यदि यीशु परमेश्वर था, तो उसने ऐसे क्यों कहा कि, 'कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात् परमेश्‍वर है?


प्रश्न: यदि यीशु परमेश्वर था, तो उसने ऐसे क्यों कहा कि, 'कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात् परमेश्‍वर है?

उत्तर:
ऐसा अक्सर उन लोगों के द्वारा दावा किया जाता है जो मसीह के ईश्वर होने को अस्वीकार कर देते हैं, क्योंकि मरकुस 10:17-22 में यीशु ने इस धारणा को अस्वीकार कर दिया कि वह उत्तम है। यहाँ इस प्रकार लिखा हुआ है:

"जब वह वहाँ से निकलकर मार्ग में जा रहा था, तो एक मनुष्य उसके पास दौड़ता हुआ आया, और उसके आगे घुटने टेककर उससे पूछा, 'हे उत्तम गुरु, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूँ?' यीशु ने उससे कहा, 'तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात् परमेश्‍वर।' तू आज्ञाओं को तो जानता है : 'हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, छल न करना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना।' उसने उससे कहा, 'हे गुरु, इन सब को मैं लड़कपन से मानता आया हूँ।' यीशु ने उस पर दृष्‍टि करके उससे प्रेम किया, और उससे कहा, 'तुझ में एक बात की घटी है। जा, जो कुछ तेरा है उसे बेच कर कंगालों को दे, और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा, और आकर मेरे पीछे हो ले।' इस बात से उसके चेहरे पर उदासी छा गई, और वह शोक करता हुआ चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।"

क्या यीशु यहाँ पर उस व्यक्ति को उसके लिए उत्तम कहे जाने के लिए ताड़ना दे रहा है और परिणामस्वरूप वह स्वयं के ईश्वर होने को अस्वीकार कर रहा है? नहीं, इसकी अपेक्षा, वह उस व्यक्ति को अपने शब्दों के निहितार्थों के माध्यम से सोचने के लिए मन को भेदने वाले एक प्रश्न का उपयोग कर रहा है, जो कि यीशु की उत्तम होने की अवधारणा को समझने के लिए और सबसे विशेष रूप से, व्यक्ति की अच्छाई की कमी को दिखाने के लिए किया गया है। युवा शासक "शोक करता हुआ चला गया" (मरकुस 10:22), क्योंकि उसने महसूस किया कि यद्यपि उसने आज्ञाओं को पूरा करने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया था, परन्तु वह आज्ञाओं में सबसे पहली और सबसे बड़ी को पूरा करने में विफल रहा था — जो कि परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रखने की थी (मत्ती 22:37-38)। उस व्यक्ति का धन परमेश्वर से अधिक उसके लिए मूल्य रखता था, और इस तरह वह परमेश्वर की दृष्टि में "उत्तम" नहीं था।

यहाँ यीशु के द्वारा दी गई मूलभूत शिक्षा यह है कि अच्छाई मनुष्य के कर्मों से नहीं, अपितु स्वयं परमेश्वर से बहती है। यीशु ने उस व्यक्ति को उसके पीछे चलने के लिए आमन्त्रित किया, जो कि परमेश्वर के सर्वोच्च मापदण्ड के द्वारा भले काम को किए जाने का एकमात्र साधन है। यीशु ने युवा शासक के बारे में बताया कि इसका क्या अर्थ होता है — उसे अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहना चाहिए, इस प्रकार परमेश्वर को पहले स्थान पर रखना। जब कोई यह विचार करता है कि यीशु मनुष्य के अच्छेपन के मापदण्ड और परमेश्वर के मापदण्ड के मध्य में भिन्नता कर रहा है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यीशु का अनुसरण करना ही अच्छा है। मसीह का अनुसरण करने की आज्ञा, मसीह की भलाई या अच्छाई की निश्चित उद्घोषणा है। इस प्रकार, मापदण्ड के अनुसार यीशु युवा शासक को उसे अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा था, यीशु अच्छा है। और इसका परिणाम आवश्यक रूप से यह निकलता है कि यदि यीशु वास्तव में इस मापदण्ड से अच्छा है, तो यीशु का अर्थ है कि वह स्वयं के परमेश्वर होने की घोषणा कर रहा है।

इस प्रकार, उस व्यक्ति के लिए यीशु का प्रश्न उसके ईश्वर होने से अस्वीकार करने के लिए नहीं था, अपितु मसीह की ईश्वरीय पहचान को स्वीकार करने के लिए उसे आकर्षित किए जाने के लिए किया गया था। यूहन्ना 10:11 जैसे सन्दर्भों से इस तरह की व्याख्या की पुष्टि की जाती है, जिसमें यीशु स्वयं को "अच्छा चरवाहा" होने की घोषणा करता है। इसी तरह यूहन्ना 8:46 में, यीशु पूछता है कि, "तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है?" इसका उत्तर है "नहीं।" यीशु "पाप के बिना" (इब्रानियों 4:15), पवित्र और अशुद्ध है (इब्रानियों 7:26), केवल वही है जो "कोई पाप नहीं जानता था" (2 कुरिन्थियों 5:21)।

तर्क को इस प्रकार संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है:
1: यीशु का दावा है कि केवल परमेश्वर ही उत्तम या भला है।
2: यीशु उत्तम होने का दावा करता है।
3: इसलिए, यीशु परमेश्वर होने का दावा करता है।

इस तरह का दावा सही अर्थों में मरकुस की कथा के प्रवाह के प्रकाश में यीशु की वास्तविक पहचान के खुलते हुए प्रकाशन से सम्बन्धित है। मरकुस 14:62 में महायाजक के सामने ही वह स्थान आता है, जहाँ यीशु की पहचान के प्रश्न को स्पष्ट रूप से प्रगट किया गया है। धनी युवा शासक की कहानी यीशु के अनन्तकालीन, दिव्य, परमेश्वर के देहधारी पुत्र होने के रूप में पाठकों को इंगित करने के लिए रूपरेखित की गई कहानियों के अनुक्रम में से एक है।

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यदि यीशु परमेश्वर था, तो उसने ऐसे क्यों कहा कि, 'कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात् परमेश्‍वर है?

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