क्या परमेश्वर निर्दयी है?


प्रश्न: क्या परमेश्वर निर्दयी है?

उत्तर:
नास्तिक और अज्ञेयवादियों का तर्क है कि बाइबल में प्रस्तुत किया गया परमेश्वर क्रूर या निर्दयी है। परमेश्वर को निर्दयी होने का उपनाम देकर, वे हमारी मानवीय, नैतिक संवेदनाओं को आकर्षित करते हैं। शब्द निर्दयी को “कठोर उपेक्षा, या दर्द या पीड़ा को देते हुए आनन्द लेने” के रूप में परिभाषित किया गया है। अब हमारे सामने प्रश्न यह उठता है कि क्या परमेश्वर निर्दयी या क्रूर है? सकारात्मक उत्तर देने के लिए, हमें यह अनुमति देनी होगी कि परमेश्वर या तो दर्द और पीड़ा की परवाह नहीं करता है, या वह वास्तव में अपनी सृष्टि को पीड़ित देखकर आनन्द लेता है।

नास्तिक/अज्ञेयवादी जो यह दावा करते हैं कि परमेश्वर निर्दयी है उनके पास प्रमाण देने का एक बड़ा बोझ है। वे केवल परमेश्वर के कार्यों के बारे में जानने का दावा ही नहीं कर रहे हैं; वे उन परिस्थितियों को भी पर्याप्त रूप से जानने का दावा कर रहे हैं जिनमें परमेश्वर ने उन कार्यों को किया, साथ ही साथ परमेश्वर के उद्देश्यों को भी। इसके अतिरिक्त, वे परमेश्वर के मन को जानने का भी दावा कर रहे हैं, जो कि परमेश्वर को उपेक्षा से भरे हुए और/या दु:खवादी आनन्द की प्राप्ति के गुण से भरे हुए दृष्टिकोण के होने का वर्णन करते हुए उसे निर्दयी के रूप में परिभाषित करने के लिए आवश्यक हैं। स्पष्ट रूप से कहना, ऐसा प्रदर्शन सन्देहवादी की क्षमता से परे है — वे सम्भवतः परमेश्वर के मन को नहीं जान सकते। “क्योंकि यहोवा कहता है, ‘मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है’’’ (यशायाह 55:8-9)।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि परमेश्वर दोनों बातों अर्थात् ऐसा होने की अनुमति देता है, और कई बार दर्द और पीड़ा का कारण भी बनता है, परन्तु परमेश्वर की भलाई का विरोध नहीं जा सकता क्योंकि वह ऐसा कार्य करता है जो हमारे लिए निर्दयी प्रतीत होता है। यद्यपि हम हर परिस्थिति में उसके तर्क को जानने का दावा नहीं कर सकते हैं, हम उन कार्यों के कई कारणों को जानते हैं जो हमें निर्दयी जैसे दिखाई दे सकते हैं, विशेषकर यदि हम नहीं जानते — या परिस्थितियों का पता लगाने के लिए चिन्ता नहीं करते है:

1. धार्मिकता से भरे हुए दण्ड देने की सीमा: यदि दण्ड धार्मिकता से भरा हुआ है, तो क्या इसे निर्दयी कहा जा सकता है? सामान्य रूप से आलोचकों को यह समझ में नहीं आता है कि जब वह लोगों पर दण्ड लाता है तो परमेश्वर का प्रेम कम नहीं होता है। परमेश्वर लोगों के एक बुरे समूह के ऊपर न्याय को ले आने में सक्षम हैं ताकि उन्हें बचा सकें जो उसके प्रति समर्पित हैं। बुराई और अधर्म को बिना अनुमति के करने की अनुमति देना वास्तव में निर्दयता होगा और निर्दोषता के प्रति उदारता भरा संकेत देगा। जब परमेश्वर ने फिरौन की पूरी सेना को डूबते हुए लाल सागर को बन्द कर दिया, तो वह फिरौन के द्वारा उसके विरुद्ध किए गए विद्रोह को दण्डित कर रहा था और अपने चुने हुए लोगों को संहार और विनाश से बचा रहा था (निर्गमन 14)। गलत कार्य जिसका परिणाम दण्ड में नहीं निकलता अनिवार्य रूप से बड़ी से बड़ी गलती का परिणाम बन जाता, जिसका लाभ किसी को नहीं होता है और यह सभी के भले के लिए हानिकारक है। यहाँ तक कि जब परमेश्वर ने इस्राएलियों को स्त्रियों और बच्चों सहित परमेश्वर के शत्रुओं को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए कहा, तो वह जानता था कि उन्हें जीवित रख छोड़ना भविष्य की पीढ़ियों को बुराई में लिप्त होने के लिए मूर्तिपूजक प्रथाओं के प्रति समर्पित करने के लिए सुनिश्चित करेगा — कुछ घटनाओं में झूठे देवताओं की वेदियों पर बच्चों के बलिदान का भी कारण बन जाएगा।

