क्या परमेश्वर घृणा करता है? यदि परमेश्वर प्रेम है, तो वह घृणा कैसे कर सकता है?


प्रश्न: क्या परमेश्वर घृणा करता है? यदि परमेश्वर प्रेम है, तो वह घृणा कैसे कर सकता है?

उत्तर:
यह एक विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है कि परमेश्वर जो प्रेम करता है वह घृणा भी कर सकता है। तौभी बाइबल जो कहती है वही सच है: परमेश्वर प्रेम है (1 यूहन्ना 4:8), और परमेश्वर घृणा करता है (होशे 9:15)। परमेश्वर का स्वभाव प्रेम है- वह सदैव वही करता है जो दूसरों के लिए सबसे अच्छा होता है — और वह अपने स्वभाव के विपरीत घृणा करता है — वह उस बात से घृणा करता जो उसके प्रेम के विपरीत है।

किसी को यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि परमेश्वर कुछ चीजों से घृणा करते हैं। उसने हमें प्रेम और घृणा दोनों की क्षमता के साथ रचा है, और हम स्वीकार करते हैं कि घृणा कभी-कभी न्यायसंगत होती है — हम स्वाभाविक रूप से उन चीजों से घृणा करते हैं जो उन चीजों को नष्ट करती हैं जिन्हें हम प्रेम करते हैं। हमारे अस्तित्व का यह भाग परमेश्वर के स्वरूप में निर्मित किया गया है। सच्चाई तो यह है कि हम सभी पाप के कारण बिगड़े हुए हैं, इसका अर्थ है कि हमारा प्रेम और घृणा कभी-कभी गलत हो जाती है, परन्तु हमारे अस्तित्व में पाप का स्वभाव हमारे परमेश्वर द्वारा दिए गए प्रेम और घृणा करने की क्षमता को नकारता नहीं है। मनुष्य के लिए प्रेम और घृणा करने में सक्षम होना कोई विरोधाभास नहीं है, और न ही यह परमेश्वर के लिए प्रेम और घृणा करने में सक्षम होने के लिए विरोधाभास है।

जब बाइबल परमेश्वर की घृणा की बात करती है, तो उसकी घृणा का उद्देश्य पाप और दुष्टता के विषय हैं। जिन बातों से परमेश्वर घृणा करता, वे मूर्तिपूजा (व्यवस्थाविवरण 12:31; 16:22), बच्चों का बलिदान, यौन भ्रष्टता या विकृतियाँ (लैव्यव्यवस्था 20:1-23), और जो लोग बुराई करते हैं (भजन संहिता 5:4-6; 11:5) इत्यादि हैं। नीतिवचन 6:16-19 में परमेश्वर के द्वारा घृणा करने वाली सात बातों की सूची दी गई है: घमण्ड, झूठ बोलना, हत्या करना, अनर्थ कल्पना गढ़नेवाला मन, बुराई करने वाले, झूठ बोलनेवाला साक्षी और झगड़ा उत्पन्न करनेवाला मनुष्य इत्यादि हैं। ध्यान दें कि इस सन्दर्भ में केवल उन बातों को ही सम्मिलित नहीं किया गया है जिनसे परमेश्वर घृणा करता है; इसमें लोग भी सम्मिलित हैं। इसका कारण सरल है: पाप को पापी से अलग नहीं किया जा सकता केवल यह तभी सम्भव है जब वह केवल मसीह के द्वारा उपलब्ध क्षमा को प्राप्त किया हो। परमेश्वर झूठ बोलने वाले से घृणा करता है, हाँ, परन्तु झूठ बोलना सदैव एक व्यक्ति को सम्मिलित करता है — अर्थात् एक झूठे व्यक्ति को — जो झूठ बोलना चुनता है। परमेश्वर झूठ का न्याय झूठे व्यक्ति को पहचाने बिना नहीं कर सकता है।

बाइबल स्पष्टता के साथ शिक्षा देती है कि परमेश्‍वर संसार के लोगों से प्रेम करता है (यूहन्ना 3:16)। परमेश्वर ने दुष्टता से भरे नीनवे को क्षमा, उन्हें पश्चाताप की ओर लाते हुए कर दिया था (योना 3)। परमेश्वर दुष्टों की मृत्यु से कोई आनन्द नहीं पाता है (यहेजकेल 18:32)। उसका धैर्य इतना अधिक चरम पर पाया जाता है कि, “कोई नष्‍ट हो, वरन् यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले” (2 पतरस 3:9)। यह सब प्रेम का ही परिणाम है — परमेश्वर उसकी रचना के लिए सबसे अच्छे की चाहत करता है। उसी समय, भजन संहिता 5:5 परमेश्वर के बारे में कहता है कि, “तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है।” भजन संहिता 11:5 तो और भी कठोर है: “जो दुष्‍ट हैं और उपद्रव से प्रीति रखते हैं अपनी आत्मा में घृणा करता है।”

