विवाह की परिभाषा क्या है?


प्रश्न: विवाह की परिभाषा क्या है?

उत्तर:
पूरे संसार में, कम से कम सत्रह राष्ट्रों ने समान अर्थात् एक ही जैसे-लिंग वाले साथियों के बीच विवाह को वैध बना दिया है। स्पष्ट है कि विवाह की सामाजिक परिभाषा बदल रही है। परन्तु क्या सरकार के पास अधिकार है कि वह विवाह को फिर से परिभाषित करे, या क्या विवाह की परिभाषा पहले से ही किसी एक उच्च अधिकारी के द्वारा निर्धारित की गई है?

उत्पत्ति अध्याय 2 में, परमेश्‍वर ने घोषणा की है कि आदम (पहले व्यक्ति) के लिए अकेला रहना अच्छा नहीं है। सभी जानवर वहाँ थे, परन्तु उनमें से कोई भी आदम के लिए उपयुक्त साथी नहीं था। इसलिए, सृष्टि के एक विशेष कार्य के रूप में परमेश्‍वर एक स्त्री को रचता है। कुछ वचनों के पश्‍चात्, स्त्री को "उसकी पत्नी" कहा जाता है (उत्पत्ति 2:25)। अदन की वाटिका पहले विवाह का दृश्य प्रस्तुत करती है, जिसे स्वयं परमेश्‍वर ने नियुक्त किया था। उत्पत्ति का लेखक तब उस मापदण्ड को लिपिबद्ध करता है, जिसके द्वारा सभी भावी विवाहों को परिभाषित किया जाता है: "इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे एक ही तन बने रहेंगे" (उत्पत्ति 2:24)।

पवित्रशास्त्र का यह सन्दर्भ विवाह के लिए परमेश्‍वर की रूपरेखा को समझने के लिए कई मुख्य बातों को वर्णित करता है। सबसे पहले, विवाह में एक पुरूष और एक स्त्री सम्मिलित होते हैं। "पत्नी" के लिए इब्रानी शब्द लिंग-विशेष है; इसका अर्थ "एक स्त्री" के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हो सकता है। पवित्रशास्त्र में कोई भी सन्दर्भ ऐसा नहीं है, जिसमें एक पुरुष और एक स्त्री के अतिरिक्त किसी अन्य से विवाह का उल्लेख किया गया है। विपरीत लिंगी जोड़े के बिना परिवार को निर्मित करना या मानवीय प्रजनन को पूरा करना असम्भव है। चूंकि परमेश्‍वर ने विवाहित जोड़े के बीच में ही केवल यौन सम्बन्ध को बनाए रखने का आदेश दिया है, इसलिए यह इस प्रकार से है कि परमेश्‍वर की रूपरेखा ही परिवार की इकाई को तब बनाती है, जब एक पुरुष और स्त्री यौन सम्बन्ध में एक साथ आते है और बच्चों को उत्पन्न करते हैं।

विवाह के लिए परमेश्‍वर की रूपरेखा के बारे में उत्पत्ति 2 का दूसरा सिद्धान्त यह है कि विवाह का उद्देश्य पूरे जीवन के लिए है। वचन 24 कहता है कि दोनों "एक ही तन" हो जाते हैं। हव्वा को आदम की पसली में से लिया गया था, और इसलिए वह शाब्दिक रूप से आदम का ही शरीर थी। उसका सार भूमि की मिट्टी की अपेक्षा आदम से बना था। इसके बाद प्रत्येक विवाह का उद्देश्य आदम और हव्वा के द्वारा साझा की गई इसी एकता को प्रतिबिम्बित करना है। क्योंकि उनका बन्धन "एक शरीर" में था, इसलिए वे सदैव के लिए एक साथ थे। पहले विवाह में विवाह से बचने वाला कोई भी वाक्यांश नहीं मिलता था, जो दोनों को अलग होने की अनुमति देता था। ऐसा कहने का यह अर्थ हुआ कि परमेश्‍वर ने पूरे जीवन के लिए विवाह को तैयार किया है। जब एक पुरूष और एक स्त्री विवाह करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं, तो वे "एक ही तन, हो जाते हैं" जो मृत्यु के आने तक एक दूसरे से घनिष्ठता के साथ जुड़ा हुआ है।

विवाह के लिए परमेश्‍वर की रूपरेखा के बारे में इस सन्दर्भ से तीसरा सिद्धान्त एकता का है। "पति" और "पत्नी" के लिए इब्रानी शब्द एकवचन हैं और कई पत्नियों की होने की अनुमति नहीं देते हैं। चाहे पवित्रशास्त्र में कुछ लोगों के पास कई पत्नियाँ थीं, परन्तु तौभी सृष्टि के विवरण से यह स्पष्ट है कि विवाह के लिए परमेश्‍वर की रूपरेखा एक पुरूष और एक स्त्री के होने की थी। यीशु ने इस सिद्धान्त पर जोर दिया जब उसने उत्पत्ति के विवरण का उपयोग किया, जो कि आसानी से तलाक लिए जाने के विचार का सामना करना था (मत्ती 19:4-6)।

यह आश्‍चर्य की बात नहीं है कि संसार, जो कुछ भी स्थापित किया है, उसे बदलना चाहता है। "शरीर पर मन लगाना तो परमेश्‍वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्‍वर की व्यवस्था के अधीन है और न हो सकता है" (रोमियों 8:7)। यद्यपि संसार कहने के लिए "विवाह" के प्रति अपनी परिभाषाएँ प्रदान करने का प्रयास कर रहा है, तौभी बाइबल अभी भी इसकी परिभाषा को थामे हुए है। विवाह की स्पष्ट परिभाषा एक पुरूष और एक स्त्री की पूरे जीवन के लिए एकता है।

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