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प्रश्न

क्या यीशु पाप कर सकता था?

उत्तर


इस दिलचस्प प्रश्‍न के दो पहलू हैं। स्मरण रखने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि प्रश्‍न यह नहीं है कि यीशु पाप कर सकता था या नहीं। दोनों ही पहलू सहमत हैं, जैसा कि बाइबल स्पष्टता से कहती है, कि यीशु ने पाप नहीं किया (2 कुरिन्थियों 5:21; 1 पतरस 2:22)। प्रश्‍न यहाँ पर यह है कि क्या यीशु पाप कर सकता था। वे लोग जो यीशु के "पापहीन" होने की धारणा को मानते हैं, वह विश्‍वास करते हैं कि यीशु पाप नहीं कर सकता था। जो लोग यीशु के "पापाधीन" होने की धारणा को मानते हैं, वह यह मानते हैं कि यीशु पाप कर सकता था, परन्तु उसने नहीं किया। कौन सा दृष्टिकोण सही है? पवित्रशास्त्र की स्पष्ट शिक्षा यह है कि यीशु पापहीन था - यीशु पाप नहीं कर सकता था। यदि वह पाप कर सकता था, तो वह आज भी पाप करने के लिए सक्षम है क्योंकि उसमें अभी भी वही तत्व है जो उसमें तब था जब वह इस पृथ्वी पर था। वह परमेश्‍वर-मनुष्य है और वह सदा पूर्ण ईश्‍वरत्व और पूर्ण मनुष्यत्व के साथ ऐसा ही रहेगा क्योंकि यह दोनों तत्व एक ही व्यक्ति में अविभाज्य रूप से एक हैं। यह विश्‍वास करना कि यीशु पाप कर सकता है का अर्थ यह विश्‍वास करना है कि परमेश्‍वर पाप कर सकता है। "क्योंकि पिता की प्रसन्नता इसी में है कि उसमें सारी परिपूर्णता वास करे।" (कुलुस्सियों 1:19)। कुलुस्लियों 2:9 इसमें जोड़ता है, "क्योंकि उसमें ईश्‍वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है।"

यद्यपि यीशु एक पूर्ण मनुष्य है, उसने उसी तरह के पापी स्वभाव के साथ जन्म नहीं लिया जिस तरह से हम लेते हैं। निश्चित है कि वह हमारी तरह से ही परीक्षा में से होकर गया था जैसे हम जाते हैं, ये परीक्षाएँ उसके सामने शैतान ने रखी थी, तथापि वह पापरहित ही रहा क्योंकि परमेश्‍वर पाप करने की क्षमता नहीं रखता है। यह उसके स्वभाव के ही विरूद्ध है (मत्ती 4:1; इब्रानियों 2:18, 4:15; याकूब 1:13)। पाप अपनी परिभाषा के अनुसार व्यवस्था को तोड़ना है। परमेश्‍वर ने व्यवस्था की रचना की है, और व्यवस्था स्वभाव से ही यह मांग करती है कि परमेश्‍वर क्या कर सकता है और क्या नहीं कर सकता है; इसलिए, पाप कुछ ऐसी बात है जिसे परमेश्‍वर अपने स्वभाव के कारण नहीं करेगा।

परीक्षा में पड़ना, स्वयं में, पाप नहीं है। एक व्यक्ति आपको परीक्षा में किसी ऐसी बात के द्वारा डाल सकता है, जिसकी आप इच्छा ही नहीं करते, जैसे कि हत्या करना या यौनिक अनैतिकता में सम्मिलित होना। हो सकता है कि आपकी ऐसी कोई भी इच्छा न हो कि इन कार्यों में संलिप्त हुआ जाए, परन्तु आप फिर भी प्रलोभन में पड़ जाते हैं क्योंकि किसी ने आपके लिए इन्हें होने की सम्भावना को उत्पन्न कर दिया है। "परीक्षा" शब्द के लिए कम से कम दो परिभाषाएँ पाई जाती हैं:

