परमेश्वर निर्दोषों को पीड़ित किए जाने की अनुमति क्यों देता है?


प्रश्न: परमेश्वर निर्दोषों को पीड़ित किए जाने की अनुमति क्यों देता है?

उत्तर:
संसार में बहुत ज्यादा दु:ख है, और यह सभी के द्वारा एक स्तर या दूसरे स्तर पर महसूस किया जाता है। कभी-कभी, लोग अपने स्वयं के कमजोर विकल्पों, पापपूर्ण कार्यों या स्वयं की इच्छा से गैर-दायित्व पूर्ण कार्यों को किए जाने के कारण इनके प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में पीड़ित होते हैं; इन घटनाओं में, हम नीतिवचन 13:15 की सच्चाई को देखते हैं कि, “विश्‍वासघातियों का मार्ग कड़ा अर्थात् उजड़ा हुआ होता है।” परन्तु विश्वासघात के द्वारा पीड़ित होने वालों के बारे में क्या कहा जाए? उन निर्दोष लोगों के बारे में क्या कहा जाए जो पीड़ा को सहन करते हैं? परमेश्वर ऐसा क्यों होने देता है?

बुरे व्यवहार और बुरी परिस्थितियों के बीच में और इसके विपरीत, अच्छे व्यवहार और आशीष के बीच में सम्बन्ध की खोज करने का प्रयास करना मानवीय स्वभाव है। पाप को दु:ख के साथ जोड़ने की इच्छा इतनी अधिक प्रबल है कि यीशु ने इस विषय के ऊपर कम से कम दो बार बातचीत की है। “जाते हुए उसने एक मनुष्य को देखा जो जन्म से अन्धा था। उसके चेलों ने उससे पूछा, ‘हे रब्बी, किसने पाप किया था कि यह अन्धा जन्मा, इस मनुष्य ने या इसके माता-पिता ने?’ यीशु ने उत्तर दिया, ‘न तो इसने पाप किया था, न इसके माता-पिता ने; परन्तु यह इसलिये हुआ कि परमेश्‍वर के काम उसमें प्रगट हों’“ (यूहन्ना 9:1-3)। शिष्यों ने यह मानने की गलती की थी कि निर्दोष कभी भी दुख को नहीं झेलेंगे और उन्होंने अन्धे व्यक्ति (या उसके माता-पिता) को व्यक्तिगत् दोष के अधीन कर दिया। यीशु ने उनकी सोच को सही करते हुए कहा कि, “यह इसलिये हुआ कि परमेश्‍वर के काम उसमें प्रगट हों” (वचन 3)। उस व्यक्ति का अन्धापन व्यक्तिगत् पाप का परिणाम नहीं था; अपितु, उसके द्वारा दु:ख उठाने के लिए परमेश्वर के पास एक उच्च उद्देश्य था।

एक अन्य समय में, यीशु ने एक दुर्घटना में मारे गए कुछ लोगों की मृत्यु पर टिप्पणी की: “क्या तुम समझते हो कि वे अठारह जन जिन पर शीलोह का गुम्मट गिरा, और वे दब कर मर गए — यरूशलेम के और सब रहनेवालों से अधिक अपराधी थे? मैं तुमसे कहता हूँ कि नहीं; परन्तु यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम सब भी इसी रीति से नष्‍ट होगे” (लूका 13:4-5)। इस घटना में, यीशु ने इस धारणा को एक बार फिर से परिभाषित किया कि त्रासदी और पीड़ा व्यक्तिगत् पाप का परिणाम नहीं है। ठीक उसी समय, यीशु ने इस तथ्य के ऊपर जोर दिया कि हम पाप और उसके प्रभावों से भरे हुए संसार में रहते हैं; इसलिए, सभी को पश्चाताप करना चाहिए।

यह हमें इस बात पर विचार करने की ओर ले जाता है कि तकनीकी रूप से कहना कि क्या “निर्दोष,” विद्यमान हैं भी या नहीं। बाइबल के अनुसार, “सभी ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं” (रोमियों 3:23)। इसलिए, पापी होने के अर्थ में कोई भी “निर्दोष” नहीं है। हम सभी आदम से धरोहर में मिले पापी स्वभाव के साथ जन्में हैं। और, जैसा कि हमने पहले ही देख लिया है, हर कोई पीड़ित या दुखित होता है, भले ही दु:ख किसी विशेष व्यक्तिगत् पाप से जुड़ा हो या नहीं। पाप के प्रभाव के कारण सब कुछ समाप्त हो जाता है; संसार पाप में गिरा हुआ है, और इसके परिणाम स्वरूप सारी सृष्टि दुखित होती है (रोमियों 8:22)।

मन का सब से अधिक दुखित होना एक बच्चे की पीड़ा से पता चलता है। बच्चे निर्दोषता के सबसे अधिक निकट होते हैं, जैसा कि हमने अभी तक के संसार में देखा है, और उनके लिए पीड़ित होना वास्तव में दु:खद है। कभी-कभी, दूसरों के पाप के कारण निर्दोष बच्चे पीड़ित होते हैं जैसे कि: उपेक्षा, दुर्व्यवहार, नशे में गाड़ी चलाना, इत्यादि। इन घटनाओं में, हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि दु:ख व्यक्तिगत् पाप (केवल उनका ही नहीं) का परिणाम है, और हम शिक्षा पाते हैं कि हमारे पाप सदैव हमारे आसपास रहने वाले दूसरों लोगों को प्रभावित करते हैं। अन्य समयों में, निर्दोष बच्चे इस बात से पीड़ित होते हैं क्योंकि जिसे कुछ लोग “परमेश्वर का काम” कह सकते हैं जैसे: प्राकृतिक आपदाएँ, दुर्घटनाएँ, बचपन में पाए जाने वाला कैंसर, इत्यादि। यहाँ तक कि इन घटनाओं में भी, हम कह सकते हैं कि पीड़ा पाप का परिणाम है, सामान्य रूप से कहना, ऐसा इसलिए है क्योंकि हम एक पापी संसार में रहते हैं।

