काँटों के मुकुट का अर्थ और महत्व क्या है?


प्रश्न: काँटों के मुकुट का अर्थ और महत्व क्या है?

उत्तर:
यीशु की झूठी जाँच और इसके पश्‍चात् कोड़ों से मारना और रोमी सैनिकों के द्वारा क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले सैनिकों ने, "काँटों का मुकुट गूँथकर उसके सिर पर रखा, और उसके दाहिने हाथ में सरकण्डा दिया और उसके आगे घुटने टेककर उसे ठट्ठों में उड़ाने लगे और कहा, 'हे यहूदियों के राजा, नमस्कार! उन्होंने कहा'" (मत्ती 27:29; यूहन्ना 19:2-5 को भी देखें)। जबकि काँटों का मुकुट अत्यधिक पीड़ादायी रहा होगा, काँटों के मुकुट से होने वाली पीड़ा की अपेक्षा ठट्ठा किया जाना कहीं अधिक पीड़ादायी था। यहाँ "यहूदियों के राजा" को सबसे निम्न स्तर के रोमी सैनिकों के द्वारा पीटा गया था, उस पर थूका गया था और उसका अपमान किया गया था। काँटों का मुकुट उनके ठट्ठों की चरम सीमा थी, जो उसके राजकीय और महिमामयी होने का प्रतीक था, और इस सब कुछ को पीड़ा और और अपमान में परिवर्तित किया जा रहा था।

मसीही विश्‍वासियों के लिए, काँटे का मुकुट दो बातों को स्मरण दिलाता है: (1) यीशु वास्तव में एक राजा था, और है। एक दिन, पूरा ब्रह्माण्ड यीशु के सामने राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु के रूप में झुक जाएगा (प्रकाशितवाक्य 19:16)। रोमी सैनिकों ने जिस बात को ठट्ठों के रूप में लिया उसका अर्थ यह था कि वास्तव में मसीह की भूमिकाओं के दो चित्र, सबसे पहला एक दु:खी दास का चित्र (यशायाह 53), और दूसरा मसीह-राजा (प्रकाशितवाक्य 19) का जय पाया हुआ चित्र इस समय एक साथ इकट्ठे थे। (2) यीशु हमारे स्थान पर पीड़ा, अपमान और शर्मिंदगी को सहन करने के लिए तैयार था। काँटों का मुकुट और उसके साथ होने वाली पीड़ा बहुत पहले ही समाप्त हो गई है और यीशु को अब वह मुकुट मिला है, जिसके वह योग्य है। "पर हम यीशु को जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, मृत्यु का दुःख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहने हुए देखते हैं; ताकि परमेश्‍वर के अनुग्रह से वह हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे" (इब्रानियों 2:9, अतिरिक्त बल जोड़ा गया है)।

काँटों के मुकुट में और अधिक प्रतीकात्मकता बातें पाई जाती हैं। जब आदम और हव्वा ने पाप किया, तो संसार में बुराई और शाप आ गया, मनुष्य स्त्राप का भागी हो गया "…इसलिए भूमि तेरे कारण श्रापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दुःख के साथ खाया करेगा; और वह तेरे लिये काँटे और ऊँटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा..." (उत्पत्ति 3:17-18, अतिरिक्त बल जोड़ा गया है)। रोमी सैनिकों ने अनजाने में ही स्त्राप की वस्तु को उठा लिया था और इसे उस व्यक्ति के ऊपर मुकुट के रूप में पहना दिया जो हमें स्त्राप से छुटकारा देने वाला था। "मसीह ने जो हमारे लिये श्रापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के स्त्राप से छुड़ाया क्योंकि लिखा है, 'जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है'" (गलातियों 3:13)। मसीह ने अपने प्रायश्‍चित्त के सिद्ध बलिदान में हमें पाप के अभिशाप से बचाया है, जिसमें काँटा एक प्रतीक है। ठट्ठा किए जाने की मंशा को रखते हुए, काँटों का मुकुट वास्तव में एक उत्कृष्ट प्रतीक था कि यीशु कौन है और वह क्या करने के लिए आया था।

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