शालीनतापूर्वक वस्त्र पहनने का क्या अर्थ होता है?


प्रश्न: शालीनतापूर्वक वस्त्र पहनने का क्या अर्थ होता है?

उत्तर:
कलीसिया में स्त्रियों के लिए उपयुक्त रीति से वस्त्र पहनने की विधि का वर्णन करते हुए, प्रेरित पौलुस उन्हें "शालीनता" से "शिष्टता और उचित" रीति से अर्थात् दिखावे रहित होकर तैयार होने के लिए प्रेरित किया है, तत्पश्चात् वह उनकी अभद्रता से भरे हुए वस्त्रों की तुलना अच्छे कर्मों के साथ करता है, जो कि उन लोगों के लिए उपयुक्त हैं, जो परमेश्‍वर के सच्चे आराधक हैं (1 तीमुथियुस 2:9-10)। जिस तरह से हम कपड़े पहनते हैं, वह न केवल कलीसिया के लिए होता है; अपितु यह सभी समयों के लिए सभी मसीही विश्‍वासियों के लिए मापदण्ड होना चाहिए। इस बात को समझने की कुँजी यह है कि जो कुछ एक शिष्ठता से भरे हुए परिधान का निर्माण करता है, वह हमारे मनों के आचरण और मंशा की जाँच करता है। वे जिनके मन परमेश्‍वर की ओर लगे हुए हैं, वे सभ्यता, शालीनता और उचित रीति से तैयार होने के लिए प्रत्येक सम्भव प्रयास करेंगे।

एक भक्त स्त्री परमेश्‍वरीय दृष्टिकोण के साथ सब कुछ करने का प्रयास करती है। वह जानती है कि परमेश्‍वर उससे जो चाहता है, वह उसके लोगों को उसकी महिमा और मसीह में अपने भाइयों और बहनों की आत्मिक अवस्था के लिए चिन्तित होना है। यदि एक स्त्री एक मसीही विश्‍वासी होने का दावा करती है, तो वह इस तरह के परिधान को पहनती है, जो उसके शरीर की ओर अनायास ही ध्यान आकर्षित करता है, तब तो वह मसीह की एक बहुत ही कमजोर गवाह है, जिसने उसकी आत्मा को क्रूस के ऊपर दिए हुए अपने बलिदान के द्वारा खरीदा है। वह भूल रही है कि उसके शरीर को मसीह ने छुड़ाया है और अब वह पवित्र आत्मा का मन्दिर है (1 कुरिन्थियों 6:19-20)। वह संसार को बता रही है कि वह केवल स्वयं को ही शारीरिक रूप से सुन्दर देखती है और दूसरों का आकर्षण उसकी इस बात के ऊपर निर्भर करता है कि वह उसके शरीर को कितना अधिक दिखाती है। इसके अतिरिक्त, अभद्र तरीके से किए जाने वाला दिखावे भरा फैशन, उसके शरीर को लालसा को प्रदर्शित करते हुए, उसके मसीह में अपने भाइयों के लिए पाप करने का कारण बन जाता है, जो ऐसा कुछ है, जिसकी निन्दा परमेश्‍वर ने की है (मत्ती 5:27-29)। नीतिवचन 7:10 में एक स्त्री का उल्लेख किया गया है, जिसका "भेष वेश्या का सा था और वह बड़ी धूर्त थी।" यहाँ पर हम एक ऐसे मन की अवस्था के वर्णन को पाते हैं, जो उसके पहिरावे के तरीके से प्रदर्शित हो रहा है।

पवित्रशास्त्र कहता है कि एक स्त्री को शालीनता के साथ वस्त्रों को धारण करना चाहिए, परन्तु आधुनिक समाज में इसका क्या अर्थ है? क्या स्त्री को सिर से पैर तक स्वयं को ढकना है? संसार के धर्मों में ऐसे सम्प्रदाय अर्थात् पन्थ और धर्म पाए जाते हैं, जो स्त्रियों से ऐसा ही करने की माँग करते हैं। परन्तु क्या शालीनता के लिए बाइबल का यही अर्थ है? एक बार फिर से हमें हमारे मनों के व्यवहार के विषय की ओर लौट जाना होगा। यदि एक स्त्री का मन भक्ति की ओर झुका हुआ है, तो वह उन वस्त्रों को पहनती हैं, जो न तो उत्तेजक हैं और न ही सावर्जनिक रूप से उसके शरीर को दिखाते हैं, परमेश्‍वर की एक सन्तान होने के नाते कपड़े का पहनना उसकी अपनी व्यक्तिगत् गवाही को नकारात्मक रूप से नहीं दर्शाता है। यहाँ तक कि जब हर कोई निर्लज्जता से वस्त्रों को धारण कर रहा होता है, तब वह भीड़ के साथ जाने के प्रलोभन का विरोध करती है। वह जानती है कि इस प्रकार का परिधान उसके शरीर के ऊपर ध्यान आकर्षित करने के लिए निर्मित किए जाते हैं और यही पुरुषों के लिए वासना में पड़ जाने का कारण बन जाते हैं, परन्तु इतना जानना ही पर्याप्त बुद्धिमानी नहीं है कि उसके लिए ध्यान के आकर्षण का इस तरह का प्रकार उसे ही सस्ता बना देता है। अपने परिधान के कारण पुरूषों को परमेश्‍वर के विरूद्ध पाप करने के कारण बनने का विचार ही उसके लिए घृणा की बात होती है, क्योंकि वह परमेश्‍वर को प्रेम करना और सम्मान देना चाहती है और दूसरों से भी ऐसा ही चाहती है। परिधान में शिष्टता एक शिष्ट और भक्ति से भरे हुए मन को प्रगट करता है, यह ऐसा व्यवहार है, जिसकी इच्छा उन सभी स्त्रियों में होनी चाहिए, जो परमेश्‍वर को प्रसन्न करना और सम्मान देना चाहती हैं।

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