क्या परमेश्वर मुझे प्रेम करते हैं?


प्रश्न: क्या परमेश्वर मुझे प्रेम करते हैं?

उत्तर:
यह प्रश्न कि क्या परमेश्वर हमसे — व्यक्तिगत् और व्यक्तिगत् रूप से प्रेम करता है — सामान्य है। सीमित मानवता के सशर्त प्रेम से घिरे हुए होने के कारण, हम आसानी से यह नहीं समझ सकते हैं कि परमेश्वर हमें प्रेम करता है। हम अपने दोषों को जानते हैं। हम जानते हैं कि परमेश्वर सिद्ध और पाप रहित है। हम जानते हैं कि हम नहीं हैं। परमेश्वर, जो कि अनन्त और पवित्र हैं, हमसे प्रेम क्यों करता है, जो कि सीमित और पापी हैं? और तौभी सुसमाचार का महान सत्य यह है कि वह करता है! निरन्तर, पवित्रशास्त्र हमें हमारे लिए परमेश्वर के प्रेम को स्मरण दिलाता है।

विषय का आरम्भ करने के लिए, परमेश्वर ने अपने स्वरूप में मानव जाति का निर्माण किया। और उसने ऐसा बहुत ही सावधानी और सरोकार के साथ किया। उसने “ आदम को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्‍वास फूँक दिया; और आदम जीवित प्राणी बन गया... परमेश्‍वर ने आदम को भारी नींद में डाल दिया, और जब वह सो गया तब उसने उसकी एक पसली निकालकर उसकी जगह मांस भर दिया। और यहोवा परमेश्‍वर ने उस पसली को जो उसने आदम में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया”(उत्पत्ति 2:7, 21-22)। यहाँ परमेश्वर और मानव जाति के बीच घनिष्टता पाई जाती है। शेष सृष्टि के साथ, परमेश्वर ने केवल बात की थी और वह हो गई थी। तौभी परमेश्वर ने स्त्री और पुरुष को बनाने में समय लिया। उसने उन्हें पृथ्वी पर प्रभुत्व करने का अधिकार दिया (उत्पत्ति 1:28)। परमेश्वर आदम और हव्वा से सीधे सम्बन्धित है। पतन के बाद, यह दम्पति परमेश्वर से छिप गया जब वह “दिन के ठण्डे समय वाटिका में घूमने” के लिए आया (उत्पत्ति 3:8)। परमेश्वर के साथ बात करना उनके लिए असामान्य नहीं था; उनके लिए छिपना असामान्य था।

पतन के बाद परमेश्वर के साथ सम्बन्ध टूट गया था, परन्तु उसका प्रेम उनके प्रति ऐसे ही बना रहा। पापी जोड़े के ऊपर परमेश्वर के द्वारा शाप दिए जाने के उच्चारण के तुरन्त बाद, पवित्रशास्त्र ने परमेश्वर के प्रेम से भरे हुए एक और चित्र को चित्रित किया। “यहोवा परमेश्‍वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अँगरखे बनाकर उनको पहिना दिए। फिर यहोवा परमेश्‍वर ने कहा, ‘मनुष्य भले बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है : इसलिये अब ऐसा न हो कि वह हाथ बढ़ाकर जीवन के वृक्ष का फल भी तोड़ के खा ले और सदा जीवित रहे’“ उत्पत्ति 3:21-23)। परमेश्वर का कार्य यहाँ प्रतिशोधी या दण्डात्मक नहीं है; यह सुरक्षात्मक है। परमेश्वर ने उनकी शर्म को छिपाने के लिए आदम और हव्वा को कपड़े पहनाए। उसने उन्हें आगे के नुकसान से बचाने के लिए अदन से बाहर निकाल दिया। परमेश्वर ने प्रेम में होकर काम लिया। इसके बाद, परमेश्वर की छुटकारे और पुनर्स्थापना की योजना के खुलासे का आरम्भ हो जाता है — एक ऐसी योजना जो पतन के बाद के लिए नहीं बनाई गई थी, परन्तु सृष्टि के सृजन होने से पहले निर्मित की गई थी (1 पतरस 1:20)। परमेश्वर मानव जाति से इतना अधिक प्रेम करता है कि उसने इस पीड़ा को जानते हुए भी हमें सृजा कि हमारे छुटकारे के लिए उसे मूल्य चुकाना पड़ेगा।

