स्वयं को क्षमा करने के बारे में बाइबल क्या कहती?


प्रश्न: स्वयं को क्षमा करने के बारे में बाइबल क्या कहती?

उत्तर:
बाइबल कभी भी "स्वयं को क्षमा करने" के विचार के बारे में बात नहीं करती है। हमें दूसरों को क्षमा करने के लिए कहा गया है, जब वे हमारे विरूद्ध अपराध करते हैं और क्षमा की मांग करते हैं। जब हम मसीह के ऊपर आधारित हो परमेश्‍वर की क्षमा की मांग करते हैं, जिसने पहले से ही हमारे पापों के लिए दण्ड का भुगतान कर दिया है और हम उस के ऊपर उद्धारकर्ता और प्रभु के रूप में भरोसा करते हैं, तो वह हमें क्षमा करता है। यह उसी तरह से आसान है, जिस तरह उसने हमें क्षमा किया है (1 यूहन्ना 1:9)। तौभी, यद्यपि, हम पाप के बन्धन से छुटकारा पा चुके हैं (जैसा कि रोमियों अध्याय 6-8 में कहा गया है), तौभी हम अभी भी अपने चयन में लड़खड़ा जाते हैं और ऐसे कार्य कर सकते हैं, जैसे कि मानो हम इन से मुक्त नहीं हुए हैं। इसी प्रकार, दोषी भावनाओं के साथ हम इस तथ्य को स्वीकार कर सकते हैं कि हमें मसीह में क्षमा किया गया है, या हम शैतान के झूठ पर विश्‍वास कर सकते हैं कि हम अभी भी दोषी हैं और इसलिए दोष को महसूस करना चाहिए।

बाइबल कहती है कि जब परमेश्‍वर हमें क्षमा करता है, तो वह "हमारे पापों को फिर स्मरण न करेगा" (यिर्मयाह 31:34)। इसका अर्थ यह नहीं है कि सर्व-ज्ञानी परमेश्‍वर भूल जाता है, क्योंकि उसने हमें क्षमा कर दिया है। अपितु, वह हमारे पाप को स्वयं या दूसरों के सामने उठाना नहीं चुनता है। जब हमारे अतीत के पाप हमारे ध्यान में आते हैं, तो हम उन पर ध्यान केन्द्रित करने को चुन सकते हैं (जिसका परिणाम दोषी भावनाओं में निकलता है), या हम अपने मन को अद्भुत परमेश्‍वर के विचारों से भरना चुन सकते हैं, जो हमें क्षमा करता है और इसके लिए उसे धन्यवाद दे सकते और उसकी प्रशंसा कर सकते हैं (फिलिप्पियों 4:8)। हमारे पापों को स्मरण रखना केवल तभी लाभदायी होगा जब यह हमें परमेश्‍वर की क्षमा की सीमा के बारे में स्मरण दिलाता है और दूसरों को क्षमा करने के लिए हमारे लिए आसान बनाता है (मत्ती 18: 21-35)।

दु:ख की बात यह है कि, ऐसे कुछ लोग हैं, जो "स्वयं को क्षमा नहीं करते" हैं, अर्थात्, जो अपने अतीत से आगे नहीं बढ़ते हैं, क्योंकि वे वास्तव में अपने अतीत के पापों को भूलना ही नहीं चाहते हैं। कुछ लोग अपने मन में अतीत के पापों से छुटकारा प्राप्त करने के स्थान पर एक घबराहट भरा रोमांच प्राप्त करना चुनते हैं। यह भी एक पाप है और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए और इसे त्याग दिया जाना चाहिए। एक व्यक्ति जो एक स्त्री की लालसा अपने मन में करता है, वह व्यभिचार के पाप का दोषी है (मत्ती 5:28)। इसी तरह, प्रत्येक बार जब हम मानसिक रूप से हमारे पाप को विश्राम देते हैं, तो हम एक बार फिर से उसी पाप को करते हैं। यदि ऐसा एक मसीही विश्‍वासी के जीवन में हो रहा है, तो दोष/पाप/अपराध के लिए पाप की पद्धति विनाशकारी और कभी न-समाप्त होने वाली हो सकती है।

यह स्मरण रखना कि हमारे पापों को क्षमा किया गया है, दूसरों को उनके पापों को क्षमा करना आसान बनाता है (मत्ती 7:1-5; 1 तीमुथियुस 1:15)। क्षमा हमें उस महान उद्धारकर्ता को स्मरण दिलाती है, जिसने हमें क्षमा किया है, यद्यपि हम अयोग्य थे, यद्यपि हम सदैव अयोग्य ही रहेंगे, और यह हमें उसके प्रति आज्ञाकारिता में निकटता के साथ आकर्षित करती है (रोमियों 5:10; भजन संहिता 103:2-3,10-14)। परमेश्‍वर हमारे पाप को हमारे ध्यान में आने देगा (शैतान इससे एक बुरे उद्देश्य की प्राप्ति की मंशा कर सकता है, परन्तु परमेश्‍वर इसे एक अच्छे उद्देश्य के लिए आने की अनुमति देता है), परन्तु वह चाहता है कि हम उसकी क्षमा को स्वीकार करें और उसके अनुग्रह का आनन्द लें। इसलिए, जब अगली बार आपको आपके अतीत के पाप ध्यान में आए, तो उसकी करुणा के ऊपर ध्यान केन्द्रित करके अपने "चैनल को बदल डालें" (उन वचनों की एक सूची बनाना सहायतापूर्ण हो सकता है, जो आपको उसकी प्रशंसा करने के लिए उत्साहित करते हैं) और इसके बारे में सोचें कि हमें पाप से कैसे घृणा करना चाहिए।

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