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प्रश्न

मृत्यु के बारे में बाइबल क्या कहती है?

उत्तर


बाइबल मृत्यु को पृथक होने के रूप में प्रस्तुत करती है : शारीरिक मृत्यु शरीर से प्राण का पृथक होना है, और आत्मिक मृत्यु परमेश्‍वर से आत्मा का पृथक होना है।

मृत्यु पाप का परिणाम है। "क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है," रोमियों 6:23अ। पूरा संसार मृत्यु के अधीन इसलिए है, क्योंकि सभी ने पाप किया है। "इसलिए जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई और इस रीति से मृत्यु सभी मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया" (रोमियों 5:12)। उत्पत्ति 2:17 में, प्रभु यहोवा ने आदम को अनाज्ञाकारिता के लिए दण्ड स्वरूप मृत्यु दिए जाने की चेतावनी दी थी — "तू निश्चय ही मर जाएगा।" जब आदम ने आज्ञा की अवहेलना की, तब उसने तत्काल ही आत्मिक मृत्यु का अनुभव किया, जिसके परिणामस्वरूप वह "वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए" (उत्पत्ति 3:8)। तत्पश्चात्, आदम ने शारीरित मृत्यु का अनुभव किया (उत्पत्ति 5:5)।

क्रूस के ऊपर, यीशु ने भी शारीरिक मृत्यु का अनुभव किया था (मत्ती 27:50)। भिन्नता केवल यह है कि आदम इसलिए मर गया क्योंकि वह एक पापी था, और यीशु, जिसने कभी पाप नहीं किया था, पापियों के स्थान पर विकल्प के रूप में मरने के लिए चुनता है (इब्रानियों 2:9)। यीशु ने तब मृत्यु और पाप के ऊपर मृतकों में से तीसरे दिन के पश्चात् जीवित हो उठने के द्वारा अपनी सामर्थ्य को प्रगट किया (मत्ती 28; प्रकाशितवाक्य 1:18)। मसीह के कारण, मृत्यु एक पराजित शत्रु है। "हे मृत्यु, तेरी जय कहाँ रही? हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ रहा?" (1 कुरिन्थियों 15:55; होशे 13:14)।

उद्धारहीन लोगों के लिए, मृत्यु परमेश्‍वर के द्वारा अपने अनुग्रहपूर्ण उद्धार के प्रस्ताव को स्वीकार करने के अवसर का अन्त ले आती है। "और जैसा मनुष्यों के लिये एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है" (इब्रानियों 9:27)। उद्धार पाए हुओं के लिए, मृत्यु मसीह की उपस्थिति में पाए जाने के आश्‍वासन को प्रदान करती है: "देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं" (2 कुरिन्थियों 5:8; फिलिप्पियों 1:23)। विश्‍वासियों के पुनरुत्थान की दी हुई प्रतिज्ञा इतनी अधिक वास्तविक है कि एक मसीही विश्‍वासी की शारीरिक मृत्यु "सोया" हुआ होना कह कर पुकारा गया है (1 कुरिन्थियों 15:51; 1 थिस्सलुनीकियों 5:10)। हम उस समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब "आगे को और अधिक मृत्यु न होगी" (प्रकाशितवाक्य 21:4)।

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