ऐसे कई सन्दर्भ हैं जो परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित करते हैं। हम उसकी कोमलता को पुराने और नए नियम में एक जैसे रूप में देख सकते हैं। परमेश्वर के प्रेम के बारे में दाऊद और अन्य भजन संहिता विशेष रूप से स्पष्ट थे। केवल भजन संहिता 139 को ही देख लें। सुलैमान का श्रेष्ठ गीत प्रेम का एक और सुन्दर चित्र है। इस्राएलियों के इतिहास में परमेश्वर का प्रेम और भी अधिक स्पष्ट पाया जाता है, क्योंकि उसने बचे हुए लोगों के एक समूह को लगातार सुरक्षित रखा था और अपने लोगों को आज्ञा पालन करने और उसके साथ बने रहने के लिए विनती की। परमेश्वर को न्यायी, परन्तु साथ ही दयालु भी देखा जाता है। वह उदार है। वह अपने लोगों के लिए ईर्ष्या करता है, उनके लिए इच्छा रखता है ताकि सम्बन्ध को बहाल किया जाए।

कभी-कभी हम पुराने नियम को देखते हैं और सोचते हैं कि परमेश्वर केवल लोगों को एक जाति के रूप में ही प्रेम करता है, व्यक्तियों के रूप में नहीं। परन्तु यह स्मरण रखना महत्वपूर्ण है कि रूत, हाजिरा, दाऊद, अब्राहम, मूसा और यिर्मयाह सभी व्यक्ति थे। परमेश्वर ने उनके प्रत्येक जीवन में कदम रखा और उन्हें व्यक्तिगत् रूप से प्रेम किया। यह प्रेम यीशु नाम के व्यक्ति में स्पष्ट हो जाता है।

परमेश्‍वर ने हमें छुड़ाने के लिए स्वयं को मनुष्य के शरीर में सीमित कर लिया (देखें फिलिप्पियों 2:5-11)। वह एक नम्र परिवार में जन्म लिए हुए एक बच्चे के रूप में हमारे संसार में बहुत ही अधिक विनम्र तरीके से प्रवेश करता है (उसने अपनी पहली रात जानवरों को भोजन खिलाने वाली खुरली में बिताई)। यीशु किसी भी अन्य बच्चे की तरह बड़ा हुआ। अपनी सार्वजनिक सेवकाई के समय, उसने अक्सर स्वयं को समाज के बहिष्कृत लोगों के साथ जोड़ा। वह बीमारों के चंगा करने के लिए रुका। उसने लोगों को चंगा किया। उसने लोगों की बात सुनी। उसने बच्चों को आशीष दी। उसने हमें परमेश्वर के प्रेम के बारे में भी सिखाया। लूका 13:34 यीशु को रोते हुए लिपिबद्ध करता है, “हे यरूशलेम! हे यरूशलेम! तू जो भविष्यद्वक्‍ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए उन पर पथराव करता है। कितनी ही बार मैं ने यह चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्‍चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठा करूँ, पर तुम ने यह न चाहा!” यह परमेश्वर की मन की इच्छा के बारे में बोलता है कि लोग उसके पास लौट आएँ। वह हमारे लिए तरसता है। हमें दण्ड देने के लिए नहीं, अपितु हमें प्रेम करने के लिए।

