विवाहार्थ मुलाकत और विवाहार्थ प्रणय निवेदन के मध्य में क्या अन्तर है?



प्रश्न: विवाहार्थ मुलाकत और विवाहार्थ प्रणय निवेदन के मध्य में क्या अन्तर है?

उत्तर:
डेटिंग अर्थात् विवाहार्थ मुलाकात करना और कोर्टशिप अर्थात् विवाहार्थ प्रणय निवेदन विपरीत लिंग के साथ सम्बन्ध आरम्भ करने के दो तरीके हैं। जबकि ऐसे अविश्‍वासी पाए जाते हैं, जो अंतरंग शारीरिक सम्बन्धों की एक श्रृंखला के होने की मनोवृत्ति के साथ डेटिंग अर्थात् विवाहार्थ मुलाकात करते हैं, मसीही विश्‍वासियों के लिए यह स्वीकार्य नहीं है और कभी भी यह डेटिंग अर्थात् विवाहार्थ मुलाकात करना नहीं होनी चाहिए। अधिकांश मसीही विश्‍वासी विवाहार्थ की जाने वाली मुलाकात को मित्रता से कुछ ज्यादा देखते हैं और वे विवाहार्थ की जाने वाली मुलाकातों के पहलू को तब तक बनाए रखते हैं, जब तक कि विवाह में एक होने वाले दोनों पक्ष एक दूसरे के सम्भावित विवाह के प्रति समर्पण के लिए तैयार नहीं हो जाते हैं। सबसे पहली बात, विवाहार्थ की जाने वाली मुलाकात एक ऐसा समय होता है, जब एक मसीही विश्‍वासी पता लगाता है कि क्या विवाह में एक होने वाला उसका सम्भावित साथी भी मसीह का एक विश्‍वासी है या नहीं। बाइबल हमें चेतावनी देती है कि मसीही विश्‍वासियों को अविश्‍वासियों के साथ विवाह में एक नहीं होना चाहिए, क्योंकि जो (मसीह की) ज्योति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं और जो अन्धकार में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, वैवाहिक सद्भाव में एक साथ जीवन व्यतीत नहीं कर सकते हैं (2 कुरिन्थियों 6:14-15)। जैसा कि पहले कह दिया गया है, इस समय में बिल्कुल कम या किसी भी तरह का शारीरिक सम्बन्ध नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह कुछ ऐसी बात है, जिसकी प्रतीक्षा विवाह होने तक की जानी चाहिए (1 कुरिन्थियों 6:18-20)।

कोर्टशिप अर्थात् विवाहार्थ किए जाने वाले प्रणय निवेदन में बिल्कुल भी किसी तरह का शारीरिक सम्बन्ध विवाह होने तक नहीं होना चाहिए (कोई स्पर्श नहीं, कोई हाथ-को-मिला कर चलना नहीं, कोई चुम्बन लेना नहीं)। बहुत से लोग विवाहार्थ किए जाने वाले प्रणय निवेदन वाले सम्बन्ध में एक साथ तब तक समय व्यतीत नहीं करते जब तक कि उनके परिवार के अन्य सदस्य, मुख्य रूप से अभिभावकों का होना, सभी समय उनके साथ उपस्थित नहीं होते हैं। इसके अतिरिक्त, विवाहार्थ प्रणय निवेदन के समय, विवाह करने वाला जोड़ा अपनी मंशा को बिल्कुल स्पष्ट बता देता है कि उनका एक दूसरे के साथ मुलाकात करना यह देखना है कि दूसरा साथी एक उपयुक्त विवाह का साथी है या नहीं। विवाहार्थ प्रणय निवदेन की वकालत करने वालों का दावा है कि विवाहार्थ प्रणय निवेदन दो व्यक्तियों की शारीरिक अंतरंगता या भावनाओं के ऊपर दबाव दिए बिना एक आदर्शवादी ढांचे में वास्तव में एक-दूसरे को जानने का अवसर प्रदान करती है।

