हमें हारून के जीवन से क्या सीखना चाहिए?


प्रश्न: हमें हारून के जीवन से क्या सीखना चाहिए?

उत्तर:
हारून निर्गमन के समय अपनी भूमिका को अदा करने के लिए जाना जाता है और वह लेवी, या हारूनवंशी गोत्र से याजकीय पद पर स्थापित होने वाले पहले व्यक्ति के रूप में भी जाना जाता है। वह मिस्र में इस्राएल की गुलामी की अवधि में लेवी के घराने में उत्पन्न हुआ था और वह अपने भाई मूसा से तीन वर्ष बड़ा था, (निर्गमन 7:7)। हमें पहली बार हारून का परिचय निर्गमन 4 में तब मिलता है, जब परमेश्‍वर मूसा से कहता है कि वह हारून, मूसा के भाई, को उसके साथ फिरौन से इस्राएलियों को छुटकारा प्राप्त करने के लिए भेजेगा।

यूसुफ और उसकी पीढ़ी के मरने के बाद इस्राएल की सन्तान मिस्र में रही और वे गिनती में बहुत अधिक हो गए। एक नए फिरौन को इस्राएलियों के द्वारा मिस्रियों के विरूद्ध उठ खड़े होने की आशंका थी, इसलिए उसने उन पर बेगारी कराने वाले स्वामियों को नियुक्त कर दिया और उनके विरूद्ध कठोर कानून बनाए (निर्गमन 1:8–14)। उसने इब्रानी दाइयों को जन्म लेते ही सभी नर शिशुओं को मारने का आदेश दिया। जब दाइयों ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया, तो फिरौन ने सभी लोगों को इब्रानी नर शिशुओं को मारने के लिए नील नदी में फेंकने का आदेश दिया। मूसा के जन्म के समय तक इन कानूनों को लागू किया गया था। सम्भवतः हारून का जन्म इस तरह के कानूनों के आने से पहले हुआ था, या वह मृत्यु से बच गया होगा, क्योंकि दाइयों ने फिरौन की आज्ञा मानने की अपेक्षा परमेश्‍वर का भय माना था (निर्गमन 1:15–22)। हम हारून के बारे में ज्यादा कुछ तब नहीं पढ़ते हैं, जब तक कि परमेश्‍वर उसे अस्सी-वर्षीय-मूसा के पास नहीं भेजता है।

जब परमेश्‍वर ने जलती हुई झाड़ी के माध्यम से मूसा से बात की, तो उसे मिस्र वापस जाने के लिए कहा और फिरौन से इस्राएलियों को छुटकारा देने की माँग करने के लिए कहा (निर्गमन 3-4), मूसा ने कारण दिया कि वह इस कार्य के लिए अच्छा विकल्प क्यों नहीं था। मूसा ने अन्ततः अनुरोध किया कि परमेश्‍वर किसी और को उसके स्थान पर भेजें (निर्गमन 4:13)। "तब यहोवा का कोप मूसा पर भड़का और उसने कहा, 'क्या तेरा भाई लेवीय हारून नहीं है? मुझे निश्‍चय है कि वह बोलने में निपुण है, और वह तुझ से भेंट के लिये निकला आता है; और तुझे देखकर मन में आनन्दित होगा'" ( निर्गमन 4:14)। परमेश्‍वर ने मूसा को बताया कि हारून मूसा का प्रवक्ता अर्थात् उसकी ओर से बोलने वाला होगा (निर्गमन 4:15–17)।

