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प्रश्न

सुसमाचार के सन्देश की अनिवार्य बातें क्या हैं?

उत्तर


शब्द "सुसमाचार" का अर्थ "शुभ सन्देश" है और इसकी सर्वोत्तम परिभाषा यीशु मसीह के प्रायश्चित कार्य के द्वारा पापों के लिए क्षमा के सन्देश में की जा सकती है। यह परमेश्‍वर की बचाने वाली अति महत्वपूर्ण योजना उन लोगों के लिए है, जो उसके ईश्‍वरीय पुत्र में इसलिए विश्‍वास करेंगे ताकि उनका मेलमिलाप एक धर्मी और पवित्र परमेश्‍वर के साथ हो जाए। बचाने वाले इस सन्देश की अनिवार्य विषय वस्तु स्पष्ट रीति से हमारे लिए बाइबल में दे दी गई है।

कुरिन्थियों को लिखे हुए प्रेरित पौलुस के पहले पत्र में, सुसमाचार के सन्देश की विषय वस्तु को इस तरह से लिखा गया है, "हे भाइयो, मैं तुम्हें वही सुसमाचार बताता हूँ, जो पहिले सुना चुका हूँ, जिसे तुम ने अंगीकार भी किया था और जिसमें तुम स्थिर भी हो। उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था, स्मरण रखते हो; नहीं तो तुम्हारा विश्‍वास करना व्यर्थ हुआ। इसी कारण मैं ने सब से पहले तुम्हें वही बात पहुँचा दी, जो मुझे पहुँची थी, कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया। और गाड़ा गया; और पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा।" (1 कुरिन्थियों 15:1-4)।

इस संदर्भ में, हम सुसमाचार के सन्देश के अनिवार्य तत्वों को देखते हैं। सबसे पहले, वाक्यांश "हमारे पापों के लिए मर गया" अति महत्वपूर्ण है। जैसा कि रोमियों 3:23 हमें बताता है, "क्योंकि सब ने पाप किया है और सभी परमेश्‍वर की महिमा से रहित हैं।" पाप की वास्तविकता की पहचान किए जाने की आवश्यकता उन सभों के द्वारा है, जो उद्धार के लिए परमेश्‍वर के सिंहासन के निकट तक आते हैं। एक पापी को परमेश्‍वर के सामने उसके दोष के लिए आशाहीन होना स्वीकार करना चाहिए ताकि परमेश्‍वर की क्षमा उसे प्राप्त हो सके, और वह समझ सके कि "पाप की मजदूरी मृत्यु है" (रोमियों 6:23)। इस मूल सत्य के बिना, सुसमाचार का कोई भी प्रस्तुतिकरण पूर्ण नहीं है।

दूसरा, मसीह का व्यक्तित्व और कार्य सुसमाचार के अपरिहार्य घटक हैं। यीशु परमेश्‍वर (कुलुस्सियों 2:9) और मनुष्य (यूहन्ना 1:14) दोनों ही है। यीशु ने पापरहित जीवन को व्यतीत किया जिसे हम कभी भी यापन नहीं कर सकते थे (1 पतरस 2:22) और वही केवल एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जो पापियों के लिए वैकल्पिक मृत्यु के रूप में मरा। एक असीमित परमेश्‍वर के विरूद्ध किया जाने वाला पाप एक असीमित बलिदान की मांग करता है। इसलिए, या तो मनुष्य, जो कि सीमित है, एक असीमित अवधि के नरक में दण्ड को चुकाए, या फिर असीमित मसीह एक ही बार में इसे चुका दे। यीशु क्रूस के ऊपर उस ऋण का भुगतान करने के लिए चढ़ गया जो हम पर हमारे पापों के कारण था, और वे जो उसके बलिदान के द्वारा ढाँप दिए गए हैं, वे परमेश्‍वर के राज्य को राजा के पुत्रों के रूप में प्राप्त करेंगे (यूहन्ना 1:12)।

तीसरा, मसीह का पुनरुत्थान सुसमाचार का एक अनिवार्य घटक है। पुनरुत्थान परमेश्‍वर की सामर्थ्य का प्रमाण है। केवल वही जिसने जीवन को रचा है, मृत्यु उपरान्त पुनरुत्थित हो सकता है, केवल वही उस भयानकता को परिवर्तित कर सकता है, जो मृत्यु में है, और केवल वही मृत्यु के डंक और कब्र पर विजयी होकर इन्हें दूर कर सकता है (1 कुरिन्थियों 15:54-55)। इसके अतिरिक्त, अन्य धर्मों के विपरीत, मसीही विश्‍वास के पास एक ऐसा संस्थापक है, जो मृत्यु से ऊपर है और जो यह प्रतिज्ञा करता है कि उसका अनुसरण करने वालों के साथ भी ऐसा ही होगा। बाकी के अन्य सभी धर्मों के लोग ऐसे मनुष्य और नबी हैं, जिनका अन्त कब्र में जाकर हो जाता है।

अन्त में, मसीह उसके उद्धार को मुफ्त वरदान के रूप में देने का प्रस्ताव देता है (रोमियों 5:15; 6:23) जिसे केवल विश्‍वास के द्वारा ही, कर्मों से या हमारे अपने गुणों से पृथक होते हुए प्राप्त किया जा सकता है (इफिसियों 2:8-9)। जैसा कि प्रेरित पौलुस हमें कहता है, सुसमाचार "....हर एक विश्‍वास करने वाले के लिए, पहले तो यहूदी फिर यूनानी के लिए, उद्धार के निमित्त परमेश्‍वर की सामर्थ्य है" (रोमियों 1:16)। यही प्रेरणा प्राप्त लेखक हमें ऐसा कहता है, "यदि तू मुँह से अंगीकार करे, 'कि यीशु ही प्रभु है' और अपने मन से विश्‍वास करे कि परमेश्‍वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा" (रोमियों 10:9)।

इस तरह से, ये अब सुसमाचार के अनिवार्य घटक हुए : सभी मनुष्यों का पापी होना, क्रूस के ऊपर हमारे पापों के दण्ड को चुकाने के लिए यीशु की मृत्यु का होना, मसीह का पुनरुत्थान उन सभों को शाश्‍वतकालीन जीवन प्रदान करता है, जो उसका अनुसरण करते हैं, और सभों को मुफ्त में उद्धार के उपहार को देने का प्रस्ताव देता है।

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