क्या परमेश्वर के पास भावनाएँ हैं?


प्रश्न: क्या परमेश्वर के पास भावनाएँ हैं?

उत्तर:
पवित्रशास्त्र में ऐसे कई वचन पाए जाते हैं जो परमेश्वर की भावनाओं की बात करते हैं। उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने निम्नलिखित बातों का प्रदर्शन किया:
• क्रोध — भजन संहिता 7:11; व्यवस्थाविवरण 9:22; रोमियों 1:18
• तरस — भजन संहिता संहिता 135:14; न्यायियों 2:18; व्यवस्थाविवरण 32:36
• उदासी — उत्पत्ति 6:6; भजन संहिता 78:40
• प्रेम — 1 यूहन्ना 4:8; यूहन्ना 3:6; यिर्मयाह 31:3
• धृणा — नीतिवचन 6:16; भजन संहिता 5:5; भजन संहिता 11:5
• ईर्ष्या — निर्गमन 20:5; निर्गमन 34:14; यहोशू 24:19
• आनन्द — सपन्याह 3:17; यशायाह 62:5; यिर्मयाह 32:41

तथापि, क्या परमेश्वर की भावनाएँ उसी प्रकार की भावनाएँ हैं जैसी हम मनुष्य प्रदर्शित करते हैं? क्या उसे "भावनात्मक" समझना सही है (क्या उसमें मूड स्विंग होता है) अर्थात् क्या उसकी मन की स्थिति बदलती रहती है? धर्मवैज्ञानिक विचारधारा में, व्यक्तित्व को अक्सर "बुद्धि, भावना और इच्छा के साथ एक व्यक्ति के होने की स्थिति" के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस तरह, परमेश्वर, एक "व्यक्ति" है, जिसमें वह एक ऐसे व्यक्तिगत् परमेश्वर के रूप में पाया जाता है, जिसमें मन, भावनाएँ और उसकी अपनी इच्छा सम्मिलित है। परमेश्वर की भावनाओं को अस्वीकार करने का अर्थ यह अस्वीकार करना है कि उसके पास व्यक्तित्व ही नहीं है।

निश्चित रूप से मनुष्य इस संसार में भौतिक रूप से रहने के कारण इसकी बातों के प्रति उत्तर में प्रत्युत्तर देता है, परन्तु हम आत्मिक रूप से भी प्रतिक्रिया देते हैं — हमारे प्राण प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, और हम इसे "भावना" कहते हैं। मानवीय भावना का तथ्य एक ऐसा प्रमाण है कि परमेश्वर के पास भी भावनाएँ हैं, क्योंकि उसने हमारी सृष्टि उसके स्वरूप में की है (उत्पत्ति 1:27)। एक और प्रमाण देहधारण है। इस संसार में परमेश्वर के पुत्र के रूप में, यीशु एक भावनाहीन स्वचलित प्राणी नहीं था। उसने उसे महसूस किया जिसे हम महसूस करते हैं, उनके साथ रोया जो रोते हैं (यूहन्ना 11:35), भीड़ के लिए तरस को महसूस किया (मरकुस 6:34), और उदासी के ऊपर जय को प्राप्त किया (मत्ती 26:38)। इन सब के माध्यम से, उसने हम पर पिता को प्रकट किया (यूहन्ना 14:9)।

यद्यपि, परमेश्वर अनुभवातीत है, हम उसे एक व्यक्तिगत्, जीवित परमेश्वर के रूप में जानते हैं, जो अपनी सृष्टि के साथ घनिष्ठता के साथ जुड़ता है। वह हमें उन तरीकों से प्रेम करता है जिन की हम थाह नहीं पा सकते हैं (यिर्मयाह 31:3; रोमियों 5:8; 8:35, 38-39), और वह हमारे पाप के विरुद्ध और विद्रोह से बहुत अधिक दु:खी होता है (भजन संहिता 1:5; 5:4–5; नीतिवचन 6:16-19)।