2. अधिक से अधिक भले को लाने के लिए: कभी-कभी अधिक भलाई का उत्पादन करने वाले दर्द और पीड़ा को किसी अन्य माध्यम से नहीं लाया जा सकता है। बाइबल हमें बताती है कि परीक्षाएँ और कठिनाइयाँ मजबूत, दृढ़ मसीहियों को उत्पन्न करती हैं, और जब हम उनका सामना करते हैं, तो हमें “इसे पूरे आनन्द की बात” समझनी चाहिए (याकूब 1:2)। परमेश्वर हमारे लाभ के लिए इन्हें लेकर आता है, ताकि हमें दु:खों की आग में सोने की तरह शुद्ध किया जा सके। प्रेरित पौलुस ने अपने कष्टों, मार-पीट, पत्थरबाजी, जहाजों के टूटने, भूख, प्यास, ठण्ड, कारावासों को — यह सुनिश्चित करने के साधन के रूप में देखा कि वह सदैव अपनी कमजोरी के प्रति सचेत रहेगा, सदैव स्मरण रखेगा कि जो सामर्थ्य उस में काम कर रही है वह परमेश्वर की ओर से है, उसकी नहीं है, और वह कभी भी अपनी सामर्थ्य के ऊपर भरोसा नहीं करेगा (2 कुरिन्थियों 1:8-10; 4:7-12)। अविश्वासियों के विरुद्ध, जब परमेश्वर उनके लिए पीड़ा और दर्द के अनुभव का कारण बनता है, तो उसमें परमेश्वर का न्याय निहित होता है। वह पाप के परिणामों के बारे में बार-बार उन्हें चेतावनी देकर उन पर अपनी दया को प्रदर्शित करता है। जब, अपने स्वयं के विद्रोह के माध्यम से, वे स्वयं पर विपत्ति लाते हैं, तो यह केवल दण्ड होता है, यह निर्दयता या क्रूरता नहीं है। तथ्य यह है कि वह विद्रोहियों को तब तक अपने ओर मुठ्ठी दिखाने अनुमति देता है जब तक वह उन पर अपनी दया और धैर्य को इंगित करता रहता है, न कि निर्दयता को।

3. स्वयं को महिमा देने के लिए: — परमेश्वर के द्वारा उसके गुणों का प्रदर्शन उसकी महिमा को ले आती है। हम सभी सहमत हैं कि जब वह अपने प्रेम और दया का प्रदर्शन करता है तो वह हमारे लिए बहुत ही अच्छा प्रतीत होता है, परन्तु चूंकि उसकी प्रत्येक और हर विशेषता पवित्र और सिद्ध है, इसलिए उसका क्रोध और क्रोध का प्रदर्शन भी उसे महिमा देती है। और यही अन्तिम लक्ष्य है — अर्थात् उसकी महिमा, हमारी नहीं। हमारे छोटे, सीमित मन भी पर्याप्त रूप से उसकी कल्पना नहीं कर सकते, जो कि इतना छोटा है कि परमेश्वर के ऊपर प्रश्न ही नहीं कर सकता है।