परमेश्‍वर ने हारून से जंगल में मूसा से मिलने के लिए कहा। हारून आज्ञा का पालन करते हुए उसके पास चला गया। मूसा ने हारून को बताया कि परमेश्‍वर ने क्या कहा था, इसमें उन चिन्हों के बारे में भी परमेश्‍वर के निर्देश सम्मिलित थे, जिसे उन्हें फिरौन के सामने प्रगट करने थे। मिस्र में, मूसा और हारून ने इस्राएलियों के पुरनियों को इकट्ठा किया, और हारून ने उन्हें बताया कि परमेश्‍वर ने मूसा से क्या कहा था (निर्गमन 4:27–31)। यह ध्यान रखना रूचिपूर्ण है कि हारून ने परमेश्‍वर के प्रति आज्ञा का पालन करने के लिए कितनी शीघ्रता के साथ उत्तर दिया और कैसे शीघ्रता से विश्‍वास किया, जिसे मूसा ने उसे बताया था। हारून को यह कार्य बिना किसी प्रश्‍न के करने अच्छा लग रहा था, जिसके लिए परमेश्‍वर ने उसे, स्वेच्छा से अपने भाई की सहायता करने और अपनी ओर से लोगों से बात करने के लिए बुलाया था। हारून कदाचित् मूसा और इस्राएलियों के मध्य मध्यस्थक के रूप में भी काम करता था, क्योंकि मूसा अपने पूरे जीवन में अपने लोगों से अलग पहले - मिस्र के राजभवन और तत्पश्‍चात् मिद्यान में एक भगोड़े के रूप में रह रहा था।

जैसा कि निर्गमन की कहानी आगे बढ़ती चली जाती है, हम फिरौन के सामने मूसा और हारून दोनों को खड़ा हुआ देखते हैं, जिससे कि फिरौन लोगों को जाने दे और वे कई चिन्हों का प्रदर्शन करने के द्वारा उससे ऐसा करने के लिए अनुरोध करते हैं। परमेश्‍वर ने कई चिन्हों और विपत्तियों को प्रगट करने के लिए हारून की लाठी का उपयोग किया। लोग परमेश्‍वर के निर्देशों के प्रति आज्ञाकारी रहे, और इस्राएलियों को अन्ततः मुक्त कर दिया गया था।

हारून इस्राएलियों के द्वारा जंगल में भटकने के समय मूसा की सहायता नेतृत्व करने के द्वारा और उसके लिए प्रवक्ता के रूप में करता रहा। जब इस्राएलियों ने मूसा और हारून के विरूद्ध बुड़बुड़ाने को प्रगट किया (निर्गमन 16:2), "तब मूसा और हारून ने सारे इस्राएलियों से कहा, 'साँझ को तुम जान लोगे कि जो तुम को मिस्र देश से निकाल ले आया है वह यहोवा है, और भोर को तुम्हें यहोवा का तेज देख पड़ेगा, क्योंकि तुम जो यहोवा पर बुड़बुड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं कि तुम हम पर बुड़बुड़ाते हो।' फिर मूसा ने कहा, 'यह तब होगा जब यहोवा साँझ को तुम्हें खाने के लिये मांस और भोर को रोटी मनमाने देगा; क्योंकि तुम जो उस पर बुड़बुड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं? तुम्हारा बुड़बुड़ाना हम पर नहीं यहोवा ही पर होता है'” (निर्गमन 16:6–8)। मूसा ने हारून से कहा कि वे प्रभु के सामने आने के लिए लोगों को एक साथ बुलाएँ, और प्रभु की महिमा उनके सामने एक बादल में प्रगट होगी (निर्गमन 16:10)। यह वही समय था, जब परमेश्‍वर ने बटेरों और मन्ने को प्रदान किया। परमेश्‍वर ने मूसा को एक पात्र में मन्ना के एक ओमेर को रखने का निर्देश दिया, जो कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्मृति के रूप में रखा जाएगा; मूसा ने हारून को इसे इकट्ठा करने के लिए कहा (निर्गमन 16:32–35)।

मूसा और हारून के विरूद्ध कोरहवंशियों के विद्रोह के पश्‍चात्, परमेश्‍वर ने यह पुष्टि करने के लिए एक आश्‍चर्यकर्म प्रगट किया कि हारून और उसके वंशज वास्तव में परमेश्‍वर यहोवा की उपस्थिति में रहने के लिए उसके चुने हुए सेवक थे। बारह छड़ियों को प्रत्येक गोत्र से एक को लेते हुए एकत्र किया गया। लेवी गोत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली छड़ी के ऊपर हारून का नाम अंकित है। छड़ियों को पूरी रात वाचा के सन्दूक के सामने रखा गया, और अगली सुबह हारून की छड़ी में "कलियाँ लगीं, और फूल भी फूले, और पके बादाम भी लगे" (गिनती 17:8)। परमेश्‍वर ने मूसा को आदेश दिया कि वह हारून की छड़ी को सन्दूक के अन्दर रखे, और कहा कि यह, "उनका बुड़बुड़ाना जो मेरे विरुद्ध होता रहता है, भविष्य में रोक रखेगी" (वचन 10)।