हम साकार करते हैं कि भावनाओं का प्रदर्शन परमेश्वर की इच्छा या उसकी प्रतिज्ञाओं की अपरिवर्तनशीलता या स्थायित्व को नहीं बदलता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर नहीं बदलता (मलाकी 3:6; गिनती 23:19; 1 शमूएल 15:29); उसके मिजाज में कोई परिवर्तन नहीं होता अर्थात् उसके पास मूड स्विंग नहीं है। अपनी सृष्टि के प्रति परमेश्वर की भावनाएँ और कार्य, परमेश्वर का न्याय और क्षमा, धार्मिकता और अनुग्रह, सभी कुछ वह जो है, उसके अनुरूप है (याकूब 1:17)। भले और बुरे के प्रति परमेश्वर की प्रतिक्रियाएँ उसकी अपरिवर्तनीय इच्छा से आती हैं। परमेश्वर न्याय को ले आने और न्याय के अनुसार, पापी को पश्चाताप में लाने के लिए पापी का न्याय करने और उसे दण्ड देने की इच्छा रखता है क्योंकि वह चाहता है कि सभी लोग बचाए जाएँ (1 तीमुथियुस 2:4)। हम एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परमेश्वर को जानते हैं और उससे सम्बन्धित हैं, जो प्रेम करता है और दु:खी होता और हँसता, क्रोध और तरस को महसूस करता है। वह धर्मी से प्रेम करता है और दुष्टों से घृणा करता है (भजन संहिता 11:5–7; 5:4–5; 21:8)।

यह कहना उचित नहीं है कि हमारी और परमेश्वर की भावनाएँ बिल्कुल एक जैसी हैं। हम कभी-कभी अपनी भावनाओं को हमारे निर्णय के ऊपर थोपते हैं क्योंकि हमारे पापी स्वभाव ने हमारी भावनाओं को दूषित कर दिया है। परन्तु परमेश्वर के पास ऐसा कोई पाप नहीं है, और उसकी भावनाएँ दूषित नहीं हैं। उदाहरण के लिए, मानवीय क्रोध और ईश्वरीय क्रोध के बीच एक बड़ा अन्तर पाया जाता है। मानवीय क्रोध अस्थिर, व्यक्ति आधारित और बहुत बार नियन्त्रण से बाहर होता है (नीतिवचन 14:29; 15:18; याकूब 1:20)। परमेश्वर का क्रोध ईश्वरीय न्याय में निहित होता है। परमेश्वर का क्रोध पूरी तरह से धार्मिकता भरा हुआ और पूर्वसूचनीय है, जो कभी भी स्वेच्छाचारी या दुर्भावनापूर्ण नहीं है। अपने क्रोध में, वह कभी पाप नहीं करता।

परमेश्वर की सभी भावनाएँ उसके पवित्र स्वभाव में निहित हैं और उसे सदैव पाप रहित व्यक्त किया जाता है। परमेश्वर की करुणा, दुःख, और आनन्द सभी पूर्णता से सिद्ध प्राणी के भाव हैं। मरकुस 3:5 में आराधनालय के अगुवों पर यीशु का क्रोध और मरकुस 10:21 में धनी युवा सरदार के लिए उसका प्रेम पूरी तरह से उसके ईश्वरीय स्वभाव से प्रेरित प्रतिक्रियाएँ थीं।

परमेश्वर के तरीके हमारे लिए ऐसे शब्दों में लिपीबद्ध किए गए हैं कि जिसमें हम उन्हें समझ सकते हैं और उससे सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। परमेश्वर का क्रोध और पाप के विरुद्ध उसका क्रोध वास्तविक है (नीतिवचन 8:13; 15:9)। और पापियों के लिए उसकी करुणा अटल और वास्तविक है (2 पतरस 3:9; सभोपदेशक 8:11; यशायाह 30:18)। उसके कार्य उसके न अन्त होने वाले अनुग्रह और दया को प्रकट करते हैं। परन्तु इन सबसे भी बढ़कर, उसकी सन्तान के लिए उसका प्रेम न समाप्त होने वाला (यिर्मयाह 31:3) और अडिग है (रोमियों 8:35, 38-39)। परमेश्वर के पास न केवल विचार और योजनाएँ हैं; उसके पास भावनाएँ और इच्छाएँ भी हैं। मनुष्यों की पाप-से भ्रष्ट भावनाओं की अविश्वसनीयता और अस्थिरता के विपरीत, परमेश्वर की भावनाएँ पूरी तरह से भरोसे के योग्य और अपरिवर्तनीय हैं।

परमेश्वर और उसकी भावनाओं से सम्बन्धित दो अद्भुत बातें यह हैं: पहला, वह हमारी भावनाओं को समझता है (क्योंकि उसने हमें उन्हें महसूस करने की क्षमता के साथ रचा है), और दूसरा, उसकी अपनी भावनाएँ उसकी पूर्णता में से निरन्तर बहती रहती हैं। परमेश्वर के लिए कोई भी दिन बुरा नहीं होता; वह अपनी भावनाओं को अपने छुड़ाए हुओं के प्रति कभी नहीं बदलेगा।

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