यीशु को जानना बनाम यीशु के बारे में जानना — क्या भिन्नता है?


प्रश्न: यीशु को जानना बनाम यीशु के बारे में जानना — क्या भिन्नता है?

उत्तर:
फैन साइटों अर्थात् प्रसिद्ध व्यक्ति, वस्तु या संस्कृति सम्बन्धी वैबसाइटों और पत्रिकाओं से हमें इस प्रश्न का उत्तर देने में सहायता मिलती है। फिल्म, टीवी, संगीत या खेल खिलाड़ियों के प्रशंसक अपने पसंदीदा व्यक्ति के बारे में जानकारी, फोटो और चटपटे समाचार को प्राप्त करने में पैसा और समय खर्च करते हैं। ऐसी सामग्री पर विचार करने के बाद, प्रशंसकों को ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वे वास्तव में अपने नायकों को जानते हैं। परन्तु क्या वे जानते हैं? उन्हें अपने चुने हुए नायक के बारे में कुछ सच्चाइयों का पता हो सकता है। वे जन्म की तिथि, पसंदीदा रंग और बचपन के पालतू जानवरों को उदृधत कर सकते हैं, परन्तु, यदि वे उस व्यक्ति को आमने-सामने मिलते हैं, तो उनका नायक क्या कहेगा? क्या प्रशंसक वास्तव में नायक को जानता है?

यीशु ने मत्ती 7:21–23 में इस प्रश्न का उत्तर दिया: "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ!'' यीशु के दिनों में ऐसे लोग थे जो यह सोचते थे कि वे उसके मित्र हैं, क्योंकि वे व्यवस्था को जानते थे, उन्होंने अपने लिए (औरों के लिए) कठोर नियमों को बनाया, और उसकी शिक्षा को सुना। उसके उपदेश को सुनकर उन्होंने उसका अनुसरण किया। उसके आश्चर्यकर्मों की सराहना की, और जो कुछ उन्होंने कहा था उसमें से कुछ को पसन्द किया। परन्तु यीशु ने उन्हें "कुकर्म करनेवालो" कहा, "मैंने तुमको कभी नहीं जाना।"

आज हज़ारों लोग हैं, जो यीशु के बारे में जानते हैं — अर्थात्, वे उसके बारे में कुछ तथ्यों को जानते हैं, वे कदाचित् बाइबल के कुछ वचनों को स्मरण भी कर लेते हैं, और कदाचित् वे कलीसिया में भी जाते हैं। परन्तु उन्होंने कभी भी तथ्यों को अपनी व्यक्तिगत् वास्तविकता नहीं बनने दिया। वे सत्य को अपने मनों में घुसने की अनुमति दिए बिना अपने सिर में इस ज्ञान को बनाए रखते हैं। यीशु ने समस्या की व्याख्या ऐसे की है: "ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं" (मत्ती 15:8–9; मरकुस 7:6)।

यीशु के साथ वास्तविक सम्बन्ध को स्थापित करने के स्थान पर धर्म के विकल्प को ले आना आसान हो सकता है। हम अक्सर सोचते हैं कि, यदि हम "मसीही बातों" को कर रहे हैं, तो यह मूल्य रखती हैं। हम यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के तथ्यों की सराहना कर सकते हैं, परन्तु जब तक हम उसे अपना प्रभु नहीं बना लेते, तब तक तथ्य हमें अच्छा नहीं बनाते (यूहन्ना 3:16–18; प्रेरितों के काम 10:43; रोमियों 10:9)। बौद्धिक विश्वास और बचाए जाने वाले विश्वास के बीच भिन्नता होती है। यीशु को जानने का अर्थ है कि हमने उसकी ओर से हमारे लिए दिए गए उसके बलिदान को स्वीकार कर लिया है (2 कुरिन्थियों 5:21)। हम उसे अपने जीवन के प्रभु होने के लिए कहते हैं (यूहन्ना 1:12; प्रेरितों के काम 2:21)। हम उसकी मृत्यु में उसके साथ पहचान करते हैं और हम हमारे पुराने स्वयं को उसके साथ मरने के लिए देने का विचार करते हैं (कुलुस्सियों 3:3; रोमियों 6:2, 5; गलातियों 6:14; 2:20)। हम पाप से उसकी क्षमा और शुद्धता को स्वीकार करते हैं और उसे पवित्र आत्मा के माध्यम से घनिष्ठ संगति में जानना चाहते हैं (यूहन्ना 17:3; फिलिप्पियों 3:10; 1 यूहन्ना 2:27)।

जब हम अपने पाप के लिए पश्चाताप करते हैं और अपना जीवन उसके प्रति समर्पित करते हैं, तब यीशु हमें पवित्र आत्मा प्रदान करता है (प्रेरितों के काम 2:38: यूहन्ना 14:26; 16:13)। पवित्र आत्मा हमारे भीतर वास करने के लिए आता है, हमें सदैव के लिए परिवर्तित कर देता है (1 कुरिन्थियों 6:19; 1 यूहन्ना 3:9)। यीशु के बारे में हम जिन तथ्यों को जानते हैं, वे जीवित हो उठते हैं, क्योंकि हम उसे व्यक्तिगत् रूप से जानते हैं। मान लीजिए कि आपने पढ़ा है कि आपके पसंदीदा फिल्म स्टार की आँखें हरी हैं और उसकी ठुड्डी में डिंपल पड़ते है। जब तक आप उससे मुलाकात नहीं कर लेते हैं, तब तक वे लक्षण केवल कागज पर तथ्य के जैसे ही रहते हैं। फिर, अचानक, वे हरी आँखें आप को देख रही होती हैं, और जब वह मुस्कुराती है तो डिंपल उसकी ठुड्डी पर पड़ने लगते हैं। वह आपको उसके दिन, उसके डर और उसके मन के विचारों के बारे में बताती है। आपको स्मरण आएगा कि आपने पहले उन तथ्यों को सुना था, परन्तु अब आप उन्हें अनुभव कर रहे होते हैं। आप उसके बारे में पहले से जानते थे, परन्तु अब आप उसे जानते हैं। जो दूर था वह अब ठोस हो गया है। जिन चीजों के बारे में आपने सोचा था कि आप जानते हैं वह अब आपके लिए एक सम्बन्ध में प्रवेश करते ही अर्थ देने लगती हैं।

यीशु एक व्यक्ति है। उसे जानने के लिए एक सम्बन्ध में प्रवेश करना पड़ता है। सबसे बड़ी आज्ञा यह है कि "तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख" (मत्ती 22:37; मरकुस 12:30; लूका 10:27)। किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम करना कठिन होता है जिसे आप नहीं जानते। यीशु को प्रेम करना आपके जीवन के लिए उसकी योजना के प्रति समर्पण से आरम्भ होता है। यही उसे प्रभु बनाने का अर्थ है (मत्ती 6:33; रोमियों 10:9–10; भजन संहिता 16:8)। परमेश्वर का स्वरूप इतना अधिक विशाल और जटिल है कि कोई भी मनुष्य उसके बारे में सब कुछ को पूरा तरह नहीं जान सकता है। परन्तु जीवन उसके बारे में निरन्तर खोज करते रहना है, उसके बारे में और अधिक सीखते रहना है, और उसकी संगति का आनन्द लेना है (यिर्मयाह 29:13; फिलिप्पियों 3:8)।

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