दोनों ही तरीकों में निहित समस्याएँ पाई जाती हैं। विवाहार्थ मुलाकात करने वाले विपरीत लिंगी के साथ अकेले में समय बिताते हैं, जो उसे आकर्षक लगता है, वही उसके सामने ऐसी परीक्षा को प्रस्तुत कर सकता है, जिसका विरोध करने में बहुत अधिक कठिनाई हो सकती हैं। विवाहार्थ मुलाकात करने वाले मसीही जोड़ों को अपनी सीमाओं में ही रहना चाहिए और उन्हें इसे न पार करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। यदि वे ऐसे करने में कठिनाई को पाते हैं, तब उन्हें यह सुनिश्चित करते हुए कदम उठाने चाहिए कि मसीह को ही सदैव उनके द्वारा व्यतीत किए हुए समय के द्वारा सम्मान पाना है और यह कि उनके सम्बन्धों को अपने नियन्त्रण में ले लेने के लिए पाप को कभी भी स्थान नहीं मिलना चाहिए। ठीक वैसे ही विवाहार्थ प्रणय निवेदन करने वाले जोड़े के साथ होता है, विवाहार्थ प्रणय निवेदन करने वाले जोड़े के अभिभावकों के उनके सम्बन्ध में सम्मिलित होते हुए, उनकी सन्तान के साथी की जानकारी का पता लगाना चाहिए और उनके दोनों के लिए बुद्धि और समझ से भरे हुए परामर्श का स्रोत बन जाना चाहिए।

विवाहार्थ किए जाने वाले प्रणय निवेदन वाला तरीका अपनी ही परेशानियों को प्रस्तुत करता है। जबकि विवाहार्थ किए जाने वाले प्रणय निवेदन की मुलाकात की वकालत करने वाले इसे एक जीवन साथी पाने वाले तरीके के रूप में देखते हैं, अन्य इस तरीके को दमनकारी और अत्यधिक नियन्त्रित वाले मानते हैं। इसके अतिरिक्त, पूरे परिवार के सामने सार्वजनिक चेहरे के पीछे "वास्तविक" व्यक्ति को ढूंढ पाना कठिन हो सकता है। एक समूह के ढांचे में कोई भी एक जैसा नहीं होता है, क्योंकि उनके पास कभी एक-के-साथ-एक के सम्बन्ध वाले अवसर नहीं रहे होते हैं, उन्होंने कभी भी भावनात्मक और आध्यात्मिक अंतरंगता में एक-दूसरे को नहीं जान पाए हैं और न ही उन्हें एक दूसरे को जानने के अवसर मिले हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ प्रणय निवेदनों की परिस्थितियाँ अभिभावकों के द्वारा "निर्धारित कर दिए जाने वाले विवाह" की सीमा रेखा तक पहुँच जाते हैं और जिसके परिणामस्वरूप एक या दोनों ही युवा साथी रोष में आ जाते हैं।

यह स्मरण रखना अति महत्वपूर्ण है कि पवित्रशास्त्र में न तो डेटिंग अर्थात् विवाहार्थ मुलाकातें करने और न ही कोर्टशिप अर्थात् विवाहार्थ प्रणय निवेदन वाली मुलाकातों को अनिवार्य किया गया है। अन्त में, मसीही चरित्र और जोड़े की आत्मिक परिपक्वता ही उन बातों से कहीं अधिक बढ़कर महत्व रखती है कि वे किस तरह और कैसे समय को एक दूसरे के साथ व्यतीत करते हैं। पवित्रशास्त्र आधारित हो बोलना, इस प्रक्रिया का परिणाम — भक्त मसीही पुरूष और स्त्रियाँ एक दूसरे को विवाह करें और परमेश्‍वर की महिमा के लिए परिवारों का पालन पोषण करें में निकलना चाहिए — उस तरीके से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, जिसका वे इस परिणाम को प्राप्त करने के लिए उपयोग करते हैं। "इसलिये तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्‍वर की महिमा के लिये करो" (1 कुरिन्थियों 10:31, बी.एस.आई. हिन्दी बाइबल)।

अन्त में, हमें किसी की भी व्यक्तिगत् प्राथमिकता के प्रति सावधान रहना चाहिए कि — डेटिंग अर्थात् विवाह के लिए मुलाकातें करना या कोर्टशिप अर्थात् विवाह के लिए प्रणय निवेदन वाली मुलाकातें ही "एकमात्र मार्ग है" और उनका उपयोग करने द्वारा ही विपरीत लिंगी के चुनाव को किया जा सकता है। जैसा कि 'सभी बातों' के विषय में बाइबल चुप है, चाहे दूसरा व्यक्ति अपने लिए किसी भी तरह का व्यक्तिगत् निर्णय ही क्यों न ले, मसीह की देह की एकता का ही हमारे मनों में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान होना चाहिए।

English




हिन्दी के मुख्य पृष्ठ पर वापस जाइए



विवाहार्थ मुलाकत और विवाहार्थ प्रणय निवेदन के मध्य में क्या अन्तर है?