अमालेकियों के साथ एक युद्ध के समय, इस्राएली सेना के सेनापति, यहोशू को तभी जय प्राप्त हुई थी, जब मूसा के हाथ ऊपर उठे रहे थे। मूसा थक गया था, इसलिए हारून और हूर ने उसके नीचे एक पत्थर को रखा और उसके हाथों को उठाए रखने के लिए उन्हें थाम लिया। कई अर्थों में, यह हारून के द्वारा मूसा की सेवा किए जाने का एक चित्र है। उसने अपने भाई को सहायता दी, जिसे परमेश्‍वर ने इस्राएलियों को बन्धुवाई से बाहर निकालने के लिए चुना था।

सीनै पर्वत पर, परमेश्‍वर ने लोगों को चेतावनी दी थी कि वे उससे दूरी बनाए रखें, क्योंकि परमेश्‍वर मूसा से मिलेगा और उसने उसे व्यवस्था को दिया। परमेश्‍वर के साथ मूसा की एक मुलाकात पर, परमेश्‍वर ने उसे हारून को अपने साथ लाने के लिए कहा (निर्गमन 19:24)। बाद में, जब मूसा परमेश्‍वर के पास पहाड़ के ऊपर ही रह गया, तो उसने किसी भी विवाद का निपटारा करने के लिए हारून और हूर को दायित्व सौंपा (निर्गमन 24:14)।

दुर्भाग्य से, हारून के लिए बातें तब सही नहीं रही, जब वह लोगों का प्रभारी था। लोग मूसा के लौटे आने के लिए अधीर हो उठे और हारून से उन्हें अपने लिए एक देवता बनाने के लिए कहने लगे। लोगों के आग्रह का विरोध किए बिना ही, हारून ने उनसे सोने के गहनों की मांग की, और इसे आकार देते हुए एक बछड़े को निर्मित किया, और एक मूर्ति को ढाल दिया। हारून ने यहाँ तक कि बछड़े के सामने एक वेदी भी बनाई और इसके लिए एक पर्व को मनाए जाने की घोषणा की (निर्गमन 32:1-6)। यह समझना कठिन हो सकता है कि कैसे एक व्यक्ति जिसने परमेश्‍वर की बुलाहट की आज्ञा का पालन अपने भाई को लोगों को मिस्र से बाहर ले आने में सहायता देने के लिए स्वेच्छा से किया था, परमेश्‍वर के अद्भुत कार्यों को सबसे पहले अपनी आँखों देखा था, और अभी निवर्तमान समय में परमेश्‍वर को सीनै पर्वत के ऊपर देखा, ऐसा काम कर सकता है। हारून की विफलता हमारे मानवीय स्वभाव का प्रदर्शन है। हम हारून की प्रेरणा को नहीं जानते हैं, परन्तु यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि उसने परमेश्‍वर पर सन्देह किया और लोगों से डर गया।