ये सभी दर्द और पीड़ा के लिए योग्य, मान्य, सही कारण हैं। सन्देहवादियों के दावों के विपरीत, इस संसार में परमेश्वर के द्वारा बुराई और दु:ख की अनुमति देने के अच्छे कारण हैं। हमें उन कुछ कारणों को जानने के लिए विशेषाधिकार प्राप्त हैं, परन्तु हम सदैव यह नहीं जानते कि परमेश्वर बुराई और दु:ख की अनुमति क्यों देता है। कारणों को न जानने के बाद भी परमेश्वर पर भरोसा करना विश्वास की अन्धी छलांग लगाना नहीं है। इसकी अपेक्षा, हम उन बातों पर भरोसा करते हैं जिन्हें हम नहीं समझते हैं क्योंकि हम उन गतिविधियों में उसकी विश्वासयोग्यता को देखते हैं जिसे हम समझते हैं।

यदि हम बाइबल को ध्यान से पढ़ते हैं, तो हम परमेश्वर के निर्दयता से भरे हुए कार्य देखने की अपेक्षा, उसे अपने प्रेम के लिए कार्य करते हुए देखते हैं। उदाहरण के लिए, अय्यूब की पुस्तक को अक्सर एक निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध परमेश्वर के दु:खद कार्य के उदाहरण के रूप में इंगित किया जाता है। पुस्तक यह घोषणा करती है कि अय्यूब उस पर आने वाले कष्टों के प्रति निर्दोष था, जो कि नास्तिक के दावे का पक्ष लेता है। परन्तु ऐसा दावा करना यह प्रमाणित करता है कि परमेश्वर उदासीनता के साथ धोखा देता है, जो कि अय्यूब की पुस्तक के प्रति सतही समझ है।

कुलपतियों के समय निकट पूर्व की जातियों में, एक सामान्य धारणा यह थी कि परमेश्वर ने सदैव धर्मी को आशीषित किया और अधर्मियों पर दु:ख को ले आया। अय्यूब की पुस्तक उस धर्मविज्ञान के विरुद्ध एक तर्कपूर्ण रचना है। कहानी बताती है कि परमेश्वर के न्याय के बारे में मनुष्य के दृष्टिकोण को सुधारे जाने की आवश्यकता है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि परमेश्वर प्रतिशोध के साधन के रूप में दु:ख का उपयोग करने तक ही सीमित नहीं है। वह इसका उपयोग लोगों को सांसारिक बातों से दूर करने के लिए करता है जो उन्हें आसानी से प्रलोभित कर लेती हैं। इसके अतिरिक्त, अय्यूब लोगों को क्रूस के ऊपर प्रायश्चित के परमेश्वर के कार्य को समझने के निकट ले आता है। यदि मानव जाति यह सोचती रहती कि परमेश्वर किसी भी निर्दोष व्यक्ति को पीड़ित नहीं कर सकता है, तो हम संसार के छुटकारे के लिए परमेश्वर की योजना को बिल्कुल ही खो देते। क्योंकि परमेश्वर के लिए एक पूरी तरह से निर्दोष व्यक्ति (यीशु मसीह) को पीड़ा की अनुमति देना इसलिए था ताकि वह अपने लोगों के लिए उद्धार को ले आ सके। इसलिए अय्यूब की यह पुस्तक छुटकारे के इतिहास में एक अमूल्य योगदान है।

सारांश में, सन्देह करने वाले को यह दावा करने में बहुत बड़ा बोझ उठाना पड़ेगा कि परमेश्वर के कार्यों में निर्दयता पाई जाती है। अपने सन्दर्भ में, बाइबल के अंश जो परमेश्वर को निर्दयी के रूप में चित्रित करते हैं, वास्तव में ऐसी कोई बात नहीं करते हैं। सच्चाई तो यह है कि, जब हम पवित्रशास्त्र को उचित समझ के साथ देखते हैं, तो पाते हैं कि परमेश्वर के कार्य सदैव उसके पवित्र और सिद्ध चरित्र से प्रेरित हैं, और उसके अनुरूप हैं।

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