क्या धर्म की स्वतन्त्रता एक बाइबल आधारित धारणा है?


प्रश्न: क्या धर्म की स्वतन्त्रता एक बाइबल आधारित धारणा है?

उत्तर:
मूसा की व्यवस्था के अधीन, इस्राएल एक ईशतन्त्र के अधीन संचालित हुआ। राष्ट्र की सफलता या विफलता परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता के पालन किए जाने के ऊपर निर्भर थी। "धार्मिक स्वतन्त्रता" पुराने नियम की व्यवस्था का भाग नहीं थी, क्योंकि परमेश्‍वर ने सीधे ही इस्राएल के ऊपर शासन किया था। नि:सन्देह, इस्राएल का ईशतन्त्र संसार के शेष भागों के लिए एक शासकीय आदर्श बनने का उद्देश्य नहीं रखता था। जिन राष्ट्रों ने स्वयं के ऊपर स्वयं-की शैली के ईशतन्त्र को अपनाया जैसे कि मध्ययुगीन स्पेन उन्होंने सर्वाधिकारवादी दुःस्वप्न को उत्पन्न किया है। धर्म की जाँच वाला धार्मिक असहिष्णुता सच्चे ईशतन्त्र का उत्पाद नहीं था; यह सत्ता-के भूखे, पापी लोगों का परिणाम था।

नए नियम में, हमारे पास सरकार की परमेश्‍वर द्वारा-निर्धारित भूमिका का एक स्पष्ट चित्र पाया जाता है। रोमियों 13:3-4 सरकार के दायित्वों को चित्रित करता है, जो कि साधारण रूप से बुरे कामों को दण्डित करने, अच्छे कामों को पुरस्कृत करने और न्याय देने के हैं। इसलिए, परमेश्‍वर ने सरकार को कुछ कर्तव्य दिए हैं, परन्तु आराधना की एक विशेष पद्धति को लागू करना उनमें सम्मिलित नहीं है।

बाइबल के सिद्धान्तों और धार्मिक स्वतन्त्रता के नागरिक सिद्धान्तों के मध्य में कोई संघर्ष नहीं है। वास्तव में, यहूदी-मसीही मूल्यों के ऊपर निहित सरकारें ऐसी स्वतन्त्रता की अनुमति देती हैं। इस्लाम, हिन्दू, और बौद्ध सरकारें धार्मिक स्वतन्त्रता की अनुमति नहीं देती हैं; इसलिए, पाकिस्तान, भारत और तिब्बत जैसे देश पूरी तरह से अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु हैं। नास्तिक सरकारें, जैसे कि पूर्व सोवियत संघ, भी स्वतन्त्र धार्मिक अभिव्यक्ति की ओर विरोधी सिद्ध हुई हैं।

धर्म की स्वतन्त्रता की धारणा कई कारणों से बाइबल आधारित है। सबसे पहले, परमेश्‍वर स्वयं लोगों की ओर "धर्म की स्वतन्त्रता" को बढ़ाता है, और बाइबल में इसके कई उदाहरण पाए जाते हैं। मत्ती 19:16-23 में, धनी युवा शासक यीशु के पास आता है। एक संक्षिप्त वार्तालाप के पश्‍चात्, युवक मसीह का पालन न करने का चयन करते हुए "उदास होकर चला गया।" यहाँ मुख्य बात यह है कि यीशु ने उसे जाने दिया। परमेश्‍वर उसके ऊपर विश्‍वास की "जबरदस्ती" नहीं की। विश्‍वास का आदेश दिया जाता है, परन्तु इसके लिए कभी भी मजबूर नहीं किया जाता है। मत्ती 23:37 में, यीशु ने यरूशलेम के बच्चों को स्वयं के पास इकट्ठा करने की अपनी इच्छा व्यक्त की, परन्तु वे अभी "तैयार नहीं थे।" यदि परमेश्‍वर मनुष्यों को चुनने या अस्वीकार करने की स्वतन्त्रता देता है, तो हमें भी ऐसा ही करना चाहिए।

दूसरा, धर्म की स्वतन्त्रता मनुष्य में परमेश्‍वर के स्वरूप का सम्मान करती है (उत्पत्ति 1:26)। परमेश्‍वर की समानता का एक भाग मनुष्य की अभिव्यक्ति है, अर्थात्, मनुष्य के पास चुनने की क्षमता है। परमेश्‍वर हमारे विकल्पों का सम्मान करता है, जिस में वह हमें अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने की स्वतन्त्रता देता है (उत्पत्ति 13:8-12; यहोशू 24:15), चाहे हम गलत निर्णय ही क्यों न लेते हैं। एक बार फिर से, यदि परमेश्‍वर हमें चुनने की अनुमति देता है, तो हमें दूसरों को चुनने की अनुमति देनी चाहिए।

तीसरा, धर्म की स्वतन्त्रता स्वीकार करती है कि यह पवित्र आत्मा है, जो मनों को परिवर्तित करता है, न कि सरकार (यूहन्ना 6:63)। यीशु ही केवल बचाता है। धर्म की स्वतन्त्रता को दूर करने का अर्थ मानवीय सरकार का, इसके गिरने वाले शासकों के साथ अनुसरण करना है, जिनके पास यह निर्धारित करने की शक्ति है कि कौन सा धर्म सही है। परन्तु मसीह का राज्य इस संसार का नहीं है (यूहन्ना 18:36), और कोई भी व्यक्ति सरकारी की आधिकारिक आज्ञा से मसीही विश्‍वासी नहीं बनता है। हम मसीह में विश्‍वास के माध्यम से परमेश्‍वर के अनुग्रह से मसीही विश्‍वासी बनते हैं (इफिसियों 2:8-9)। सरकार क्या करती है या नहीं करती है, उसका नए जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है (यूहन्ना 1:12-13; 3:5-8)।

चौथा, धर्म की स्वतन्त्रता स्वीकार करती है कि, अन्तिम विश्लेषण, धर्म के बारे में नहीं है; यह सम्बन्ध के बारे में है। परमेश्‍वर आराधना के बाहरी रूप को नहीं, अपितु वह उसकी सन्तान के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध को चाहता है (मत्ती 15:7-8)। सरकारी नियन्त्रण की कोई भी मात्रा ऐसे सम्बन्ध का उत्पादन नहीं कर सकती है।

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