महाक्लेश क्या है?


प्रश्न: महाक्लेश क्या है?

उत्तर:
क्लेशकाल भविष्य की एक ऐसी समयावधि है, जिसमें प्रभु अपनी योजना के अनुसार कम से कम दो पहलुओं को पूर्ण करेगा : 1) वह इस्राएल की जाति के प्रति अपने अनुशासन को पूरा करेगा (दानिय्येल 9:24), और 2) वह इस पृथ्वी पर रहने वाले अविश्‍वासी अधर्मियों का न्याय करेगा (प्रकाशितवाक्य 6 — 18)। क्लेशकाल की समयावधि सात वर्षों की होगी। इसका निर्धारण दानिय्येल में वर्णित सत्तर सप्ताहों की समझ के ऊपर किया गया है (दानिय्येल 9:24-27; इसके साथ ही महाक्लेश के ऊपर लिखा लेख भी देखें)। महाक्लेशकाल की अवधि की लम्बाई साढ़े तीन वर्षों की है। इसे क्लेशकाल की अवधि से पशु या मसीह विरोधी के प्रकाशित होने और इस समय में बहुत अधिक तीव्रता के साथ परमेश्‍वर के प्रकोप के उण्डेले जाने के द्वारा भिन्न किया गया है। इस प्रकार, इस समय इस बात के ऊपर महत्व दिया जाना अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि क्लेश और महाक्लेश एक ही पर्यायवाची शब्द नहीं हैं। युगान्तविज्ञान (भविष्य की बातों का अध्ययन) के अध्ययन के भीतर, क्लेशकाल को पूर्ण सात-वर्षों के समयावधि के रूप में उद्धृत किया जाता है, जबकि "महाक्लेशकाल" क्लेशकाल के दूसरे आधे हिस्से के लिए उद्धृत होता है।

यह मसीह ही है, जिसने स्वयं "महाक्लेश" वाक्यांश को क्लेशकाल के दूसरे आधे हिस्से को सन्दर्भित करने के लिए उपयोग किया है। मत्ती 24:21, यीशु कहता है, "क्योंकि उस समय ऐसा भारी क्लेश होगा, जैसा जगत के आरम्भ से न अब तक हुआ और न कभी होगा।" इसी वचन में यीशु मत्ती 24:15 में घटित होने वाले घटना को उद्धृत कर रहा है, जो उजाड़ने वाली घृणित वस्तु का विवरण देती है, इस व्यक्ति को मसीह विरोधी के नाम से भी जाना जाता है। साथ ही, मत्ती 24:29-30 में यीशु कहता है, "उन दिनों के क्लेश के बाद तुरन्त पश्चात्... मनुष्य के पुत्र का चिन्ह आकाश में दिखाई देगा, और तब पृथ्वी के सब कुलों के लोग छाती पीटेंगे; और मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ्य और ऐश्‍वर्य के साथ आकाश के बादलों पर आते देखेंगे।" इस सन्दर्भ में, यीशु महाक्लेश की परिभाषा (वचन 21), उजाड़नेवाली घृणित वस्तु के प्रगट होने (वचन 15) के आरम्भ होते हुए और मसीह के दूसरे आगमन के साथ अन्त होते हुए देते है (वचन 30)।

महाक्लेश को उद्धृत करने वाले अन्त सन्दर्भ दानिय्येल 12:1ब है, जहाँ यह कहता है, "तब ऐसे संकट का समय होगा, जैसे किसी जाति के उत्पन्न होने के समय से लेकर अब तक कभी हुआ न होगा।" ऐसा प्रतीत होता है कि यीशु उस समय इन्हीं शब्दों का उद्धरण दे रहा था, जब वह मत्ती 24:21 में लिपिबद्ध शब्दों को बोल रहा था। महाक्लेश को यिर्मयाह 30:7 भी उद्धृत करता है, "हाय, हाय, वह दिन क्या ही भारी होगा! उसके समान और कोई दिन नहीं; वह याकूब के संकट का दिन होगा; परन्तु वह उस से भी छुडाया जाएगा।" "याकूब का संकट" वाक्यांश इस्राएली जाति को सन्दर्भित करता है, जो ऐसे सताव और प्राकृतिक विपत्ति का अनुभव करेगा जिसे अभी तक उसने इससे पहले कभी नहीं किया है।

मसीह द्वारा प्रदत्त मत्ती 24:15-30 दी हुई सूचना के ऊपर ध्यान देते हुए, यह सारांश निकलना अत्यन्त आसान है कि महाक्लेश के आरम्भ के हिस्से से बहुत कुछ लेना देना उजाड़ने वाली घृणित वस्तु के साथ है, जो कि मसीह विरोधी का एक कार्य है। दानिय्येल 9:26-27 में, हम पाते कि यह व्यक्ति एक "वाचा" (शान्ति के अनुबन्ध) को सात वर्षों के लिए इस संसार के लिए बाँध रहा है (एक बार फिर से एक "सप्ताह", महाक्लेश के ऊपर लिखे हुए लेख को देखें)। सात वर्षों की अवधि के मध्य में ही — "आधे ही सप्ताह के बीतने पर ही" — हमें कहा गया है कि यह व्यक्ति बाँधी हुई वाचा को तोड़ देगा, वह मेलबलि और अन्नबलि के चढ़ाए जाने को बन्द कर देगा, जो विशेष रूप से भविष्य में पुनर्निमित मन्दिर में उसके द्वारा किए हुए कार्य की ओर इंगित करता है। प्रकाशितवाक्य 13:1-10 पशु के कार्यों के बारे में और भी अधिक विस्तार के साथ विवरण देता है, और महत्वपूर्णता के कारण, यह साथ ही समय की उस लम्बाई की भी पुष्टि करता है, जिसमें यह राज्य करेगा। प्रकाशितवाक्य 13:5 कहता है कि वह 42 महीनों तक राज्य करता रहेगा, जो कि महाक्लेशकाल की लम्बाई का आधा साढ़े तीन वर्षों का समय है।

महाक्लेश के बारे में प्रकाशितवाक्य सबसे अधिक महत्वपूर्ण सूचनाओं का प्रस्ताव देता है। प्रकाशितवाक्य 13 से पता चलता है कि जब पशु प्रकाशितवाक्य 19 में यीशु के पुन: आगमन के होने तक प्रगट होता है, तब हमें इस पृथ्वी के ऊपर परमेश्‍वर के प्रकोप के उण्डेले जाने का एक चित्र अविश्‍वास और विद्रोह के कारण दिया गया है (प्रकाशितवाक्य 16-18)। यह साथ ही ऐसा चित्रण प्रस्तुत करता है कि कैसे परमेश्‍वर एक ही समय में उसके लोगों को अनुशासित करता और उसके लोगों इस्राएलियों को तब तक सुरक्षित रखता है (प्रकाशितवाक्य 14:1-5) जब तक कि वह इस्राएल के साथ की गई अपनी प्रतिज्ञाओं को एक प्रार्थिव राज्य को स्थापित करने के लिए पूरा न करे ले (प्रकाशितवाक्य 20:4-6)।

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