एक मसीही अभिभावक को अपने बच्चे की मृत्यु से हुई रिक्तता का निपटारा कैसे करना चाहिए?


प्रश्न: एक मसीही अभिभावक को अपने बच्चे की मृत्यु से हुई रिक्तता का निपटारा कैसे करना चाहिए?

उत्तर:
माता-पिता होने के नाते, हम किसी बच्चे को खोने से अधिक पीड़ादायी अनुभव की कल्पना नहीं कर सकते हैं। सभी माता-पिता स्वाभाविक रूप से यही अपेक्षा करते हैं कि उनके बच्चों उनती तुलना में अधिक समय तक जीवित रहें। इस तरह की हानि एक असाधारण घटना होती है, जो अपने साथ न समाप्त होने वाली पीड़ा और बने रहने वाले दु:ख की ओर झुकाव की भावना को लेकर आती है। यह एक जीवन-परिवर्तन अनुभव है, जो माता-पिता के सामने विशेष तरह की चुनौतियों को प्रस्तुत करता है, जब वे अपने बच्चे के बिना अपने जीवन को पुनर्निर्मित करते हुए व्यतीत करना चाहते हैं।

यह किसी के लिए अनादर की बात होगी कि अभिभावकों को यह बताएँ कि वे कैसे बच्चे की मृत्यु से होने वाले रिक्तता को संभाल सकते हैं। यद्यपि, हम जानते हैं कि जो लोग अपने जीवन को परमेश्‍वर के अधीन करते हुए यापन करते हैं, वे उन लोगों की अपेक्षा अधिक शीघ्रता के साथ हुई हानि से सामान्य अवस्था की एक बहुत बड़ी मात्रा के साथ बाहर निकल जाते हैं, जिनके पास हमारे निर्माता में वास्तविक और सकारात्मक विश्‍वास की कमी है। इस तरह, अब कैसे मसीही अभिभावक अपने बच्चे की मृत्यु से हुई रिक्तता का निपटारा करते है? क्या बाइबल इस विषय को सम्बोधित करती है, यदि हाँ, तो यह किस तरह से करती है?

सबसे पहले, हमें ध्यान देना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपने दुःख को भिन्न तरीके से सम्भालता है। भावनाएँ अपनी तीव्रता में व्यापक रूप से भिन्न होती हैं। ये भावनाएँ सामान्य और स्वाभाविक होती हैं। दूसरा, कोई भी माता-पिता कभी भी एक बच्चे की मृत्यु से हुई क्षति से पूरी तरह चंगा नहीं होता है। यह ऐसी बीमारी की तरह नहीं है, जिससे कि हम चंगे हो जाते हैं। अधिकांश परामर्शदाताओं ने इसे शारीरिक रूप से जीवन-में-होने वाले परिवर्तन के द्वारा आने वाले ठेसों से तुलना की। यद्यपि, हमें यह भी जानना चाहिए कि भले ही हम सदैव क्षति को महसूस कर सकते हैं, तथापि, इसकी तीव्रता समय के साथ कम होती है।

यह एक प्रेमी और सदा-विश्‍वासयोग्य रहने वाले परमेश्‍वर में विश्‍वास करने में है, जो हमें एक बच्चे की मृत्यु से होने वाली क्षति को सहन करने और चंगा होने में सक्षम बनाता है, कभी-कभी ऐसे तरीकों से जो कि दूसरों को उल्लेखनीय लगते हैं। दाऊद की भी घटना कुछ ऐसी ही थी, जब उसके बच्चे की मृत्यु हुई थी, जो जन्म के सात दिन बाद मर गया था (2 शमूएल 12:18-19)।. ऐसी कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ हैं, जिन्हें हम पवित्रशास्त्र के इस सन्दर्भ से प्राप्त कर सकते हैं, जिनसे हमें दु:खी माता-पिता की सहायता आशा से भरे हुए भविष्य का सामना करने के लिए कर सकते हैं।

यह कि दाऊद ने अपने बच्चे के बच जाने के लिए बड़े उत्साह से प्रार्थना की (2 शमूएल 12:16)। यह सभी अभिभावकों के साथ न केवल कठिन समय में अपितु प्रत्येक समय सत्य होना चाहिए। अभिभावकों को सदैव अपने बच्चों के लिए परमेश्‍वर से यह कहते हुए प्रार्थना करनी चाहिए कि वह उनके ऊपर अपनी दृष्टि बनाएँ रखें और उन्हें सुरक्षा प्रदान करें। इसी तरह से अभिभावकों को यह प्रार्थना भी करनी चाहिए कि परमेश्‍वर उन्हें ईश्‍वरीय ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करे, ताकि हमारे बच्चे प्रभु के मार्गदर्शन में रहते हुए पालन-पोषित होते हुए वृद्धि करें (न्यायियों 13:12; नीतिवचन 22:6; इफिसियों 6:4)।

