क्या बाइबल एक परी कथा है?


प्रश्न: क्या बाइबल एक परी कथा है?

उत्तर:
आरोप यह लगाया है कि बाइबल एक परी कथा से अधिक कुछ नहीं है या अच्छी कहानियों की एक नई पुस्तक नहीं है। बाइबल निस्संदेह संसार की सबसे प्रभावशाली पुस्तक है, जो असँख्य जीवन को परिवर्तित करती है। तौभी, यह प्रश्‍न कि बाइबल एक परी कथा है या नहीं, पूरे संसार के कई लोगों के मन में वैध रूप से पाया जाता है?

उत्पत्ति की पुस्तक से लेकर प्रकाशितवाक्य की पुस्तक तक, हम पाप में गिरने वाले संसार के छुटकारे के लिए परमेश्‍वर की शाश्‍वतकालीन रूपरेखा की कहानी को पढ़ते हैं। परमेश्‍वर के लेखक होने के साथ ही बाइबल इस संसार के साहित्य का सबसे बड़ा लेखन कार्य है, और अभी तक के युगों में कई लोगों ने अपनी जीवन को इसकी सच्चाई को घोषित करने के लिए समर्पित किया है। वास्तव में, कइयों ने स्वयं को इसके लिए बलिदान कर दिया है, ताकि दूसरे लोग अपने हाथों में इसके पृष्ठों की प्रतिलिपि को पकड़ सकें। तौभी, ऐसी कोई भी पुस्तक कभी भी नहीं हुई है, जिस पर बाइबल के जैसे क्रूरतापूर्वक आक्रमण किया गया है। बाइबल पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, इसे जला दिया गया, इसको मजाक में उड़ाया गया, इसका उपहास किया गया और इसे बदनाम किया गया है। बाइबल को रखने वालों में से बहुतों को तो केवल इसे रखने के कारण ही मार डाला गया है। परन्तु फिर भी यह विचार है कि बाइबल एक परी कथा है, अभी भी बना ही हुआ है।

समय के आरम्भ से ही "इस संसार का राजकुमार" लोगों की आँखों को सत्य के प्रति बन्द कर रहा है। उसने परमेश्‍वर के वचनों को प्रश्‍न में ला कर पृथ्वी पर अपना "कार्य" आरम्भ किया है (उत्पत्ति 3:1-5), और वह तब से ऐसा ही कर रहा है। जहाँ कहीं भी हम देखते हैं, टेलीविजन और रेडियो, पुस्तकों और पत्रिकाओं में, हमारे विद्यालयों और विश्‍वविद्यालयों में हम इसे ही पाते हैं। दुख की बात यह है कि यहाँ तक कि यह अन्धेरा हमारी कलीसियाओं और मसीही महाविद्यालयों में भी आ चुका है, जहाँ पर परमेश्‍वर के वचन की सच्चाई का सबसे अधिक बचाव किया जाना चाहिए था। जब बच्चों को यह सिखाया जाता है कि हमारे पूर्वजों का उदय महासागर के मंथन से हुआ है, तो क्या हमने सृष्टि और आदम और हव्वा को एक परी कथा की अवस्था में नहीं छोड़ दिया है? यह ठीक वैसे ही बात है जब वैज्ञानिक और शिक्षाविद हमें बताते हैं कि हम अपने समय को नूह के "पौराणिक" जहाज की खोज में व्यर्थ गवाँ रहे हैं।

वास्तव में, जब शैक्षणिक संसार को शान्त करने के लिए कलीसिया में कई लोग, आधुनिक विकासवादी विचार को समायोजित करने के लिए उत्पत्ति की पुस्तक की पुनरावृत्ति की अनुमति देते हैं, तो संसार को दिए जाने वाला सन्देश यह होता है कि बाइबल वास्तव में अपने सरल अर्थ की अपेक्षा इसके सामान्य शब्दों द्वारा व्यक्त किए जा रहे विचारों में कुछ और ही है। जब बाइबल की अलौकिक घटनाओं को प्रकृतिवादियों द्वारा रूपकों में अनुवादित किया जाता है, तो यह समझ में आता है कि जिन्होंने कभी भी बाइबल का अध्ययन नहीं किया है, वह सत्य के प्रति कितने अधिक भ्रमित हो सकते हैं। उन लोगों के लिए जिन्होंने कभी परमेश्‍वर के वचन की सच्चाई का लाभ नहीं उठाया है, उनका किसी बोलने वाले गधे या मछली के द्वारा निगलने और किनारे पर उगल देने या एक स्त्री के नमक का खम्भा बन जाने पर विश्‍वास करने की कितनी अधिक सम्भावना है?

