सच्चे प्रेम की प्राप्ति इतनी अधिक कठिन क्यों है?


प्रश्न: सच्चे प्रेम की प्राप्ति इतनी अधिक कठिन क्यों है?

उत्तर:
हम सभों में प्रेम करने और प्रेम किए जाने की इच्छा पाई जाती है। हम माता-पिता, भाई-बहनों, मित्रों और दूसरों से प्रेम के विभिन्न स्तरों का अनुभव करते हैं। परन्तु हम में से अधिकांश उस विशेष व्यक्ति को ढूँढना चाहते हैं, जिसके साथ हम अपने प्रेम के गहरे स्तर को साझा कर सकें। सच्चा प्रेम ढूँढना अविश्‍वसनीय रूप से कठिन प्रतीत हो सकता है, और यह समझना कठिन होता है कि ऐसा क्यों है। इस विषय पर विचार करने से पहले बड़ा प्रश्‍न यह है कि, "सच्चे प्रेम की मेरी परिभाषा क्या है?" इस बात की समझ कि "सच्चे प्रेम" से हमारा क्या अर्थ है, यह जानने में हमारी सहायता कर सकती है कि हम वास्तव में क्या चाहते हैं और क्या यह सफल हो रहा है या नहीं।

कई समाज शब्द प्रेम का उपयोग बहुत अधिक उदारता के साथ करते हैं। प्रेम अक्सर तीव्र भावनाओं के साथ जुड़ा हुआ होता है, अपनी सच्चाई में, यह आत्म केन्द्रित और बिना किसी-समर्पण के होता है। बहुत सी फिल्मों और टीवी शो में, हम उन पात्रों को देखते हैं, जो अपने हार्मोनों अर्थात् भावनाओं का अनुसरण करते हैं और विवाह से पहले ही यौन सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं। जब "प्रेम" सुखद भावनाओं या शारीरिक भावनाओं की नींव की ऊपर टिका हुआ होता, तो यह जितनी शीघ्रता से आरम्भ हुआ था उतनी ही शीघ्रता के साथ समाप्त हो जाता है। जिस व्यक्ति को हम प्रेम करते हैं, उसके प्रति अच्छी भावनाओं का अनुभव करना चाहते हैं, इसमें कुछ भी गलत नहीं है; तथापि, यदि यही सम्बन्धों की नींव है, तो सम्बन्ध गड़बड़ी में है। यदि आज की यौन - से भरी हुई संस्कृति में दिखाए गए "प्रेम" के जैसे प्रेम की हम खोज कर रहे हैं, तो कोई आश्‍चर्य नहीं कि इसे खोजना कठिन प्रतीत होता है; यह सच्चा प्रेम नहीं है, जिसका हम पीछा कर रहे हैं, परन्तु यह एक अनुभव मात्र है, जो अपने स्वभाव के कारण, लम्बे समय तक नहीं बना रह सकता है।

बाइबल प्रेम के एक बहुत भिन्न चित्र को प्रस्तुति करती है। सच्चा प्रेम परमेश्‍वर का है - वास्तव में, यही प्रेम है (1 यूहन्ना 4:8) - और वह वही है, जिसने हम में प्रेम करने और प्रेम करने की आवश्यकता को डाला है। इसलिए, प्रेम के लिए उसके द्वारा निर्मित रूपरेखा को समझना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बाइबल के अनुसार सच्चा प्रेम बलिदान, प्रतिबद्धता और प्रियजन को लाभ पहुँचाने के लिए एक आवेग होता है (यूहन्ना 15:13 को देखें)। हमारे लिए परमेश्‍वर का प्रेम उसे क्रूस पर ले गया। हम निश्‍चित रूप से जानते हैं कि यीशु क्रूस के पथ पर "आनन्द" से भरी हुई भावनाओं का अनुभव नहीं कर रहा था (लूका 22:42-44)। बाइबल यीशु के साथ हमारे सम्बन्ध को दुल्हे और दुल्हन के रूप में बताती है (मत्ती 9:15; इफिसियों 5:32)। सच्चे रोमांस अर्थात् प्रिति को विवाह के प्रति प्रतिबद्धता और वैवाहिक जीवन की सीमाओं के भीतर वृद्धि करने और विकसित करने के लिए रूपरेखित किया गया है (उत्पत्ति 2:24) और इसे बलिदान से भरे हुए प्रेम में निहित होना चाहिए (इफिसियों 5:22, 25-28)।

वस्तुओं की एक बड़ी मात्रा मिलकर सच्चा प्रेम को प्रदान कर सकती है, परमेश्‍वर की रूपरेखा के अनुसार कठिन धारणा है। यहाँ हम उन कुछ बड़ी बाधाओं पर ध्यान केन्द्रित करेंगे जिन्हें हम सामना करते हैं:

