पाप का धर्मविज्ञान क्या है?


प्रश्न: पाप का धर्मविज्ञान क्या है?

उत्तर:
पाप का धर्मसिद्धान्त पाप के विषय में अध्ययन है। पाप का धर्मसिद्धान्त इस बात से सम्बन्धित है कि पाप कैसे उत्पन्न हुआ, यह मनुष्य को कैसे प्रभावित करता है, और मृत्यु के पश्‍चात् इसका क्या परिणाम होगा। पाप का अर्थ अनिवार्य रूप से "निशाने से चूक जाना" होता है। हम सब धार्मिकता के लिए परमेश्‍वर के द्वारा दिए हुए निशाने से चूक गए हैं (रोमियों 3:23)। पाप का धर्मसिद्धान्त, इस तरह से व्याख्या करता है कि हम निशाने से क्यों चूक जाते हैं, हम निशाने से कैसे चूक जाते हैं, और निशाने से चूक जाने का परिणाम क्या है। पाप का धर्मसिद्धान्त में ये कुछ महत्वपूर्ण पाए जाने वाले प्रश्‍न हैं:

पाप की परिभाषा क्या है? परमेश्‍वर की व्यवस्था के प्रति अपराध (1 यूहन्ना 3:4) और परमेश्‍वर के विरूद्ध विद्रोह (व्यवस्थाविवरण 9:7; यहोशू 1:18) के रूप में बाइबल में पाप का वर्णन किया गया है ।

क्या हम सभों को पाप आदम और हव्वा से प्राप्त हुआ है? रोमियों 5:12 इसके बारे में बात करता है, "इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया।"

क्या सभी पाप परमेश्‍वर के तुल्य हैं? पाप के स्तर दिए गए हैं — कुछ पाप दूसरों की अपेक्षा अधिक बुरे हैं। साथ ही, शाश्‍वतकालीन परिणामों और उद्धार दोनों के सम्बन्ध में, सभी पाप समान हैं। प्रत्येक पाप अनन्तकालीन दण्ड की ओर ले जाएगा (रोमियों 6:23)।

मुझे कैसे पता चलेगा कि कोई बात पाप है? ऐसी बातें पाई जाती हैं, जिन्हें बाइबल विशेष रूप से उल्लेख करती है और जिन्हें पाप होने की घोषणा करती है। अधिक कठिन विषय यह निर्धारित करने में है कि बाइबल सीधे उन क्षेत्रों को सम्बोधित नहीं करती है, जहाँ पाप पाया जाता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि पाप जैसे निराशा में डाल देने वाले विषय का अध्ययन मसीही विश्‍वासी के लिए अनुत्पादक का कार्य करेगा। क्योंकि अन्त में, क्या हम मसीह के लहू के कारण पाप से नहीं बचाए गए हैं? हाँ! परन्तु इससे पहले कि हम उद्धार को समझ पाएँ, हमें यह समझना चाहिए कि हमें उद्धार की आवश्यकता क्यों है। यही वह स्थान है, जहाँ पाप के धर्मसिद्धान्त का विषय आ जाता है। यह बताता है कि हम सभी – अपनी मीरास, रोपण, और अपने व्यक्तिगत् चुनाव के कारण पापी हैं। यह हमें दिया गया वृतान्त है कि परमेश्‍वर को क्यों न हमारे पापों के कारण हमें दोषी ठहरा देना चाहिए। पाप का धर्मसिद्धान्त पाप के समाधान — यीशु मसीह के प्रायश्‍चित्त से भरे हुए बलिदान की ओर इंगित करता है। जब हम वास्तव में अपने पाप से भरे हुए स्वभाव की पकड़ में आ जाते हैं, तो हम अपने महान परमेश्‍वर के स्वभाव की गहराई और चौड़ाई को समझना आरम्भ करते हैं, जो एक ओर, तो पापियों को धार्मिकता से भरे हुए न्याय के कारण नरक में डाल दिए जाने के लिए आवश्यक रूप से दोषी ठहराता है, तब, दूसरी ओर, अपनी स्वयं की पूर्णता की शर्त को सन्तुष्ट करता है। केवल जब हम पाप की गहराई को समझते हैं, तब ही हम पापियों के लिए परमेश्‍वर के प्रेम की ऊँचाई को समझ सकते हैं।

पाप का धर्मसिद्धान्त में पवित्रशास्त्र का एक प्रमुख वचन रोमियों 3:23-24 है, "इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्‍वर की महिमा से रहित हैं, परन्तु उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं।"

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