यद्यपि, बाइबल अपने निश्‍चित रूप से एक परी कथा नहीं है। सच्चाई तो यह है कि, बाइबल "ईश्‍वर-श्‍वसित" अर्थात् परमेश्‍वर की प्रेरणा प्राप्त (2 तीमुथियुस 3:16) है, और इसका अर्थ यह है कि परमेश्‍वर ने इसे लिखा था। इसके मानव लेखकों ने परमेश्‍वर की प्रेरणा से लिखा, क्योंकि उन्हें पवित्र आत्मा ने उभारा था (2 पतरस 1:21)। यही कारण है कि दस लाख शब्दों के लगभग तीन चौथाई भाग का यह ईश्‍वरीय रूप से बुना हुआ ताना-बाना आरम्भ से ही अपने तालमेल में सिद्ध है और इसमें कोई विरोधाभास नहीं है, चाहे इसकी छयासठ् पुस्तकों में जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों से आए हुए चालीस भिन्न लेखक हैं, यह तीन भिन्न भाषाओं में लिखी गई है और इसके लिखे जाने में लगभग सोलह सदियों का समय लगा है। यदि लेखकों की लेखनी के ऊपर परमेश्‍वर का मार्गदर्शन नहीं होता, तो सम्भवतः हमारे पास कैसे इस तरह का एक अद्भुत सामंजस्य हो सकता है? एक न्यायी परमेश्‍वर कभी भी त्रुटि को प्रेरित नहीं करेगा। एक न्यायी परमेश्‍वर कभी भी गलती से भरे पवित्रशास्त्र को "पवित्र और सत्य" नहीं कहेगा। एक दयालु परमेश्‍वर यह नहीं बताएगा कि उसका वचन सिद्ध है, यदि ऐसा होता तो और एक सर्वज्ञानी परमेश्‍वर इसे उस तरह लिख सकता है कि जैसा यह हजारों वर्षों पूर्व प्रासंगिक था वैसे ही आज वर्तमान में भी हो।

समय-समय पर और बार-बार, बाइबल की ऐतिहासिकता की पुष्टि जीवविज्ञान, भूविज्ञान और खगोल विज्ञान के द्वारा की गई है। और, यद्यपि बाइबल सदैव प्राकृतिकवादी अनुमानों से सहमत नहीं होती है, परन्तु तौभी यह किसी भी सच्चे, स्थापित वैज्ञानिक तथ्यों के साथ संघर्ष में नहीं है। पुरातत्व विज्ञान में, पिछले सौ वर्षों से बाइबल की सच्चाइयों के गड़े हुए खजाने के समूह को प्रकाश में लाया गया है, जिनके ऊपर विद्वानों ने सदियों से पूछताछ या सन्देह व्यक्त किया है, जैसे मृत सागर कुण्डल पत्र, बेसाल्ट पत्थर जिसमें "दाऊद के घराने" वाला शिलालेख, 7 वीं शताब्दी ईसा पूर्व अमुल्ट कुण्डल पत्र जिन पर परमेश्‍वर का नाम लिखा हुआ है और एक पत्थर जिस पर यहूदियों के राज्यपाल पिन्तुस पिलातुस का नाम लिखा हुआ है, जो यहूदियों का राज्यपाल था, जिसने यीशु मसीह को मृत्यु दण्ड सुनाया था सम्मिलित हैं। पूर्ण या आंशिक रूप से बाइबल की 24,000 से अधिक पाण्डुलिपियों के विद्यमान होने के साथ, बाइबल प्राचीन संसार की सबसे अच्छी लिपिबद्ध-दस्तावेजीय पुस्तक है। प्राचीन संसार के किसी भी अन्य दस्तावेज की विश्‍वसनीयता की पुष्टि इतनी अधिक नहीं पाई जाती है, जितनी कि बाइबल की पाई जाती है।