जब परमेश्‍वर ने मूसा को बताया कि लोगों और सोने के बछड़े के साथ क्या कुछ घटित हो रहा था, तब उसने लोगों को नष्ट करने और उनके स्थान पर मूसा के वंश से एक बड़ी जाति को बनाने की धमकी दी। मूसा ने लोगों की ओर से हस्तक्षेप किया और उनके पास लौट आया (निर्गमन 32:7–18)। जब मूसा ने वास्तव में देखा कि क्या हो रहा था, "तब मूसा का कोप भड़क उठा, और उसने तख़्तियों को अपने हाथों से पर्वत के नीचे पटककर तोड़ डाला" (निर्गमन 32:19)। तख़्तियों में परमेश्‍वर की वाचा थी; ऐसा प्रतीत होता है कि मूसा ने उन्हें न केवल क्रोध में आकर नष्ट किया, अपितु इसलिए भी नष्ट किया क्योंकि लोगों ने आज्ञाहीनता के माध्यम से वाचा को तोड़ा था। मूसा ने मूर्ति को जला दिया, उसकी राख को पानी में बिखेर दिया, और इस्राएलियों को इसे पिला दिया (निर्गमन 32:20)। जब मूसा ने हारून से पूछा कि लोगों ने ऐसा क्यों किया है और उसने उनकी अगुवाई क्यों की, तब हारून लोगों की शिकायत और उनके लिए एक देवता बनाने के लिए अनुरोध करने के विवरण के बारे में ईमानदार रहा, परन्तु वह अपनी भूमिका के बारे में नहीं सोच रहा था। हारून ने स्वयं के द्वारा उनके गहनों को संग्रह किए जाने को स्वीकार किया, परन्तु साथ ही यह दावा किया, "जब उन्होंने मुझ को वह दिया, मैं ने उन्हें आग में डाल दिया, तब यह बछड़ा निकल पड़ा!" (निर्गमन 32:24)। मूसा ने देखा कि, "हारून ने उन लोगों को ऐसा निरंकुश कर दिया था कि वे अपने विरोधियों के मध्य उपहास के योग्य हो गए " (निर्गमन 32:25)। मूसा ने उन लोगों को एक ओर बुलाया जो यहोवा की ओर थे। लेवी उसकी ओर हो गए, और तत्पश्‍चात् मूसा ने उन्हें कुछ लोगों को मारने का निर्देश दिया। मूसा ने फिर से लोगों की ओर से प्रार्थना में मध्यस्थता की। परमेश्‍वर ने मूसा को आश्‍वस्त किया परन्तु लोगों को उनके पाप के दण्ड के लिए विपत्ति को भी भेजा (निर्गमन 32:33-35)।

सोने के बछड़े की घटना ही मात्र हारून की एक सबसे बड़ी गलती नहीं थी। गिनती अध्याय 12 में हारून और मरियम (हारून और मूसा की बहन) ने मूसा का विरोध भी किया था: "मूसा ने एक कूशी स्त्री के साथ विवाह कर लिया था। इसलिये मरियम और हारून उसकी उस विवाहिता कूशी स्त्री के कारण उसकी निन्दा करने लगे; उन्होंने कहा, 'क्या यहोवा ने केवल मूसा ही के साथ बातें की हैं? क्या उसने हम से भी बातें नहीं कीं?'” (गिनती 12:1-2)। इस तरह का घमण्ड ईश्‍वरीय नहीं है, परन्तु अगुवों के मध्य पाया जाने वाला एक सामान्य खतरा है; हम में से कई कदाचित् हारून के साथ इस विषय में सम्बन्ध रखते हैं। परमेश्‍वर ने तीनों भाई-बहनों को उससे मिलने के लिए बाहर बुलाया, मूसा का बचाव हारून और मरियम से किया और पूछा कि हारून और मरियम उसके विरूद्ध बोलने से क्यों नहीं डरे। जब वह बादल जिस में से यहोवा ने उनसे बात की थी, उठा लिया गया, तो मरियम कोढ़ी पाई गई। हारून ने उसकी ओर से मूसा से विनती की; मूसा ने परमेश्‍वर को पुकारा, और छावनी के बाहर सात दिनों तक रहने के पश्‍चात्, मरियम ठीक हो गई (गिनती 12:3–16)। यह रूचिपूर्ण है कि मरियम को कोढ़ का रोग हुआ, जबकि हारून को नहीं हुआ। मूसा के सामने हारून का विनती करना भी रूचिपूर्ण है, उसने अपने मूर्खता से भरे हुए पाप को स्वीकार किया और उसने मरियम को दु:ख में न बने रहने के लिए उससे विनती की। ऐसा प्रतीत होता है कि हारून ने वास्तव में पश्‍चाताप किया था।

