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प्रश्न

बाइबल की प्रेरणा सम्बन्धी विभिन्न सिद्धान्त क्या है?

उत्तर


प्रेरणा का सिद्धान्त यह है कि बाइबल परमेश्‍वर-श्‍वसित है और इसलिए विश्‍वास और अभ्यास के लिए हमारे लिए अचूक नियम है। यदि बाइबल केवल मानवीय कल्पना का कार्य होता, तो इसके सिद्धान्तों और नैतिक दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए कोई अनिवार्य कारण ही नहीं है। बाइबल स्वयं के लिए साहसिक रूप से परमेश्‍वर-श्‍वसित होने का दावा करती है: "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है, ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए" (2 तीमुथियुस 3:16-17)। इस वचन में हम पवित्रशास्त्र के बारे में दो बातों के ऊपर ध्यान देते हैं: 1) यह "परमेश्‍वर के द्वारा प्रेरित" है और 2) यह मसीही जीवन के लिए "लाभदायक" है।

प्रेरणा के सम्बन्ध में चार दृष्टिकोण पाए जाते हैं:
1. प्रेरणा का नव-रूढ़िवादी दृष्टिकोण
2. प्रेरणा का श्रुतिलेखन दृष्टिकोण
3. सीमित प्रेरणा का दृष्टिकोण
4. पूर्ण मौखिक प्रेरणा का दृष्टिकोण

प्रेरणा का नव-रूढ़िवादी दृष्टिकोण परमेश्‍वर के पारलौकिक होने पर जोर देता है। नव-रूढ़िवादी शिक्षा देता है कि परमेश्‍वर हम से इतना अधिक भिन्न है कि उसे जानने के लिए हमारे पास एकमात्र तरीका प्रत्यक्ष प्रकाशन का ही है। परमेश्‍वर के पारलौकिक होने के इस दृष्टिकोण ने स्वाभाविक धर्मविज्ञान की किसी भी अवधारणा के होने से खण्डन किया है (अर्थात्, यह कि परमेश्‍वर को उसकी सृष्टि के माध्यम से जाना जा सकता है)। इसके अतिरिक्त, नव-रूढ़िवादी दृष्टिकोण खण्डन करता है कि बाइबल परमेश्‍वर का वचन है। इसकी अपेक्षा, बाइबल परमेश्‍वर के वचन, यीशु के लिए एक गवाह या एक मध्यस्थ है। प्रेरणा का नव-रूढ़िवादी सिद्धान्त यह है कि बाइबल में दिए हुए वचन परमेश्‍वर के वचन नहीं हैं, परन्तु वे नाशवान लोगों के द्वारा लिखे हुए शब्द हैं। बाइबल केवल इस अर्थ में "प्रेरित" है कि परमेश्‍वर कभी-कभी व्यक्तियों से बात करने के लिए उनके शब्दों का उपयोग कर सकता है।

प्रेरणा का नव-रूढ़िवादी सिद्धान्त कहीं से भी प्रेरणा नहीं है। यदि बाइबल नाशवान मनुष्य के द्वारा त्रुटिपूर्ण उत्पाद है, तो वास्तव में इसका कोई मूल्य नहीं है, कम से कम अन्य पुस्तकों से अधिक नहीं है। परमेश्‍वर केवल बाइबल के माध्यम से कथाओं के कार्यों के माध्यम से हमें "बोला" था।

प्रेरणा का श्रुतिलेखन दृष्टिकोण परमेश्‍वर को पवित्रशास्त्र का लेखक और व्यक्तिगत मानवीय एजेंटों को सचिवों के रूप में देखता है। परमेश्‍वर ने बात की, और किसी व्यक्ति ने इसे लिखा। इस विचार में कुछ गुण हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि पवित्रशास्त्र के कुछ भाग ऐसे हैं जिनमें परमेश्‍वर अनिवार्य रूप से कहता है कि, "इसे लिख" (उदाहरण के लिए, यिर्मयाह 30:2), परन्तु सारा पवित्रशास्त्र इस तरीके से नहीं रचा गया है। पंचग्रन्थ अनिवार्य रूप से प्रतिज्ञा की हुई भूमि में बसने से पहले यहूदी लोगों का एक इतिहास है। जबकि मूसा प्राथमिक लेखक है, वहीं पचंग्रन्थ के अधिकांश लोगों को मूसा के लेखनकार्य के ऊपर सम्पादकीय काम करने की आवश्यकता थी, क्योंकि उन्होंने निस्संदेह इतिहास के कुछ भाग के लिए पहले के वृतान्त को संकलित किया था। लूका ने अपने सुसमाचार की प्रस्तावना में कहा है कि उसने लिखने से पहले यीशु के जीवन की घटनाओं के ऊपर विस्तृत शोध की थी (लूका 1:1-4)। भविष्यद्वाणियों की कई पुस्तकें भविष्यद्वक्ताओं के जीवन को पत्रिकाओं की तरह पढ़ती हैं। अन्तिम बात यह है कि श्रुतिलेखन का दृष्टिकोण पवित्रशास्त्र के कुछ भाग की ही व्याख्या करता है, परन्तु सारे की नहीं या कम से कम इसके अधिकांश भाग की नहीं।