कदाचित् परमेश्वर के प्रेम का सबसे बड़ा चित्र यीशु का दु:ख भोग और क्रूसीकरण है। पौलुस हमें स्मरण दिलाता है कि, “क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्‍तिहीनों के लिये मरा। किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो दुर्लभ है; परन्तु हो सकता है किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी साहस करे। परन्तु परमेश्‍वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा” (रोमियों 5:6-8)। क्रूस पर यीशु का कार्य प्रेम की स्पष्ट, अचूक घोषणा थी। और यह प्रेम शर्तरहित है। जब हम अपनी सबसे बुरी अवस्था में थे तब मसीह हमारे लिए मरा। “उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे... परन्तु परमेश्‍वर ने जो दया का धनी है, अपने उस बड़े प्रेम के कारण जिस से उसने हम से प्रेम किया, जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे तो हमें मसीह के साथ जिलाया — अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है” (इफिसियों 2:1, 4-5)।

इस उद्धार ने सच्चे जीवन को सम्भव बनाया है। “चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्‍ट करने को आता है; मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएँ, और बहुतायत से पाएँ” (यूहन्ना 10:10)। परमेश्वर कंजूस नहीं है। वह हम पर अपना प्रेम लुटाना चाहता है। “अत: अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं। क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन् आत्मा के अनुसार चलते हैं। क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतन्त्र कर दिया” पौलुस इस घोषणा को रोमियों 8:1-2 में करता है।

स्मरण रखें, पौलुस पहले मसीह का शत्रु था। उसने मसीहियों को बुरी तरह से सताया था। वह परमेश्वर के प्रेम की समझ की अपेक्षा व्यवस्था के शब्दों के अनुसार जीवन व्यतीत करता था। पौलुस, यदि वह परमेश्वर के प्रेम के बारे में सोचता भी, तो कदाचित् उसे यह महसूस होता कि परमेश्वर उस से व्यवस्था के-पालन से अलग हो प्रेम नहीं कर सकता है। तौभी, मसीह में, उसने परमेश्वर के अनुग्रह को पाया और परमेश्वर के प्रेम को स्वीकार किया। परमेश्वर के प्रेम के प्रति उसकी सबसे बड़ी अभिव्यक्तियों में एक यह है: “अत: हम इन बातों के विषय में क्या कहें? यदि परमेश्‍वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है? जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये दे दिया — वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्यों न देगा?... कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?... परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं। क्योंकि मैं निश्‍चय जानता हूँ कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्‍टि हमें परमेश्‍वर के प्रेम से जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी” (रोमियों 8:31-32, 35-39)।

इसलिए सरल उत्तर है, “हाँ।” हाँ, परमेश्वर आपको प्रेम करता है! यह मानना कितना भी कठिन हो सकता है, परन्तु यही सत्य है।

आपके लिए परमेश्वर के प्रेम के बारे में अन्य पवित्रशास्त्र के अन्य वचन:

1 यूहन्ना 4:8 — “... परमेश्वर प्रेम है”

इफिसियों 5:1-2 — “इसलिये प्रिय बालकों के समान परमेश्‍वर का अनुकरण करो, और प्रेम में चलो जैसे मसीह ने भी तुम से प्रेम किया, और हमारे लिये अपने आप को सुखदायक सुगन्ध के लिये परमेश्‍वर के आगे भेंट करके बलिदान कर दिया।”

इफिसियों 5:25-27 — “हे पतियो, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया कि उसको वचन के द्वारा जल के स्‍नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए, और उसे एक ऐसी तेजस्वी कलीसिया बनाकर अपने पास खड़ी करे, जिसमें न कलंक, न झुर्री, न कोई और ऐसी वस्तु हो वरन् पवित्र और निर्दोष हो।”

यूहन्ना 15:9-11 — “जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा; मेरे प्रेम में बने रहो। यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे; जैसा कि मैं ने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है, और उसके प्रेम में बना रहता हूँ। मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि मेरा आनन्द तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए।”

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