माता-पिता के द्वारा अपने बच्चों के लिए विरासत छोड़ने के बारे में बाइबल क्या कहती है?


प्रश्न: माता-पिता के द्वारा अपने बच्चों के लिए विरासत छोड़ने के बारे में बाइबल क्या कहती है?

उत्तर:
विरासत अर्थात् धरोहर या मीरास पुराने नियम में कुलपतियों के द्वारा अपने पुत्रों (और कभी-कभी पुत्रियों को) को दिए गए सम्मान और सहायता से भरा हुए एक उपहार था। यह परिवार के प्रबन्ध और स्तर को बनाए रखने के लिए थी। पुराने नियम के पहले भाग में विरासत की अधिकांश घटनाएँ परमेश्‍वर को उद्धृत करती हैं, जिसने इस्राएलियों को प्रतिज्ञा किए हुए देश को प्रदान किया – वह ऐसा स्वर्गीय पिता है, जो अपने पुत्रों और पुत्रियों को प्रदान करता है। क्योंकि भूमि को व्यक्तिगत् रूप से परिवारों को परमेश्‍वर के द्वारा दिया गया था, इसलिए लोगों को अपनी भूमि को स्थायी रूप से बेच देने की अनुमति नहीं थी। यदि उन्हें इसे बेचने की आवश्यकता होती थी, तो इसे जुबली के वर्ष के समय वापस प्राप्त किया जा सकता था (लैव्यव्यवस्था 25:23-38)। बाइबल ने पारिवारिक सम्पत्ति को विरासत में दिए जाने के लिए विशेष दिशानिर्देश दिए: सबसे बड़ा पुत्र दोगुणे अंश का उत्तराधिकारी था (व्यवस्थाविवरण 21:15-17); यदि कोई पुत्र नहीं था, तो पुत्रियों को अपने पिता की भूमि का वारिस होने की अनुमति थी (गिनती 27:8); प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी की अनुपस्थिति में, एक कृपापात्र दास या एक दूर के सम्बन्धी का बच्चा भूमि का उत्तराधिकारी हो सकते था (उत्पत्ति 15:2; गिनती 27:9-11)। भूमि किसी अन्य गोत्र के पास कभी भी नहीं जा सकती थी। भूमि को और को दिए जाने का विषय यह सुनिश्‍चित करना था कि विस्तारित परिवार को सहायता और जीवन यापन करने के लिए साधन प्राप्त हो सके। विरासत को ही इसके लिए सही माना गया था और केवल नीतिवचन 13:22 इसे एक विशेष गुण के रूप में बात करता है।

नया नियम सांसारिक विरासत की बात नहीं करता अपितु आत्मिक विरासत की बात करता है। वास्तव में, लूका 12:13-21 में, यीशु पृथ्वी पर मिलने वाली विरासत के महत्व को कम इसलिए कर देता है, क्योंकि यह लालच और धन के साथ जुनून का कारण बन सकता है। स्वर्ग में खजाने को इकट्ठा करना कहीं उत्तम है। हमारी विरासत, इस्राएलियों की तरह है, जो परमेश्‍वर की ओर से है (प्रेरितों 20:32; इफिसियों 1:11, 14, 18)। और, अब्राहम की तरह (इब्रानियों 11:8, 13), हमें इस जीवन में हमारी विरासत नहीं मिलेगी (1 पतरस 1:4)। यह विरासत अर्थात् धरोहर या मीरास क्या है? भजन संहिता 37:11 और मत्ती 5:5 कहता है कि यह विरासत हमारे लिए पूरी पृथ्वी है। याकूब 2:5 कहता है कि यह परमेश्‍वर का राज्य है, और इब्रानियों 11:16 इसे एक स्वर्गीय देश कहता है। पहला कुरिन्थियों 2:9 कहता है कि यह इतनी अधिक अद्भुत है कि "जो बातें आँख ने नहीं देखीं और कान ने नहीं सुनीं, और जो बातें मनुष्य के चित में नहीं चढ़ीं, वे ही हैं जो परमेश्‍वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं।” और प्रकाशितवाक्य 21 इसे एक नए स्वर्ग और नई पृथ्वी के रूप में वर्णन करता है, जहाँ परमेश्‍वर उसके लोगों के बीच में रहेगा और आँसू, विलाप, पीड़ा और मृत्यु को दूर करेगा।

विश्‍वासियों के रूप में, हम पुराने नियम की व्यवस्था से बंधे हुए नहीं हैं। इसकी अपेक्षा, हमें केवल दो ही सबसे बड़ी आज्ञाओं - परमेश्‍वर से प्रेम करना और दूसरों से प्रेम करना का पालन करना है (मत्ती 22:34-40)। पुराना नियम व्यावहारिक आदर्शों को प्रदान करता है कि इन सबसे बड़ी आज्ञाओं को कैसे पूरा किया जाए। विरासत के सम्बन्ध में, यह माता-पिता का आदर्श है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार की देखभाल होती रहे। आधुनिक समय में, इसका अर्थ भूमि, या यहाँ तक कि सांसारिक सम्पत्तियों के लिए आवश्यक नहीं है। इसमें बच्चों के लिए शिक्षा को सुनिश्‍चित करना, या उनको व्यवसाय में प्रशिक्षण देने के लिए एक अच्छे चरित्र को उनमें निर्मित करना सम्मिलित हो सकता है। परन्तु, जब अधिकांश लोग अपने बच्चों के लिए विरासत छोड़ने वाले माता-पिता के बारे में सोचते हैं, तो यह सांसारिक सम्पत्ति के सम्बन्ध में ही होता है। बाइबल निश्‍चित रूप से माता-पिता के लिए इस विचार का समर्थन करती है कि वे अपनी सांसारिक सम्पत्ति/धन/भूमि को अपने बच्चों के लिए छोड़ दें। साथ ही, माता-पिता को अपने बच्चों के लिए विरासत को छोड़ने के लिए बचत करने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए, ऐसा करना स्वयं को उपेक्षित करना है। न ही इसे कभी भी आत्म ग्लानि या दायित्व का विषय होना चाहिए। इसकी अपेक्षा, यह प्रेम की एक गतिविधि होनी चाहिए, बच्चों के प्रति अपने प्रेम और सराहना को व्यक्त करने का एक अन्तिम तरीका होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माता-पिता का दायित्व यह सुनिश्‍चित करना है कि यदि बच्चे मसीह का पालन करते हैं, तो वे विरासत को पाने के अधिकारी होने के विषय में जानकारी रखते हों। माता-पिता को अपने बच्चों को परमेश्‍वर की अपेक्षाओं को पूरा किए जाने के बारे में सिखाना चाहिए (व्यवस्थाविवरण 6:6-7; इफिसियों 6:4) और उन्हें अपने बच्चों को मसीह के पास लाना चाहिए (मरकुस 10:14)। इस तरह, माता-पिता अपने बच्चों को सबसे बड़ा सम्भव तरीका उपलब्ध करा सकते हैं।

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