इसका क्या अर्थ है कि परमेश्‍वर उद्धार के लिए हमें उसकी ओर खींचता है?


प्रश्न: इसका क्या अर्थ है कि परमेश्‍वर उद्धार के लिए हमें उसकी ओर खींचता है?

उत्तर:
परमेश्‍वर के उद्धार पर चित्रण का स्पष्ट वचन यूहन्ना 6:44 है, जहाँ यीशु ने घोषणा की है कि "कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले; और मैं उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊँगा।" जिस यूनानी शब्द का अनुवाद "खींच" के लिए हुआ है, वह हैल्कूओ, जिसका अर्थ "घसीटने" (शाब्दिक या रूपकीय रूप से) से है। स्पष्ट है कि यह खींचना एक-तरफा कार्य है। परमेश्‍वर उद्धार के लिए अपनी ओर खींचता है; हम जो उसकी ओर खींचे गए हैं, इस प्रक्रिया में निष्क्रिय भूमिका को निभाते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि हम उसके द्वारा खींचे जाने के लिए उत्तर देते हैं, परन्तु खींचना पूर्ण रूप से उसके ऊपर निर्भर होता है।

हैल्कूओ का उपयोग यूहन्ना 21: 6 में किया गया है, जहाँ किनारे की ओर मछली से भरा भारी एक जाल को खींचे जाते हुए देखा जा सकता है। यूहन्ना 18:10 में हम देखते हैं कि पतरस अपनी तलवार को बाहर खींचता है, और प्रेरितों 16:19 में हैल्कूओ का उपयोग पौलुस और सीलास को सरदारों के सामने बाज़ार में खींचने के लिए किया जाता है। स्पष्ट है कि किनारे की ओर खींचे जाने वाले जाल की अपनी कोई सामर्थ्य नहीं थी, पतरस की तलवार का खींचा जाने में स्वयं का कोई भाग नहीं था, और पौलुस और सीलास स्वयं को बाजार में खींच कर नहीं लाए थे। कुछ लोगों को उद्धार के लिए अपनी ओर खींचने के बारे में परमेश्‍वर के लिए ऐसा ही कहा जा सकता है। कुछ लोग स्वेच्छा से चले आते हैं, और कुछ अनिच्छा में खींचे जाते हैं, परन्तु अन्त में सभी आ जाते हैं, यद्यपि खींचे जाने में हमारा कोई भाग नहीं होता है।

परमेश्‍वर को हमें उद्धार के लिए अपनी ओर खींचने की आवश्यकता क्यों है? सीधे शब्दों में कहें तो यदि उसने ऐसा नहीं किया तो हम कभी भी उसके पास नहीं आएंगे। यीशु बताता है कि जब तक पिता उन्हें अपनी ओर नहीं खींचता है तब तक कोई भी व्यक्ति उस तक नहीं आ सकता (यूहन्ना 6:65)। स्वाभाविक मनुष्य के पास परमेश्‍वर के पास आने की कोई क्षमता नहीं है, और न ही वह उसके पास आने की कोई इच्छा रखता है। क्योंकि उसका दिल कठोर है और उसका मन अन्धेरा हो गया है, नवजीवन न पाया हुआ व्यक्ति परमेश्‍वर की इच्छा नहीं करता है और वास्तव में वह परमेश्‍वर का शत्रु है (रोमियों 5:10)। जब यीशु कहता है कि कोई भी व्यक्ति उसे परमेश्‍वर के खींचे बिना उस के पास नहीं आ सकता है, तो वह पापी के पूर्ण रूप से भ्रष्ट होने और उस अवस्था की सार्वभौमिकता के बारे में अपने कथन को दे रहा था। एक न बचाए हुए व्यक्ति का मन इतना अधिक अन्धरकारमयी हो गया है कि उसे यह पता ही नहीं है कि: "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?" (यिर्मयाह 17:9)। इसलिए, यह केवल परमेश्‍वर के दयालुता और अनुग्रहकारी खींचने से ही सम्भव है कि हम बचाए गए हैं। पापियों के मन परिवर्तन में, परमेश्‍वर उनके मनों को प्रकाशित कर देता है (इफिसियों 1:18), उनकी इच्छा को स्वयं की इच्छा की ओर ले आता है, और उनके प्राण को प्रभावित करता है, जिसके बिना उनकी आत्मा अन्धेरी और परमेश्‍वर के विरूद्ध विद्रोही बनी रहती है। यह सब खींचने की प्रक्रिया में सम्मिलित है।

एक ऐसा भाव है, जिसमें परमेश्‍वर सभी मनुष्यों को अपनी ओर खींचता है। इसे "सामान्य बुलाहट" के रूप में जाना जाता है और इसे परमेश्‍वर के चुने हुए के लिए "प्रभावशाली बुलाहट" से अलग किया जाता है। भजन संहिता 19:1-4 और रोमियों 1:20 जैसे सन्दर्भ इसी सच्चाई को प्रमाणित करते हैं कि परमेश्‍वर की शाश्‍वतकालीन सामर्थ्य और ईश्‍वरीय स्वभाव जो कुछ सृजा गया है, उसमें "स्पष्ट रूप से देखा गया" और "समझा गया" है, "ताकि लोगों के पास कोई बहाना न हो।" परन्तु लोग अभी भी परमेश्‍वर का इनकार करते हैं, और जो लोग उसके अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, वे अभी भी उनके बचाने वाले ज्ञान जो कि उसके द्वारा अपनी ओर खींचने से परे का है, में नहीं आते हैं। केवल वही लोग जो विशेष प्रकाशन के माध्यम से उसकी ओर खींचे गए और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और परमेश्‍वर की कृपा से प्रेरित हुए हैं — मसीह के पास आएंगे।

ऐसे कई ठोस तरीके हैं, जिनमें जिनके लिए उद्धार को तैयार किया गया है, वे उसकी ओर खींचे जाने का अनुभव करते हैं। सबसे पहले, पवित्र आत्मा हमें हमारे पापी अवस्था और उद्धारकर्ता की हमारी आवश्यकता के बारे में निरूत्तर करता है (यूहन्ना 16:8)। दूसरा, वह आत्मिक बातों में पहले वाली अज्ञात रुचि को जगा देता है और उनके लिए ऐसी इच्छा को उत्पन्न करता है, जो पहले कभी भी नहीं थी। अचानक हमारे कान खुले हुए होते हैं, हमारे मन उसके प्रति झुके हुए होते हैं, और उसका वचन हमारे लिए एक नए और रोमांचकारी आकर्षण को पकड़ना आरम्भ कर देता है। हमारी आत्माएँ आत्मिक सत्य को समझना आरम्भ करती हैं, जो हमें पहले कभी समझ में नहीं आते थे: "परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्‍वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसकी दृष्‍टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उनकी जाँच आत्मिक रीति से होती है" (1 कुरिन्थियों 2:14)। अन्त में, हम में नई इच्छाएँ आरम्भ होती हैं। वह हमारे भीतर एक नया मन को पाते हैं, जो परमेश्‍वर की ओर झुका रहता है, यह एक मन होता है, जो उसे जानने की इच्छा के साथ होता है, और यह "जीवन की नवीनता" में चलता है (रोमियों 6:4) जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है।

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