सीमित प्रेरणा का दृष्टिकोण श्रुतिलेखन दृष्टिकोण के विपरीत दृष्टिकोण है। जबकि बाद वाला दृष्टिकोण पवित्रशास्त्र को मुख्य रूप से परमेश्‍वर के कार्य के रूप में कम से कम मानवीय योगदान के रूप में देखता है, तो पहले वाले दृष्टिकोण में पवित्रशास्त्र को परमेश्‍वर की ओर से सीमित सहायता के साथ मुख्य रूप से मनुष्य का काम ही माना जाता है। सीमित प्रेरणा का दृष्टिकोण कहता है कि परमेश्‍वर ने मानवीय लेखकों को निर्देशित किया परन्तु उन्हें तथ्यात्मक और ऐतिहासिक त्रुटियों की अनुमति देने के साथ ही उन्हें अपने लेखन कार्यों में अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता भी दी। सौभाग्य से, पवित्र आत्मा ने सैद्धान्तिक त्रुटियों को रोक दिया। इस दृष्टिकोण में समस्या यह है कि, यदि बाइबल अपने ऐतिहासिक विवरण में त्रुटि का सामना कर रही है, तो हम धर्मसैद्धान्तिक विषयों में इस पर कैसे भरोसा कर सकते हैं? सीमित प्रेरणा के साथ, बाइबल की विश्‍वसनीयता सन्देह में आ जाती है। यह विचार इस तथ्य की भी अनदेखा करता है कि उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक बाइबल की छुड़ौती की कहानी मानवीय इतिहास की पृष्ठभूमि के विरूद्ध बताई गई है — यह सिद्धान्त इतिहास के ताने-बाने में बुना हुआ है। हम मनमाने ढंग से यह नहीं कह सकते कि इतिहास गलत है और फिर यह बताए कि इसमें धर्मसैद्धान्तिक सत्य का तत्व है।

अन्तिम दृष्टिकोण और प्रेरणा का नव-रूढ़िवादी दृष्टिकोण, पूर्ण मौखिक प्रेरणा का दृष्टिकोण है। पूर्ण शब्द का अर्थ "पूर्ण या पूरे" से है, और मौखिक शब्द का अर्थ "पवित्रशास्त्र के सारे वचन" से है। इस तरह पूर्ण, मौखिक प्रेरणा का दृष्टिकोण यह है कि बाइबल में प्रत्येक वचन परमेश्‍वर की ओर से आया हुआ वचन है। यह केवल विचारों या शब्दों से ही प्रेरित नहीं, अपितु इसके शब्द स्वयं में ही प्रेरित हैं। दूसरा तीमुथियुस 3:16-17 एक विशेष यूनानी शब्द, थियोफ़िनोटोस का उपयोग करता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है "ईश्‍वर-श्‍वसित" या प्रेरणा-प्रदत्त से है। पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर के मुँह से "फूँका गया" है। बाइबल के शब्द परमेश्‍वर के शब्द हैं।

इसके अतिरिक्त, "क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई, पर भक्‍त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्‍वर की ओर से बोलते थे" (2 पतरस 1:21)। यह सन्दर्भ हमें एक संकेत देता है कि परमेश्‍वर ने मानवीय लेखकों को कैसे प्रेरित किया। लोगों ने बोला (या लिखा) "जब वे पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाते थे।" "उभारे जाने" के लिए क्रिया का उपयोग हवा से चलने वाले एक समुद्री जहाज के पाल से और पानी के द्वारा समुद्री जहाज को आगे ले जाने के लिए किया जाता है। जब मानवीय लेखक कागज के ऊपर लेखनी चला रहे थे, तब पवित्र आत्मा उन्हें "साथ ले गया" या उसने उन्हें उभार दिया ताकि वे जो कुछ लिखें वह परमेश्‍वर के द्वारा "श्‍वसित" शब्द हो। इसलिए, लेखनकार्यों में लेखकों के व्यक्तित्व को बनाए रखा गया है (पौलुस की शैली याकूब और यूहन्ना या पतरस की शैली से बहुत अधिक भिन्न है), शब्द स्वयं में वही हैं, जिन्हें परमेश्‍वर लिखवाना चाहता था।

बाइबल की प्रेरणा का उचित विचार कलीसिया का वह रूढ़िवादी दृष्टिकोण है, जो यह कहता है कि बाइबल पूर्ण रूप से, ईश्‍वरीय प्रेरित परमेश्‍वर का वचन है।

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