यह सोच कि हमारे लिए केवल एक ही व्यक्ति "सही" है। यह एक झूठ है, जो हमें भयातुर बनाए रख सकता है कि हम सबसे अच्छे जीवन साथी की प्राप्ति से कम के साथ वैवाहिक जीवन को यापन करना निर्धारित कर रहे हैं। एक सही "जीवन साथी" की प्रतीक्षा करना एक लम्बी प्रतीक्षा हो सकता है। जिस से हम विवाह करना चुनते हैं, वही हमारे लिए "सही" बन जाता है, क्योंकि हमने उस व्यक्ति के साथ जीवन पर्यन्त समर्पित बने रहने के लिए समर्पण किया। बाइबल ने इस क्षेत्र को संकीर्ण कर दिया है: हमारा सच्चा प्रेम एक मसीही विश्‍वासी के लिए होना चाहिए जो प्रभु के लिए जीवन व्यतीत कर रह रहा है (2 कुरिन्थियों 6:14-15); इससे आगे, परमेश्‍वर ज्ञान और समझ को प्रदान करेगा (याकूब 1:5)। बुद्धिमान, भक्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले लोग जो हमें अच्छी तरह से जानते हैं, वे भी सच्चे प्रेम को खोजने में मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।

यह सोच कि एक व्यक्ति हमें पूर्ण करेगा या पूरा कर सकता है। केवल परमेश्‍वर ही हमें वास्तव में पूर्ण कर सकते हैं, इसलिए हमें पूर्णता की भावना रखने के लिए रोमांटिक अर्थात् प्रीति से भरे हुए प्रेम को नहीं ढूँढना पड़ेगा! हम में से कोई भी सिद्ध नहीं है, और अपेक्षा कर सकते हैं कि एक दूसरा अपूर्ण व्यक्ति प्रत्येक आवश्यकता को पूरा करने के लिए अवास्तविक, अस्वास्थ्यकारी है, और केवल निराशा का ही कारण बन सकता है।

न परिवर्तित होने या विकसित न होने की इच्छा रखना। यह कल्पना करना आसान होता है कि हम जिस प्रकार के प्रेम को चाहते हैं, क्या हम स्वयं उस जैसे व्यक्ति बनने में का प्रयास करते हैं? हम सभों के पास हमारी स्वयं की कमजोरियाँ हैं, जिन्हें हमें परमेश्‍वर की सहायता से सम्बोधित करना चाहिए ताकि हम उस तरह के लोगों बन सकें जिसकी इच्छा वह हम से करता है। यह सोचने के लिए मोहक हो सकता है कि सच्चा प्रेम ढूँढना उन कमजोरियों को जादुई तरीके से समाधान कर देगा। परन्तु किसी के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होने से हमारी समस्याओं का समाधान नहीं हो जाएगा; इसकी अपेक्षा उनके और अधिक उजागर होने की संभावना बनी रहती है। यह सम्बन्धों में एक प्रतिफल देने वाला हिस्सा हो सकता है, क्योंकि लोहा लोहे को तेज करता है (नीतिवचन 27:17), यदि हम परिवर्तित होना और आगे बढ़ना चाहते हैं। यदि हम बदलने के इच्छुक नहीं हैं, तो सम्बन्ध तनावग्रस्त हो जाएंगे और अन्ततः नष्ट हो सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि विवाह करने से पहले हर व्यक्तिगत् कमजोरियों का समाधान किया जाना चाहिए। इसकी अपेक्षा, हमें इस अभ्यास में जाते हुए परमेश्‍वर से पूछना चाहिए कि हमें अपने जीवन में से किन बातों को हटा देना आवश्यक है (भजन संहिता 13 9:23)। जितना अधिक हम वैसे लोग बनते चले जाते हैं, जैसा परमेश्‍वर हम से चाहते हैं, उतना ही अधिक उस सम्बन्ध के अनुरूप सर्वोत्तम रुप से विकसित होते चले जाते हैं, जिसे हमारे लिए रखा गया है।

यह सोच कि सच्चे प्रेम की खोज में अब बहुत देर हो चुकी है। सच्चे प्रेम को ढूँढना और विवाह करना हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। एक शीघ्रता से और लापरवाही से किया गया निर्णय लेने से अच्छा सावधान रहना सर्वोत्तम है। तीन बार, श्रेष्ठगीत हमें चेतावनी देता है कि, "जब तक प्रेम आप से न उठे, तब तक उसके न उसकाओ न जगाओ" (श्रेष्ठगीत 2:7; 3:5; 8:4)। परमेश्‍वर का समय सदैव सर्वोत्तम होता है।

हम जानते हैं कि परमेश्‍वर सच्चे प्रेम को खोज की प्राप्ति के प्रति हमारी इच्छा की चिन्ता करता है। जब हम पूरी तरह से उसकी इच्छा के प्रति आत्म समर्पण कर देते हैं, तो हम सच्चे प्रेम की प्राप्ति के स्वयं के प्रयास को छोड़ देते हैं (मत्ती 11:29-30)।

प्रेम परमेश्‍वर का एक आवश्यक गुण है, और वह हमें बाइबल में दिखाता है कि वास्तव में सच्चा प्रेम कैसे काम करता है। प्रेम को पुन: परिभाषित करना या इसे परमेश्‍वर की रूपरेखा के बाहर ढूँढने का प्रयास करना निराशा और भ्रम को उत्पन्न करना है। परमेश्‍वर की इच्छाओं के प्रति अपनी इच्छा का समर्पण करना, उसकी इच्छा के अधीन होना, और उसमें स्वयं की पूर्ति खोजना सच्चे प्रेम को खोजने की कुँजी हैं। "यहोवा को अपने सुख का मूल जान,और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा" (भजन संहिता 37:4)।

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