ईश्‍वरीय विधान क्या है?



प्रश्न: ईश्‍वरीय विधान क्या है? प्रार्थना करने की क्या आवश्यकता है जब परमेश्वर भविष्य को जानता है और सब कुछ उसके नियन्त्रण में है। यदि हम परमेश्वर के मन को परिवर्तित नहीं कर सकते हैं, तो हमें प्रार्थना क्यों करनी चाहिए?

उत्तर:
ईश्‍वरीय विधान वे तरीके हैं, जिनके द्वारा और जिनके माध्यम से परमेश्‍वर इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु के ऊपर शासकीय नियंत्रण रखता है। ईश्‍वरीय विधान का धर्मसिद्धान्त कहता है, कि परमेश्‍वर का सभी वस्तुओं के ऊपर पूर्ण अधिकार है। इसमें पूरा का पूरा ब्रह्माण्ड (भजन संहिता 103:19), लौकिक संसार (मत्ती 5:45), राष्ट्रों से सम्बन्धित सभी कार्य (भजन संहिता 66:7), मनुष्य का जन्म और गंतव्य (गलातियों 1:15), मनुष्य की सफलता और असफलता (लूका 1:52), और उसके लोगों की सुरक्षा (भजन संहिता 4:8) इत्यादि सम्मिलित है। यह धर्मसिद्धान्त उस विचार के परोक्ष विपरीत है, जो यह कहता है कि ब्रह्माण्ड किसी संयोग या भाग्य के द्वारा नियंत्रित होता है।

ईश्‍वरीय विधान का लक्ष्य परमेश्‍वर की इच्छा को पूरा करना है। यह सुनिश्चित करना कि उसके उद्देश्य पूर्ण हो गए हैं, परमेश्‍वर मनुष्यों के कार्यों और बातों के ऊपर प्राकृतिक नियमों की व्यवस्था के द्वारा शासन करता है। प्रकृति की व्यवस्था कुछ और नहीं अपितु परमेश्‍वर का ब्रह्माण्ड में चल रहे कार्य का चित्रण है। प्रकृति की व्यवस्था की स्वयं में निहित कोई सामर्थ्य नहीं है, न ही वह स्वयं पर निर्भर हो कर कार्य करता है। प्रकृति की व्यवस्था वे नियम और सिद्धान्त हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने उस स्थान पर रख दिया जो यह देखें कि कैसे वस्तुएँ कार्य कर रही हैं।

ठीक ऐसा ही मनुष्य के द्वारा चुनाव करने के साथ भी होता है। एक सही वास्तविक भावार्थ में हम परमेश्‍वर की इच्छा से अलग होकर चुनाव या कार्य करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। जो कुछ हम करते हैं और जिन बातों का हम चुनाव करते हैं, वह सब कुछ परमेश्‍वर की पूर्ण इच्छा के अनुसार होता है — यहाँ तक कि हमारे पाप से भरे हुए निर्णय भी (उत्पत्ति 50:20) इसमें सम्मिलित हैं। नियंत्रण रेखा यह है कि वही हमारे निर्णयों और कार्यों को अपने नियंत्रण में रखता है (उत्पत्ति 45:5; व्यवस्थाविवरण 8:18; नीतिवचन 21:1), तथापि, वह इन्हें इस तरह से अपने नियंत्रण में रखता है कि यह हमारे स्वतन्त्र नैतिक प्राणी होने के दायित्व का उल्लंघन नहीं होता है, न ही यह हमारे निर्णयों की वास्तविकता को इन्कार करता है।

ईश्‍वरीय विधान के धर्मसिद्धान्त को संक्षेप में इस तह से सारांशित किया जा सकता है: "अतीत के अनन्तता में परमेश्‍वर, ने अपनी इच्छा की सम्मति में होते हुए, उन सभी बातों को ठहरा दिया, जो भविष्य में घटित होंगी; तथापि, किसी भी अर्थ में परमेश्‍वर पाप का लेखक नहीं है; न ही उसने मनुष्य के दायित्व को मिटाया है।" द्वितीय कारक वह मूल तरीका जिसके द्वारा वह अपनी इच्छा को पूरा करता है (उदाहरण के लिए., प्रकृति की व्यवस्था, मानवीय निर्णय)। दूसरे शब्दों में, परमेश्‍वर अपनी इच्छा को पूर्ण करने के लिए इन द्वितीय कारकों के द्वारा अपरोक्ष रीति से कार्य करता है।

परमेश्‍वर साथ ही कई बार परोक्ष रीति से अपनी इच्छा को पूर्ण करता है। ये वे कार्य हैं जिन्हें हम आश्चर्यकर्म कह कर पुकारते हैं (उदाहरण के लिए., प्रकृति के विरूद्ध अलौकिक घटनाओं का घटित होना)। एक आश्चर्यकर्म परमेश्‍वर की ओर से, थोड़े समय के लिए, उसकी इच्छा और उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रकृति की व्यवस्था में गतिरोध उत्पन्न करना होता है। प्रेरितों के काम की पुस्तक में दिए हुए उदाहरण उन मुख्य अंशों को प्रस्तुत करते हैं, जिनमें परमेश्‍वर परोक्ष और अपरोक्ष होते हुए अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए कार्य करता है। प्रेरितों के काम 9 में हम तरसुस के शाऊल के मन को परिवर्तित होते हुए देखते हैं। प्रकाश की अन्धा करने देने वाली चमक और एक आवाज को शाऊल/पौलुस ने सुना था, परमेश्‍वर ने उसके जीवन को सदैव के लिए परिवर्तित कर दिया था। यह परमेश्‍वर की इच्छा थी कि वह पौलुस को उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए उपयोग करे और परमेश्‍वर ने पौलुस को परिवर्तित करने के लिए परोक्ष तरीके का उपयोग किया। किसी भी उस व्यक्ति से बात करें जिसका मन परिवर्तन मसीह में हुआ है, और आप पाएँगे कि आपने ऐसी कहानी को कहीं और नहीं सुना है। हम में अधिकांश किसी एक सन्देश को सुनने या एक पुस्तक को पढ़ने या किसी एक मित्र या परिवार के सदस्य के द्वारा निरन्तर गवाही देते रहने के कारण मसीह के पास आए होंगे। इसके अतिरिक्त, जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं, जो इसके लिए मार्ग को तैयार कर देती हैं — जैसे नौकरी चली जाना, परिवार के किसी सदस्य का मर जाना, असफल विवाह, नशे की आदत इत्यादि। पौलुस का मन परिवर्तन सीधा ही अलौलिक रीति से हुआ था।

