क्या इब्लीस/शैतान एक व्यक्ति या एक शक्ति या बुराई का अवतार है?



प्रश्न: क्या इब्लीस/शैतान एक व्यक्ति या एक शक्ति या बुराई का अवतार है?

उत्तर:
यद्यपि, उसने बहुत से लोगों को यह समझा दिया है कि वह अस्तित्व में ही नहीं है, तथापि, शैतान वास्तव में एक वास्तविक, व्यक्तिगत् प्राणी, सभी अविश्‍वास का स्रोत और संसार में हर प्रकार की नैतिक और आत्मिक बुराई है। उसे बाइबल में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, जिसमें शैतान (अर्थ "विरोधी शत्रु" — अय्यूब 1:6; रोमियों 16:20), इब्लीस (अर्थात्, "दोष लगाने वाला"— मत्ती 4:1; 1 पतरस 5:8), लूसीफर (यशायाह 14:12), सर्प (2 कुरिन्थियों 11:3; प्रकाशितवाक्य 12:9), और कई अन्य नामों से पुकारा गया है।

शैतान का एक व्यक्तिगत् प्राणी के रूप में अस्तित्व में होना इस तथ्य से प्रमाणित हो जाता है कि प्रभु यीशु मसीह उसे ऐसे ही पहचाना था। यीशु ने उसे निरन्तर उसका नाम लेकर उद्धृत किया है (उदाहरण के लिए लूका 10:18; मत्ती 4:10) और उसे इस "संसार का राजकुमार" कह कर पुकारा है (यूहन्ना 12:31; 14:30; 16:11)।

प्रेरित पौलुस शैतान को इस "संसार का ईश्‍वर" (2 कुरिन्थियों 4:4) और "आकाश के अधिकार का हाकिम" (इफिसियों 2:2) कह कर पुकारता है। प्रेरित यूहन्ना ने कहा है, "सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है" (1 यूहन्ना 5:19) और यह कि शैतान "सारे संसार को भरमाने वाला है" (प्रकाशितवाक्य 12:9)। यह कदाचित् ही एक अवैयक्तिक शक्ति या बुराई के व्यक्तित्व का ही एक मात्र विवरण हो सकता है।

पवित्र शास्त्र शिक्षा देता है कि मनुष्य और इस संसार की रचना से पहले, परमेश्‍वर ने "लाखों स्वर्गदूतों" (इब्रानियों 12:22), बुद्धि और बड़ी सामर्थ्य से भरे हुए आत्मिक प्राणियों से भरी हुई एक स्वर्गीय सभा की रचना थी। इन सभी प्राणियों में सबसे उच्च करूब थे, जो परमेश्‍वर के सिंहासन के सन्मुख रहा करते थे और इनमें एक छाने वाला "अभिषिक्त करूब" वास्वत में स्वयं शैतान था (यहेजकेल 28:14)। वह "बुद्धि से भरपूर और सर्वांग सुन्दर" था।

परमेश्‍वर ने शैतान की रचना एक बुरे प्राणी के रूप में नहीं की थी। मनुष्य की तरह, स्वर्गदूतों को भी, न सोचने वाले यन्त्रों की अपेक्षा स्वतन्त्र आत्माओं की तरह ही रचा गया था । वे परमेश्‍वर की इच्छा को इन्कार करने और यदि वे चाहते तो उसके अधिकार के विरूद्ध विद्रोह करने के लिए पूर्ण रीति से सक्षम थे।

मनुष्य और स्वर्गदूत दोनों में ही मूल पाप अविश्‍वास और घमण्ड का जुड़वा पाप है। शैतान ने अपने मन में कहा, "मैं स्वर्ग पर चढूँगा, मैं अपने सिंहासन को ईश्‍वर के तारागण से अधिक ऊँचा करूँगा...मैं परम प्रधान के तुल्य हो जाऊँगा" (यशायाह 14:13,14)। एक बार फिर से, यह कदाचित् ही एक अवैयक्तिक शक्ति की गतिविधि या प्रेरणा हो सकती है।

यीशु ने भी शैतान के चरित्र के कुछ गुणों को हमें बताया है। मसीह ने कहा है कि वह आरम्भ से ही एक हत्यारा है, जिसमें किसी तरह का कोई सत्य नहीं है, क्योंकि उसमें कोई सत्य है ही नहीं और जब वह बोलता है तो वह झूठ ही बोलता है, वह अपनी भाषा बोलता है, क्योंकि वह झूठा है और झूठ का पिता है (यूहन्ना 8:44)।

मसीही विश्‍वासियों को शैतान की वास्तविकता को समझना महत्वपूर्ण बात है और यह समझना कि वह गर्जनेवाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किस को फाड़ खाए (1 पतरस 5:8)। अपने स्वयं की सामर्थ्य से इब्लीस के द्वारा आने वाली परीक्षा और पाप के ऊपर जय पाना असम्भव है, परन्तु पवित्र शास्त्र हमें बताता है कि वह कितना अधिक शक्तिशाली है। हमें परमेश्‍वर के सारे हथियारों को बाँध लेना चाहिए और परीक्षा में खड़े रहना चाहिए (इफिसियों 6:13)।

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