जो उसकी योजना को विफल करेगा।

अब्राहम का जीवन हमें साधारण आज्ञाकारिता के कारण आशीर्वाद के वृतान्त को दिखाता है। जब उसे उसके परिवार को छोड़ने के लिए कहा गया, तो अब्राहम ने उसे छोड़ दिया। जब इसहाक को बलिदान करने के लिए कहा गया, तो अब्राहम ने "सबेरे तड़के उठकर" ऐसा ही किया। बाइबल की इस कहानी से हम क्या समझ सकते हैं, यही कि अब्राहम के द्वारा आज्ञा पालन करने में कोई संकोच नहीं था। अब्राहम, हम में से अधिकांशों की तरह, इन निर्णयों के कारण वेदना में आ सकता था, परन्तु, जब किसी कार्य को करने का समय था, तो उसने इसे किया। जब हम परमेश्‍वर की सच्ची बुलाहट को समझते हैं या हम उसके निर्देशों को उसके वचन में पढ़ते हैं, तो हमें कार्य करना चाहिए। जब परमेश्‍वर कुछ आज्ञा देता है, तो आज्ञाकारिता वैकल्पिक नहीं होती है।

हम अब्राहम के जीवन से यह भी देखते हैं कि परमेश्‍वर के साथ एक सक्रिय सम्बन्ध कैसा होता है। जबकि अब्राहम आज्ञा मानने में शीघ्रता करता था, तथापि वह परमेश्‍वर से प्रश्नों को पूछने में शर्म महसूस नहीं करता था। अब्राहम ने विश्‍वास किया कि परमेश्‍वर उसे और सारा को एक पुत्र देगा, परन्तु उसने आश्‍चर्य प्रगट किया कि यह कैसे हो सकता है (उत्पत्ति 17:17-23)। उत्पत्ति 18 में हम अब्राहम के वृतान्त में सदोम और अमोरा के लिए मध्यस्थता करते हुए पढ़ते हैं। अब्राहम ने पुष्टि की कि परमेश्‍वर पवित्र और न्यायी था और वह उसके द्वारा पापियों के साथ धर्मी को नष्ट करने की सोच भी नहीं सकता था। उसने परमेश्‍वर से पचास धर्मी लोगों के कारण पापी नगरों को छोड़ देने के लिए कहा और दस तक की सँख्या तक विनती करता रहा। अन्ततः सदोम में दस धर्मी पुरुष भी नहीं थे, परन्तु परमेश्‍वर ने अब्राहम के भतीजे लूत और उसके परिवार को छोड़ दिया (उत्पत्ति 19)। यह रूचिपूर्ण है कि परमेश्‍वर ने नगरों को नष्ट करने से पहले अब्राहम के ऊपर अपनी योजनाओं को प्रकाशित किया और कहा कि वह अब्राहम के प्रश्नों से बचना नहीं चाह रहा है। यहाँ पर अब्राहम का उदाहरण हमें दिखाता है कि उसकी योजनाओं के बारे में परमेश्‍वर से वार्तालाप करना, दूसरों के लिए मध्यस्थता करना, परमेश्‍वर के न्याय के ऊपर भरोसा करना और उसकी इच्छा के अधीन होना कैसा होता है।

अब्राहम के विश्‍वास, विशेष रूप से हाजिरा और इश्माएल के साथ उसके सम्बन्ध में विफलता का आना, हमें अपने स्वयं के द्वारा विषयों को सुलझाने के प्रयास की मूर्खता को दिखाता है। परमेश्‍वर ने अब्राहम और सारा को एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा दी थी, परन्तु, अपनी अधीरता में, अब्राहम को एक उत्तराधिकारी प्रदान करने की उनकी योजना, ने अब्राहम को ही नुकसान पहुँचाया। सबसे पहले सारा और हाजिरा के मध्य संघर्ष उत्पन्न हुआ, और बाद में इश्माएल और इसहाक के मध्य संघर्ष उत्पन्न हुआ। इश्माएल के वंशज परमेश्‍वर के लोगों के कटु शत्रु बन गए, जैसा कि हम बाद में पुराने नियम की कहानी में देखते हैं, और इसलिए आज भी इस्राएल और उसके अरब पड़ोसियों के मध्य संघर्ष चल रहा है। हम अपनी इच्छा से परमेश्‍वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते; हमारे प्रयास अन्ततः समाधान करने की तुलना में अधिक समस्याओं को ही उत्पन्न करते हैं। यह शिक्षा हमारे जीवन में व्यापक निहितार्थ में लागू होती है। यदि परमेश्‍वर ने कुछ करने की प्रतिज्ञा की है, तो हमें विश्‍वासयोग्य और धैर्यवान होना चाहिए और उसके समय में ही उसे पूरा होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

धर्मवैज्ञानिक रूप से बोलना, अब्राहम का जीवन केवल विश्‍वास के धर्मसिद्धान्त का एक जीवन्त उदाहरण है, अर्थात् विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना। दो बार प्रेरित पौलुस अब्राहम को इस महत्वपूर्ण धर्मसिद्धान्त के लिए एक उदाहरण के रूप में उपयोग करता है। रोमियों के पत्र में, पूरा का पूरा चौथा अध्याय अब्राहम के जीवन के माध्यम से विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहराए का वर्णन करने के लिए समर्पित है। इसी तरह का तर्क गलातियों की पुस्तक में भी दिया गया है, जहाँ पौलुस अब्राहम के जीवन से यह दर्शाता है कि अन्यजातियाँ भी यहूदियों के साथ विश्‍वास के माध्यम से अब्राहम के आशीर्वाद की वारिस हैं (गलातियों 3:6-9, 14, 16, 18, 29)। यह हमें उत्पत्ति 15:6 की ओर वापस ले आता है, "उसने यहोवा पर विश्‍वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना।" परमेश्‍वर की प्रतिज्ञाओं में अब्राहम का विश्‍वास परमेश्‍वर के लिए पर्याप्त था कि वह उसे अपनी दृष्टि में धर्मी घोषित करे, जिससे रोमियों 3:28 में दिया हुआ धर्मसिद्धान्त प्रमाणित हो जाता है। अब्राहम ने धर्मी ठहराए जाने को अर्जित करने के लिए कुछ भी नहीं किया था। इसके लिए परमेश्‍वर के ऊपर उसका विश्‍वास ही पर्याप्त था।

