क्यों मॉरमन स्वयं को अन्तिम दिनों के सन्त कहते हैं?


प्रश्न: राशिफल का उद्देश्य किसी व्यक्ति के चरित्र और भविष्य की भविष्यवाणी में?

उत्तर:
जब 1800वीं शताब्दी में धार्मिक अनुभव की भूख बढ़ी तो मसीही विश्‍वास की विभिन्न शाखाओं में एकता की कमी एक ठोकर का कारण बन गई। जोसफ़ स्मिथ नाम का एक व्यक्ति स्वयं को धार्मिक अनुभवों के समाधान के रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रगट हुआ। उसने स्वयं को परमेश्‍वर का एक भविष्यद्वक्ता अर्थात् नबी बताया। उसके अनुयायी यह दावा करते हैं कि परमेश्‍वर ने "प्रेरितों और प्राचीन शिष्यों [के] पवित्र पुरोहितपद" को जोसफ़ स्मिथ के द्वारा पुनर्स्थापित अर्थात् बहाल किया है। स्मिथ ने यह भी घोषित किया कि विश्‍व के इन "अन्तिम दिनों" में अन्य सभी कलीसियाएँ स्वधर्म त्याग में भाग ले रही हैं और केवल उनके ही व्यक्तिगत् प्रकाशन (या उनके साथ जुड़े लोगों के) के ऊपर मोक्ष और निदेर्शों के लिए भरोसा किया जा सकता है।

मुख्य रूप से जोसफ़ स्मिथ और ओलिवर कॉवडरी के प्रयासों के द्वारा, एक संगठन का गठन किया गया और जिसे यीशु मसीह के अन्तिम दिनों के विश्‍वासी अर्थात् लेटर-डे सेन्ट या एलडीएस नामक कलीसिया का नाम दिया गया। ऐसा लिपिबद्ध किया गया है कि यह नाम यीशु मसीह की ओर से मिलने वाले प्रकाशन से आया था। यह तीन विशिष्ट निश्चयताओं को इंगित करने के लिए था: 1. यीशु मसीह ने इस कलीसिया को नियुक्त किया था; 2. कलीसिया की सेवकाई विशेष रूप से संसार के अन्तिम दिनों के लिए थी, और 3. कलीसिया में केवल सच्चे सन्तों को ही सम्मिलित किया जाएगा, जिन्हें यीशु मसीह ने स्वीकार किया था। इस तरह के नाम व्यापक रूप से अस्थिर हो चुके धर्मसिद्धान्तों के समय में बहुत ही आकर्षक लगते हैं। एलडीएस चर्च अर्थात् कलीसिया ने आगे यह कहा कि उनका कार्य परमेश्‍वर के राज्य और ईसाई धर्म की प्रथाओं को स्थापित करने का कार्य था, जैसा परमेश्‍वर ने चाहा था। इन बातों को एक साथ "सुसमाचार की पुनर्स्थापना" कहा जाता है और यह 19वीं शताब्दी के आरम्भ में हुए पुनर्स्थापना अर्थात् बहाली के आन्दोलन का अंश थे।

बाइबल के अनुसार, यह परमेश्‍वर ही है, जो उसके राज्य को स्थापित करेगा (यशायाह 9:7)। सन्तों को उसके लिए ऐसा करने के लिए नहीं बुलाया जाता है। इसके अतिरिक्त, चाहे एक व्यक्ति का ऐसा दृष्टिकोण ही क्यों न हो कि पृथ्वी अपने बिल्कुल ही अन्तिम दिनों में है, या वह उसमें उन सारे दिनों को भी क्यों न सम्मिलित करे, जिसमें यीशु ने उसकी अपनी सेवकाई को पूरा किया था, बहाली की आवश्यकता के लिए एक टूटे हुए सुसमाचार के लिए बाइबल से कोई समर्थन नहीं मिलता है। यीशु शिमौन पतरस की स्वीकारोक्ति "तू जीवते परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है" को स्वीकार करते हुए, ऐसा कहता है कि यही वह चट्टान है, जिसके ऊपर वह अपनी कलीसिया को निर्मित करेगा और "नरक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे..." (मत्ती 16:16, 18)। परमेश्‍वर ने यह भी घोषित किया है कि यद्यपि, कुछ लोग सत्य से भटक गए हैं, तथापि, "परमेश्‍वर की पक्की नींव बनी रहती है" (2 तीमुथियुस 2: 18-19)। ये वचन सुसमाचार के सन्दर्भ में कलीसिया के स्थाई स्वभाव को दर्शाते हैं। वास्वत में, अन्त के समय में, धर्मत्याग में बढ़ोतरी होगी (मत्ती 24:11), परन्तु सुसमाचार उन लोगों के साथ स्थाई बना रहेगा, जो अन्त तक दृढ़ रहेंगे (मत्ती 24:13-14)।

आज के सन्तों का सच्चा कार्य अनन्त सुसमाचार की सच्चाई को निरन्तर घोषित करते रहना है (यूहन्ना 3:16; मरकुस 16:15) और "जो खरी बातें तू ने मुझ से सुनी हैं, उनको उस विश्‍वास और प्रेम के साथ, जो मसीह यीशु में है..दृढ़ता से थामे रहे" (2 तीमुथियुस 1:13)।

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क्यों मॉरमन स्वयं को अन्तिम दिनों के सन्त कहते हैं?