प्रेरितों के काम 16:6-10 में, हम देखते हैं कि परमेश्‍वर उसकी इच्छा को परोक्ष रीति से पूर्ण कर रहा है। यह पौलुस की द्वितीय मिशनरी यात्रा के मध्य में घटित होती है। परमेश्‍वर चाहता है कि पौलुस और उसके सहकर्मी त्रोआस में जाएँ, परन्तु पौलुस पिसीदिया के अन्ताकिया में चला जाता है, वह वहाँ से एशिया के पूर्व में जाना चाहता था। बाइबल कहती है कि पवित्र आत्मा ने उसे एशिया में वचन का प्रचार करने से मना कर दिया। तब वह वहाँ से पश्चिम में बितानिया जाना चाहता था, परन्तु मसीह के आत्मा ने उस मना कर दिया, इस तरह से वे त्रोआस में आ पहुँचे। यह बीती हुई बातों को स्मरण करते हुए लिखा गया था, परन्तु उस समय वहाँ पर कुछ तार्किक स्पष्टीकरण रहे होंगे कि वे इन दो क्षेत्रों में क्यों नहीं जा सके। तथापि, इस सच्चाई के पश्चात्, उन्होंने जान लिया कि यह परमेश्‍वर ही था, जो उन्हें मार्गदर्शन दे रहा था कि उन्हें कहाँ जाना चाहिए था — यही है ईश्‍वरीय विधान। नीतिवचन 16:9 इसके ऊपर इस रीति से बोलता है: "मनुष्य मन में अपने मार्ग पर विचार करता है, परन्तु यहोवा ही उसके पैरों को स्थिर करता है।"

दूसरी तरफ, ऐसे लोग भी हैं, जो यह कहते हैं कि यह धारणा, जिसमें परमेश्‍वर परोक्ष या अपरोक्ष सभी वस्तुओं को अपने नियंत्रण में लिए हुए है, स्वतंत्र इच्छा के होने की किसी भी सम्भावना को नष्ट कर देता है। यदि परमेश्‍वर का नियंत्रण सभी वस्तुओं के ऊपर है, तब हम कैसे हमारे द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों में सच्चाई में स्वतंत्र हो सकते हैं? दूसरे शब्दों में, यदि स्वतंत्र इच्छा को अर्थपूर्ण होना है, तो कुछ ऐसी बातें होनी चाहिए जो परमेश्‍वर की सर्वोच्चता के नियंत्रण से परे हो — उदाहरण के लिए., मनुष्य के द्वारा निर्णय लेने की आकस्मिकता का होना। आइए तर्क के लिए इस उदाहरण के ऊपर वार्तालाप करें कि यह सच्च है। तब आगे क्या होगा? यदि परमेश्‍वर सभी आकस्मिकताओं को अपने नियंत्रण में लिए हुए नहीं है, तब वह कैसे हमारे उद्धार की गारंटी दे सकता है? पौलुस फिलिप्पियों 1:6 में कहता है, "मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।" यदि परमेश्‍वर का नियंत्रण सभी वस्तुओं के ऊपर है, तब यह प्रतिज्ञा, और बाइबल की अन्य प्रतिज्ञाएँ, अवैध ठहरती हैं। हमारे पास ऐसी कोई पूर्ण सुरक्षा नहीं है कि उद्धार का अच्छा कार्य जो हम में आरम्भ हुआ अपनी पूर्णता तक पहुँचेगा।

इसके अतिरिक्त, यदि परमेश्‍वर का नियत्रंण सभी वस्तुओं के ऊपर नहीं है, तब तो वह सर्वोच्च नहीं है, तब तो वह परमेश्‍वर ही नहीं है। इस कारण, परमेश्‍वर के नियंत्रण के बाहर रहते हुए आकस्मिकता को बनाए रखने के मूल्य का परिणाम एक ऐसे परमेश्‍वर में निकलेगा जो बिल्कुल भी परमेश्‍वर नहीं है। और यदि हमारी स्वतंत्र इच्छा ईश्‍वरीय विधान का स्थान ले लेती है, तब अन्त में परमेश्‍वर कौन हुआ? हम ही हुए। स्पष्ट है, यह किसी भी मसीही और बाइबल आधारित दृष्टिकोण के लिए अस्वीकृत होगा। ईश्‍वरीय विधान हमारी स्वतंत्रता को नष्ट नहीं करता है। अपितु, इसकी अपेक्षा ईश्‍वरीय विधान वह है जो हमें उचित रीति से हमारी स्वतंत्रता को उपयोग करने के लिए सक्षम करता है।



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