हम इसे पुराने नियम में परमेश्‍वर के अनुग्रह के कार्य में बहुत पहले ही देख लेते हैं। सुसमाचार यीशु के जीवन और मृत्यु के साथ आरम्भ नहीं हुआ, परन्तु उत्पत्ति की पुस्तक से ही आरम्भ हो जाता है। उत्पत्ति 3:15 में, परमेश्‍वर ने एक प्रतिज्ञा की थी कि “स्त्री का वंश” सर्प के सिर को कुचल देगा। धर्मशास्त्रियों का मानना है कि यह बाइबल में सुसमाचार का पहला उल्लेख है। पुराने नियम के शेष वचन शेत के साथ आरम्भ होने वाले वंशावली के माध्यम से परमेश्‍वर के अनुग्रह के सुसमाचार का वर्णन करते हैं (उत्पत्ति 4:26)। अब्राहम की बुलाहट, छुटकारे की कहानी का एक और अंश थी। पौलुस हमें बताता है कि अब्राहम को पहले से ही सुसमाचार का प्रचार किया गया था, जब परमेश्‍वर ने उसे बताया था कि "तुझ में सब जातियाँ आशीष पाएँगी " (गलातियों 3:8)।

एक और बात जिसे हम अब्राहम के जीवन से सीखते हैं, वह यह है कि विश्‍वास वंशानुगत नहीं होता है। मत्ती 3:9, लूका 3:8 और यूहन्ना 8:39 में हम सीखते हैं कि उद्धार पाने के लिए शारीरिक रूप से अब्राहम के वंश से आना पर्याप्त नहीं है। हमारे लिए इसका तात्पर्य यह है कि एक मसीही परिवार में पालन पोषण होना पर्याप्त नहीं है; हम किसी दूसरे के विश्‍वास के कारण परमेश्‍वर के साथ संगति में या स्वर्ग में प्रवेश नहीं करते हैं। परमेश्‍वर हमें केवल इसलिए बचाने के लिए बाध्य नहीं है, क्योंकि हमारे पास एक निर्दोष मसीही वंशावली है। पौलुस अब्राहम का उपयोग रोमियों 9 में यह बताने के लिए करता है, कि अब्राहम के वंश के सभी लोग उद्धार के लिए नहीं चुने गए (रोमियों 9:7)। परमेश्‍वर अपनी प्रभुता से उन लोगों को चुनता है, जो उद्धार को प्राप्त करेंगे, परन्तु यह उद्धार उसी विश्‍वास के माध्यम से आता है, जिसे अब्राहम ने अपने जीवन में प्रयोग किया था।

अन्त में, हम देखते हैं कि याकूब अब्राहम के जीवन को एक दृष्टान्त के रूप में उपयोग करता है कि बिना काम के विश्‍वास मरा हुआ है (याकूब 2:21)। वह जिस उदाहरण का उपयोग करता है, वह मोरिय्याह की पहाड़ी के ऊपर अब्राहम और इसहाक की कहानी है। सुसमाचार की सच्चाई को जान लेना ही मात्र बचाए जाने के लिए पर्याप्त नहीं है। विश्‍वास का परिणाम आज्ञाकारिता के भले कार्यों में दिखाई देना चाहिए, जिसे एक जीवित विश्‍वास दिखाता है। वह विश्‍वास जो अब्राहम को धर्मी ठहराने और परमेश्‍वर की दृष्टि में धर्मी गिने जाने के लिए पर्याप्त था (उत्पत्ति 15) वही विश्‍वास है, जिसने उसे अपने पुत्र इसहाक को बलिदान चढ़ाने के लिए परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन करने के लिए प्रेरित किया। अब्राहम को उसके विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहराया गया था, और उसका विश्‍वास उसके कामों के द्वारा प्रमाणित हुआ था।

अन्तिम विश्लेषण में, हम देखते हैं कि अब्राहम एक आदर्शमयी व्यक्ति था, तथापि अपनी धर्मनिष्ठता या सिद्ध जीवन में नहीं (उसके जीवन में कमजोरियाँ थीं, जैसा कि हमने देखा है), परन्तु इसलिए क्योंकि उसका जीवन मसीही जीवन के बहुत सारे सत्यों को दर्शाता है। परमेश्‍वर ने अब्राहम को पृथ्वी पर विद्यमान लाखों लोगों के लिए उसके आशीर्वाद का माध्यम कहा। परमेश्‍वर ने अब्राहम का उपयोग यीशु के जन्म में छुटकारे की कहानी को लाते हुए उसे समापन तक ले जाते हुए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रयोग किया। अब्राहम परमेश्‍वर की प्रतिज्ञाओं में विश्‍वास और आशा का एक जीवन्त उदाहरण है (इब्रानियों 11:8-10)। हमारे जीवनों को इस तरह से व्यतीत किया जाना चाहिए कि जब हम अपने अन्तिम दिनों में पहुँचे, तो हमारा विश्‍वास, अब्राहम की तरह, दूसरों के लिए एक स्थायी विरासत के रूप में बन जाए।

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