इसका क्या अर्थ है कि लोहा लोहे को चमका देता है?



प्रश्न: इसका क्या अर्थ है कि लोहा लोहे को चमका देता है?

उत्तर:
यह वाक्यांश "लोहा लोहे को चमका देता है" नीतिवचन 27:17 में प्रगट होता है: "जैसे लोहा लोहे को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है।" लोहे के ब्लेडों अर्थात् फलकों को आपस में एक साथ रगड़ने से लाभ प्राप्त होता है; इनके किनारे तेज अर्थात् धारदार हो जाते हैं, जिससे चाकू काटने और टुकड़े करने के कार्य में अधिक कुशल बन जाता है। ठीक इसी तरह से परमेश्‍वर का वचन एक 'दोधारी तलवार' है (इब्रानियों 4:12), और यही वह वस्तु है, जिसके द्वारा हम एक दूसरे को — सभाओं, संगति और आपसी वार्तालाप के समयों में और अधिक धारदार बना देते हैं।

नीतिवचन साथ ही एक दूसरे के साथ संगति को किए जाने की आवश्यकता की ओर संकेत देता है। मनुष्य को अकेला रहने के लिए निर्मित नहीं किया गया था, क्योंकि इस बात को प्रभु परमेश्‍वर क्या यहाँ तक कि पतन से पहले ही नहीं कहता है (उत्पत्ति 2:18)? तब, मनुष्य के पाप में गिर जाने के पश्चात्, हमें कितना अधिक मसीह में अपने भाइयों और बहिनों के साथ संगति और प्रार्थना में इकट्ठा रहने की आवश्यकता है। इसकी पहचान बड़ी स्पष्टता के साथ आरम्भिक कलीसिया के सन्तों के साथ की गई है (प्रेरितों के काम 2:42-47) जिन्होंने स्वयं को शिक्षा देने, संगति रखने, रोटी तोड़ने और प्रार्थना के लिए "समर्पित" कर दिया था — ये सभी ऐसी सामूहिक गतिविधियाँ थीं, जिसने एक दूसरे को धारदार बनने के अवसरों को प्रदान किया। इसका परिणाम यह था कि सभी लोगों के ऊपर "भय छा गया" था और जब वे एक दूसरे के साथ मुलाकात करते थे; तब वे उस कृपा के लिए स्तुति से भरे हुए होते थे, जिसे उन्होंने एक दूसरे में प्राप्त किया था।

उपरोक्त नीतिवचन से हम दो बातों को प्राप्त करते हैं। सबसे पहले, दो लोगों का प्रभु के नाम पर मुलाकात करना सदैव ही आशीष को ले आने की गारंटी प्रदान करता है। यह अनुग्रह का एक ऐसा साधन है, जिसकी प्रतिज्ञा स्वयं परमेश्‍वर ने की थी — अर्थात् जहाँ उसके नाम पर दो या दो से अधिक इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके मध्य में होता हूँ (मत्ती 18:20)। साथ ही, हम मलाकी में इस जैसे समान अर्थों को उनके लिए देखते हैं, जो प्रभु परमेश्‍वर का भय मानते हैं, और एक दूसरे से वार्तालाप करते हैं, और परमेश्‍वर उनकी सुनता है और उनका उत्तर देता है (मलाकी 3:16)। जब हम मसीही संगति में एक दूसरे को धारदार करते हैं, तो परमेश्‍वर स्वर्ग से सुनता है और प्रसन्न होता है। उसके बारे में कहा हुआ एक भी ऐसा शब्द नहीं है, जो उसके ध्यान को लाता है, परन्तु ध्यान से बच निकलता है।

शाऊल के बेटे योनातान और दाऊद के सम्बन्धों में ईश्‍वरीय एकता की सुगन्ध को बहुत ही अच्छी रीति से देखा जा सकता है। जब शाऊल ने दाऊद का पीछा किया, तब योनातान ने दाऊद को "परमेश्‍वर में सामर्थ्य पाने के लिए सहायता प्रदान की" (1 शमूएल 23:16), जो हमें हमारी दूसरी बात की ओर ले जाती है। लोहे का लोहे को चमकाना मसीह की व्यवस्था को पूरा करने का एक अवसर है। प्रेरित पौलुस कहता है कि हम उन सभी बोझों को उठाते और साझा करते हैं, जिनका सामना हम प्रतिदिन करते हैं, व्यक्तिगत् पापों के ऊपर विलाप करते हैं, परामर्श देते हैं कि इनका पश्चाताप उत्तम रीति से कैसे करें और इनके ऊपर जय पाने के लिए हर्षित होते हैं। यह वही "राजकीय व्यवस्था" है, जिसका उल्लेख याकूब 2: 8 में वर्णित किया गया है, जहाँ हमें एक-दूसरे के साथ प्रेम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

उसी रूपक की ओर लौटते हुए, यदि चाकू की धार कमजोर है, तौभी यह एक चाकू ही रहता है, यद्यपि, अभी यह कम प्रभावी, कम उपयोगी रहता है। इसलिए आइए हमें इस बात को प्रोत्साहित करना चाहिए कि हम एक साथ मिलें, एक दूसरे को प्रोत्साहित करें, प्रार्थना करें, उपदेश दें, परमेश्‍वर के वचन को साझा करें, परमेश्‍वर के वचन के ऊपर प्रार्थना करें और अपनी स्थानीय कलीसिया की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करें, ताकि हम सेवा के उस क्षेत्र में और अधिक धारदार अर्थात् प्रभावी हो सकें, जिसे प्रभु ने प्रत्येक को सौंपा है। परन्तु, बहुत बार, जो बातें आधुनिक कलीसिया की संगति में होती हैं, वे भोजन और मनोरंजन के ऊपर केन्द्रित होती हैं, परन्तु परमेश्‍वर के वचन से एक दूसरे को धारदार बनाने के ऊपर नहीं।

अन्त में, एक चाकू जिसे तेज किया गया है, वह भी अधिक चमक को उत्पन्न करता है, क्योंकि उसका सारा धुंधलापन उसकी सतह से दूर हो जाता है। ठीक इसी तरह से, हम प्रभु के लिए तब और अधिक उत्तम रीति से चमक जाते हैं, जब हम उपरोक्त बातों को निरन्तर स्थाई रूप से करते रहते हैं, जिनमें से सभी हमें एक दूसरे के साथ एकता में बाँध देती हैं। "देखो, यह क्या ही भली और मनोहर बात है कि भाई लोग आपस में मिले रहें" (भजन संहिता 133:1)। इसलिए, जैसा कि इब्रानियों का लेखक कहता है, "और प्रेम और भले कामों में उस्काने के लिये एक दूसरे की चिन्ता किया करें। और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना ने छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो त्यों त्यों और भी अधिक यह किया करो" (इब्रानियों 10:24-25)।

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