बाइबल का ईश्‍वरीय लेखक होने की पुष्टि बाइबल में वर्णित भविष्यद्वाणियों की एक बड़ी सँख्या में होने की पुष्टि से मिलता है, जो ठीक वैसे ही पूरी हुई हैं, जैसे कि उनकी भविष्यद्वाणी की गई थीं। उदाहरण के लिए, हम भजन संहिता को देखते हैं, यीशु मसीह के क्रूस पर चढ़ाए जाने के बारे में बताया जाना लगभग एक हजार साल पहले घटित हुआ था (भजन संहिता 22) और क्रूस के आविष्कार के होने से हजार वर्षों पहले इस भविष्यद्वाणी को किया गया था! सरल शब्दों में कहें, तो मनुष्यों के द्वारा दूर की बात को इतनी अधिक सुस्पष्टता और सटीकता के साथ कहना अभी तक सम्भव नहीं हुआ है। वास्तव में, यह विश्‍वास करना पूरी तरह से तर्करहित होगा कि ये पूरी होने वाली भविष्यद्वाणियाँ परमेश्‍वर के कार्य के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। संयोग से, और आश्‍चर्यजनक रूप से, संभाव्यता विशेषज्ञ हमें बताते हैं कि एक व्यक्ति (अर्थात् मसीह) के बारे में केवल अड़तालीस भविष्यद्वाणियों की गणितीय बाधाएँ ही सच हुई हैं, क्योंकि भविष्यद्वाणियों का 157 में दस का ही सच्चा होना सही प्रमाणित हुआ है!

परन्तु सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि बाइबल एक परी कथा नहीं है, अँसख्य जीवनों का परिवर्तन है, जो इसके पृष्ठों के द्वारा परिवर्तित हुए हैं। परमेश्‍वर के आत्मा के द्वारा उपयोग किए जाते हुए, बाइबल के पवित्र सत्यों ने लाखों पापियों को सन्तों में परिवर्तित कर दिया है। इसके द्वारा नशे की लत को चंगा किया गया है, समलैंगिकों ने इस से मुक्ति पाई है, इसके द्वारा आवारा और मृत्युशय्या पर पड़े हुए लोग परिवर्तित हुए हैं, इसके द्वारा कठोर मन वाले अपराधी सुधारे गए हैं, पापियों को इसके द्वारा ताड़ना प्राप्त हुई है और घृणा प्रेम में परिवर्तित हो गई है। "सिन्ड्रेला" या "बर्फ और सात बौने" वाली परियों की कथाओं को पढ़ने की कोई भी मात्रा मनुष्य की आत्मा पर इस तरह के परिवर्तन को प्रभावित नहीं कर सकती है। बाइबल में गतिशील और परिवर्तनकारी सामर्थ्य पाई जाती है, जो केवल इसलिए सम्भव है, क्योंकि यह वास्तव में परमेश्‍वर का वचन है।

पूर्ववर्ती प्रश्‍न के प्रकाश में, सबसे बड़ा प्रश्‍न यह है कि, तब कैसे कोई इतनी अधिक दृढ़ता के साथ, ईश्‍वर-श्‍वसित, त्रुटि मुक्त, जीवन-की-परिवर्तनकारी सच्चाइयों पर विश्‍वास नहीं कर सकता है? दुर्भाग्य से, इसका उत्तर बड़ा ही आसान है। परमेश्‍वर ने कहा है कि यदि हम उसके लिए अपने मन को नहीं खोलते हैं, तो वह हमारी आँखों को सत्य के लिए नहीं खोलेगा। यीशु ने प्रतिज्ञा की थी कि पवित्र आत्मा हमें सिखाएगा (यूहन्ना 14:26) और सत्य की ओर हमारा मार्गदर्शन करेगा (यूहन्ना 16:13)। और परमेश्‍वर की सच्चाई परमेश्‍वर के वचन में पाई जाती है (यूहन्ना 17:17)। इस प्रकार, जो विश्‍वास करते हैं, उनके लिए यह पवित्र वचन जीवन ही हैं, परन्तु जो बिना आत्मा के हैं, उनके लिए बाइबल मूर्खता से बढ़कर कुछ नहीं है (1 कुरिन्थियों 2:14)।

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