हम एक और शिक्षा को दाऊद से सीखते हैं, यह उसके बच्चे की मृत्यु उपरान्त उसकी प्रतिक्रिया थी, उसकी गतिविधियों में शिशु की मृत्यु को स्वीकार किए जाने की शिक्षा पाई जाती है, जब वह "भूमि पर से उठा, और नहाकर तेल लगाया, और वस्त्र बदला; तब यहोवा के भवन में जाकर दण्डवत् की; फिर अपने भवन में आया; और उसकी आज्ञा पर रोटी परोसी गई, और उसने भोजन किया" (2 शमूएल 12:20)। इस सन्दर्भ में जो बात आश्चर्य में डाल देती है, वह यह है कि दाऊद "यहोवा के भवन में जाकर दण्डवत् करता है।" दूसरे शब्दों में, दाऊद न केवल शिशु की मृत्य को स्वीकार कर लिया, अपितु उसने इस विषय को परमेश्‍वर के सामने आराधना में रख दिया। परीक्षा या संकट के समय परमेश्‍वर की आराधना और सम्मान करने की क्षमता हमारे द्वारा परमेश्‍वर के ऊपर अपने आत्मविश्‍वास का एक शक्तिशाली प्रदर्शन होता है। ऐसा करने से हम अपनी क्षति की वास्तविकता को स्वीकार कर सकते हैं। और इस तरह परमेश्‍वर हमें जीवित रहने के लिए मुक्त कर देता है।

अगली शिक्षा तो और अधिक प्रकाश डालने वाली है। यह इस ज्ञान में भरोसा है कि दायित्व की आयु तक पहुँचने से पहले मरने वाले बच्चों को स्वर्ग जाना है। अपने बच्चे की मृत्यु के प्रति प्रतिक्रिया पर प्रश्‍न करते हुए दाऊद की प्रतिक्रिया सदैव अभिभावकों के लिए एक महान स्रोत रहेगी, जो शिशुओं और छोटे बच्चों को खो चुके हैं: "परन्तु अब वह मर गया है, फिर मैं उपवास क्या करूँ? क्या मैं उसे लौटा ला सकता हूँ? मैं तो उसके पास जाऊँगा, परन्तु वह मेरे पास लौट कर नहीं आएगा" (2 शमूएल 12:23)। दाऊद पूरी तरह से आश्‍वस्त था कि वह स्वर्ग में अपने पुत्र से मिलेगा। यह सन्दर्भ एक शक्तिशाली संकेत है कि इस संसार से जाने वाले छोटे बच्चे स्वर्ग में ही जाएँगे।

एक बच्चे की मृत्यु को लेकर शोकित होना एक मर्मभेदी यात्रा होती है। अपने शोक से कैसे निपटाना है, इसके लिए हमें सिखाने के लिए कोई निर्धारित दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं। यद्यपि, परामर्शदाताओं और बच्चों की मृत्यु से हुई क्षति का अनुभव करने वालों ने कुछ उपयोगी परामर्श दिए हैं:

• इस बात को जान लें कि आप अकेले नहीं हैं। आपके पास परमेश्‍वर है। आपके पास मसीह में आपके भाई-बहन हैं। आपके पास निकट मित्र और परिवार हैं। उन की ओर मुड़ जाएँ। वे आपकी सहायता के लिए ही दिए हैं।

• अपने चंगा होने को समय की सीमा में डालें। अपने बच्चे के बारे में सोचे बिना एक भी दिन को व्यतीत हो जाने की आशा न करें, न ही आपको ऐसा करना चाहिए।

• आपने बच्चे के बाते में बात करें। दूसरों के साथ अपने बच्चे की कहानी को साझा करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

• अपने और अपने दूसरे बच्चों की देखभाल करें। वे भी पीड़ित हैं। वे एक भाई या बहिन की मृत्यु से होने वाली क्षति के प्रति शोकित करते हैं और अपने अभिभावकों को शोक में देखने के कारण अतिरिक्त परेशानी होते हैं।

• कम से कम घटना के घटित होने के पहले वर्ष में कोई मुख्य निर्णय लेने का प्रयास न करें।

• अपेक्षा करें कि एक युवा बच्चे की मृत्यु के पश्चात् कई "प्रथम" बातों में से निकल जाना जैसे — पहला जन्मदिन, पहली क्रिसमस, इत्यादि — पीड़ादायी ही होगा।

और अन्त में, मसीही विश्‍वासी जिन्होंने अपने बच्चे की मृत्यु को देखा है, के पास परमेश्‍वर के वचन से एक भव्य और विश्‍वासयोग्य प्रतिज्ञा दी गई है: "वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं" (प्रकाशितवाक्य 21:4)।

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