इससे पहले कि एक व्यक्ति पश्चाताप करे और प्रभु यीशु मसीह में विश्वास करे, वह परमेश्वर का शत्रु है (कुलुस्सियों 1:21)। तौभी, इससे पहले कि वह बच जाए, उसे परमेश्वर के द्वारा प्रेम किया जाता है (रोमियों 5:8) — अर्थात्, परमेश्वर ने अपनी ओर से अपने एकलौते पवित्र पुत्र को बलिदान में दे दिया। तब प्रश्न यह खड़ा हो जाता है कि उसी समय क्या होता है जब एक व्यक्ति परमेश्वर के प्रेम को ठुकरा देता है, पश्चाताप करने से इन्कार कर देता है और हठी हो अपने पाप के प्रति अड़े रहता है? उत्तर: परमेश्वर उसका न्याय करेगा, क्योंकि परमेश्वर को पाप का न्याय करना है, और इसका अर्थ यह है कि वह पापी का न्याय करता है। ये “दुष्ट” लोग हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है — जो लोग अपने पाप और विद्रोह में बने रहते हैं, यहाँ तक कि मसीह में परमेश्वर की कृपा और दया के सामने भी पाप के प्रति अड़े रहते हैं।

दाऊद लिखता है कि, “क्योंकि तू ऐसा ईश्‍वर नहीं जो दुष्‍टता से प्रसन्न हो; बुराई तेरे साथ नहीं रह सकती” (भजन संहिता 5:4)। इसके विपरीत, जो लोग परमेश्वर की शरण लेते हैं, वे “आनन्दित रहेंगे” और “सर्वदा ऊँचे स्वर से गाते रहेंगे” (भजन संहिता 5:11)। सच्चाई तो यह है कि, भजन संहिता 5 और भजन संहिता 11 दोनों धर्मी (जो परमेश्वर की शरण लेते हैं) और दुष्टों (परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने वाले) के बीच एक विपरीत प्रभाव को प्रगट करते हैं। धर्मी और दुष्ट भिन्न बातों का चुनाव करते हैं और उनके गंतव्य भिन्न तरह के होते हैं — धर्मी तो परमेश्वर के प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति को देखेंगे, और दुष्ट परमेश्वर की धृणा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति को जान जाएंगे।

हम सिद्ध प्रेम के साथ प्रेम नहीं कर सकते हैं, और न ही हम सिद्ध घृणा के साथ घृणा कर सकते हैं। परन्तु परमेश्वर प्रेम और घृणा दोनों को सिद्धता के साथ कर सकता है, क्योंकि वह परमेश्वर है। परमेश्वर पापी मंशा के बिना घृणा कर सकता है। वह सिद्धता के साथ पवित्र तरीके से पापी से घृणा कर सकता है और तौभी पश्चाताप और विश्वास के क्षण में पापी को प्रेम के साथ क्षमा कर सकता है (प्रकाशितवाक्य 2:6; 2 पतरस 3:9)।

सभी के लिए अपने प्रेम में, परमेश्वर ने अपने पुत्र को उद्धारकर्ता बनने के लिए भेजा। दुष्ट, जिन्हें अभी भी क्षमा नहीं किया गया हैं, परमेश्वर उनसे घृणा करता है क्योंकि “उनके अपराधों की अधिकता बहुत है, क्योंकि उन्होंने उस से बलवा किया है” (भजन संहिता 5:10)। परन्तु — और यह समझना महत्वपूर्ण है कि — परमेश्वर की इच्छा है कि दुष्ट अपने पाप से पश्चाताप करें और मसीह की शरण लें। बचाए जाने वाले विश्वास की प्राप्ति के क्षण में, दुष्ट पापी को अन्धेरे के राज्य से हटा दिया जाता है और प्रेम के राज्य में स्थानांतरित कर दिया जाता है (कुलुस्सियों 13:13)। सारी तरह की शत्रुता को भंग कर दिया जाता है, सारे पापों को हटा दिया जाता है, और सारी बातों को नया बना दिया जाता है (2 कुरिन्थियों 5:17)।

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