शुभ समाचार यह है कि परमेश्वर ने हमें निरर्थक कष्ट उठाने के लिए यहाँ नहीं रख छोड़ा है। हाँ, निर्दोष पीड़ित होते हैं (अय्यूब 1-2 को देखें), परन्तु परमेश्वर उस पीड़ा से उनको छुड़ा सकता है। हमारे प्रेमी और दयालु परमेश्वर के पास अपने तीन-गुना उद्देश्य को पूरा करने के लिए उस पीड़ा का उपयोग करने की एक आदर्श योजना है। सबसे पहले, वह हमें स्वयं की ओर आकर्षित करने के लिए दर्द और पीड़ा का उपयोग करता है ताकि हम उसके साथ बने रहें। यीशु ने कहा है कि, “संसार में तुम्हें क्लेश होता है” (यूहन्ना 16:33)। परीक्षाएँ और संकट जीवन में घटित होने वाली कुछ असामान्य बातें नहीं हैं; वे इस बात का हिस्सा हैं कि पतित संसार में मनुष्य होने का क्या अर्थ होता है। मसीह में हमारे पास एक लंगर है जो जीवन के सारे तूफानों को थामे रखता है, परन्तु, यदि हम कभी उन तूफानों में से होकर नहीं जाते हैं, तो हमें इस बात का कैसे पता चलेगा? यह निराशा और दुःख के समय में होता है कि हम परमेश्वर तक पहुँचते हैं, और, यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो हम सदैव उसे वहाँ पाते हैं जो हमें विश्राम देने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है और हमें इन सब बातों में थामे हुए है। इस तरह से, परमेश्‍वर हम पर अपनी विश्वासयोग्ता को प्रमाणित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि हम उसकी घनिष्ठता में बने रहेंगे। एक अतिरिक्त लाभ यह है कि जैसे ही हम परीक्षाओं के माध्यम से परमेश्वर के विश्राम का अनुभव करते हैं, वैसे ही हम दूसरों को उसी तरीके से विश्राम देने में सक्षम हो जाते हैं (2 कुरिन्थियों 1:4)।

दूसरा, वह हमें यह प्रमाणित करता है कि इस जीवन में अनिवार्य रूप से आने वाली पीड़ा और दर्द के माध्यम से हमारा विश्वास वास्तविक है। हम दु:ख का उत्तर कैसे देते हैं, विशेषकर जब हम गलत कामों के लिए निर्दोष होते हैं, यह हमारे विश्वास की वास्तविकता से निर्धारित होता है। जो लोग यीशु में हैं जो, “विश्‍वास का कर्ता और सिद्ध करनेवाला” है (इब्रानियों 12:2), पीड़ा के द्वारा कुचले नहीं जाएंगे, परन्तु वे विश्वास के साथ परीक्षा के माध्यम से सफलता को प्राप्त करेंगे, जिसकी परीक्षा “आग के द्वारा” की गई है ताकि वह “यीशु मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा और महिमा और आदर का कारण ठहरे” (1 पतरस 1:7)। विश्वासयोग्य लोग परमेश्वर की ओर मुठ्ठी नहीं दिखाते हैं या उसकी भलाई के ऊपर प्रश्न नहीं उठाते हैं; अपितु, वे “इसे पूरे आनन्द की बात समझते हैं” (याकूब 1:2), यह जानते हुए कि परीक्षाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि वे वास्तव में परमेश्वर की सन्तान हैं। “धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा में स्थिर रहता है, क्योंकि वह खरा निकलकर जीवन का वह मुकुट पाएगा जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करनेवालों से की है” (याकूब 1:12)।

अन्त में, परमेश्वर दु:ख के द्वारा हमारी आँखों को इस संसार से हटाने और उन्हें आने वाले संसार की ओर लगाने के लिए उपयोग करता है। बाइबल हमें निरन्तर इस संसार की चीज़ों में फँसने के लिए नहीं अपितु आने वाली संसार के लिए तत्पर रहने के लिए प्रेरित करती है। निर्दोष इस संसार में पीड़ित होते हैं, परन्तु यह संसार और इसमें जो कुछ भी है वह सब बीत जाएगा; परमेश्वर का राज्य शाश्वत है। यीशु ने कहा, “मेरा राज्य इस संसार का नहीं है” (यूहन्ना 18:36), और जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, वे इस जीवन की बातों के अच्छे या बुरे, को कहानी के अन्त के रूप में नहीं देखते हैं। यहाँ तक कि हम जो कष्ट सहते हैं, वे चाहे जितने भी भयानक क्यों न हो, “उस महिमा के सामने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं” (रोमियों 8:18)।

क्या परमेश्वर सारे दु:खों को रोक सकता है? नि:सन्देह वह ऐसा कर सकता था। परन्तु वह हमें विश्वास दिलाता है कि “सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। अन्त में, दु:ख — यहाँ तक कि निर्दोषों का दु:ख — “उन सभी बातों” का हिस्सा है जिसे परमेश्वर अपने अच्छे उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उपयोग करता है। उनकी योजना पूर्ण रूप से सही है, उसका चरित्र निर्दोष है, और जो लोग उन पर भरोसा करते हैं, वे निराश नहीं होंगे।

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