1) आपके सामने आपके स्वयं के स्वभाव या किसी बाहरी वस्तु के द्वारा पाप से भरे हुए किसी कार्य को करने के प्रस्ताव का होना।

2) किसी पापी कार्य में या सम्भावित आनन्द में वास्तव में भाग लेना और किसी कार्य को उस मात्रा तक कर लेना कि इससे होने वाले परिणाम पहले से ही आपके मन में घटित हो रहे हैं।

पहली परिभाषा एक पाप से भरे हुए कार्य/विचार के विवरण को; परन्तु दूसरी अवश्य परिभाषित नहीं करती है। जब आप एक पाप से भरे हुए कार्य में संलिप्त होने का विचार करते और सोचते हैं कि आप इसे कैसे कर लेंगे, तब आपने पाप की सीमा को लाँघ दिया है। यीशु इस परिभाषा के अनुसार परीक्षा में पड़ा था परन्तु एक बात को छोड़कर कि उसकी परीक्षा कभी भी पापी स्वभाव के कारण नहीं हुई क्योंकि यह उसमें वास ही नहीं करता था। शैतान ने यीशु को पाप से भरे हुए कार्यों को करने के लिए प्रस्ताव दिया परन्तु उसमें पाप में भाग लेने के लिए किसी तरह की कोई भीतरी इच्छा नहीं थी। इसलिए, वह हमारी ही तरह परीक्षा में पड़ा परन्तु फिर भी वह पापरहित रहा।

वे लोग जो पापाधीन होने की धारणा को थामे हुए हैं, यह विश्‍वास करते हैं, कि वह सच्चाई में परीक्षा का अनुभव कर सकता था, और इसलिए वास्तव में पाप के विरूद्ध हमारे संघर्ष और प्रलोभन में हमारी सहायता नहीं कर सकता है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि एक व्यक्ति को किसी बात को समझने के लिए उसे अनुभव करने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्‍वर सब कुछ के बारे में सब कुछ जानता है। जबकि परमेश्‍वर में पाप करने की कोई इच्छा नहीं है, और निश्चित रूप से वह पाप नहीं कर सकता है, परमेश्‍वर जानता और समझता है कि पाप क्या है। परमेश्‍वर जानता और समझता है कि परीक्षा में पड़ना क्या होता है। यीशु हमारी परीक्षाओं में हमारी सहायता कर सकता है क्योंकि वह जानता है, इसलिए नहीं कि उसने वैसे ही सब बातों को "अनुभव" किया है जैसे हम करते हैं।

यीशु जानता है कि परीक्षा में पड़ना क्या होता है, परन्तु वह यह नहीं जानता कि पाप करना क्या होता है। यह बात उसे हमारी सहायता करने से रोक नहीं सकती है। हम पापों से परीक्षा में पड़ जाते हैं जो मनुष्य के लिए सामान्य हैं (1 कुरिन्थियों 10:13)। इन पापों को सामान्य रूप से तीन भिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है; (शरीर की अभिलाषा, आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड" (1 यूहन्ना 2:16 बी.एस.आई बाइबल)। हव्वा के पाप और उसके परीक्षा में पड़ने, साथ ही साथ यीशु के परीक्षा में पड़ने की भी जाँच करें, और आप इन तीनों श्रेणियों से प्रत्येक परीक्षा को निकल कर आते हुए देखेंगे। यीशु हर तरह और प्रत्येक क्षेत्र में हमारी ही तरह परखा गया था, परन्तु वह इसमें पूर्ण पवित्र बना रहा। यद्यपि हमारे पतित स्वभाव में कुछ पापों में भाग लेने की इच्छा होती है, हमारे पास, मसीह के द्वारा, पाप के ऊपर जय पाने की क्षमता है, क्योंकि हम अब और अधिक पाप के दास नहीं रहे अपितु परमेश्‍वर के दास हैं (रोमियों 6 विशेषरूप से वचन 2 और 16-22)।

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