हारून और उसके पुत्रों को परमेश्‍वर ने लोगों के लिए याजक नियुक्त किया था, और हारून पहला महायाजक था। परमेश्‍वर ने याजकीय सेवा के बारे में सीनै पर्वत के ऊपर मूसा को आज्ञा दी थी, जिसमें यह भी सम्मिलित है कि याजकों को कैसे अभिषेक करना है और उन्हें कौन से वस्त्र पहनने चाहिए। परमेश्‍वर ने मूसा से कहा कि पुरोहिताई का कार्य हारून और उसके वंशजों के लिए स्थायी अध्यादेश होगा (निर्गमन 29:9)। हारून को महायाजक बनाया गया था, और उसके घराने ने ईसा पूर्व 70 में मन्दिर के विनाश होने तक याजकों के रूप में सेवा की। नए नियम में दी हुई इब्रानियों की पुस्तक यीशु के याजक होने की तुलना हारून की याजकीय सेवकाई के साथ बहुत लम्बे रूप में करती है। लेवी वंश के याजकों को निरन्तर लोगों की ओर से और अपने पापों के लिए बलिदानों को चढ़ाना होता था। यीशु बिना पाप के था, और लोगों की ओर से उसका बलिदान एक ही बार सदैव के लिए और पूर्ण रूप से दिया गया (देखें इब्रानियों 4-10)

जबकि हारून के पुत्रों ने याजकीय सेवा को किया, तथापि उसके दो पुत्रों - नादाब और अबीहू - को परमेश्‍वर ने तब मार डाला, जब उन्होंने "उस ऊपरी आग को जिसकी आज्ञा यहोवा ने नहीं दी थी यहोवा के सम्मुख अर्पित किया" (लैव्यव्यवस्था 10:1)। जब मूसा ने हारून को बताया कि परमेश्‍वर के सामने पवित्र होकर आने का यही अर्थ होता है, तब हारून चुप रहा (लैव्यव्यवस्था 10:3)। न तो हारून ने अपने पुत्रों का बचाव करने का प्रयास किया, न ही उसने परमेश्‍वर के द्वारा गलत कार्य किए जाने का आरोप लगाया। ऐसा प्रतीत होता है कि हारून ने वास्तव में परमेश्‍वर की पवित्रता को समझा और अपने पुत्रों के लिए उसके न्याय को स्वीकार किया।

मूसा की तरह ही, हारून को भी मरीबा में किए हुए उसके पाप के कारण प्रतिज्ञा किए गए देश में प्रवेश करने की अनुमति प्राप्त नहीं हुई (गिनती 20:23)। परमेश्‍वर ने मूसा, हारून और हारून के पुत्र एलीआज़ार को होर नामक पहाड़ी की चोटी के ऊपर जाने का निर्देश दिया। वहाँ एलीआज़ार को महायाजक बनाया जाएगा, और यहीं पर हारून मर जाता है (गिनती 20:26-29)।

हारून का जीवन परमेश्‍वर की पवित्रता और उसके अनुग्रह का प्रस्तुतिकरण है। हारून ने एक आज्ञाकारी और विश्‍वासयोग्य सेवक के रूप में, स्वेच्छा से मूसा के पास जाते हुए सेवकाई को आरम्भ किया और मध्यस्थक के रूप में सेवा की। उसने ईमानदारी से उस बलिदान पद्धति में एक याजक के रूप में भी काम किया, जिसे परमेश्‍वर ने यीशु मसीह में उद्धार की अन्तिम योजना के लिए एक चित्र के रूप में उपयोग किया था। किसी भी अन्य मनुष्य की तरह, हारून एक पापी व्यक्ति था। परमेश्‍वर के सामर्थी कार्य को देखने के बाद भी उसने एक सोने का बछड़ा बनाया और लोगों को उसकी पूजा करने के लिए प्रेरित किया। परन्तु हारून ने मूसा के विरूद्ध बोलने और अपने अविश्‍वासयोग्य पुत्रों की मृत्यु को स्वीकार करते हुए अपने पाप को स्वीकार किया और इन बातों से शिक्षा प्राप्त की। हारून से हम दूसरों की सेवा करने, नेतृत्व के उत्तरदायित्व में साझेदारी करने और स्वयं को परमेश्‍वर को सौंपने के बारे में शिक्षा को पाते हैं।

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