चिन्तनशील आत्मिकता क्या है?



प्रश्न: चिन्तनशील आत्मिकता क्या है?

उत्तर:
चिन्तनशील आत्मिकता किसी भी उस व्यक्ति के लिए एक तीव्र खतरनाक अभ्यास है, जो बाइबल आधारित, परमेश्‍वर-केन्द्रित जीवन को यापन करने की इच्छा रखता है। यह सबसे अधिक सामान्य रूप से उभरते हुए कलीसियाई आन्दोलन के साथ सम्बद्ध है, जो झूठे उपदेशों के साथ जुड़े हुए हैं। यह साथ ही बहुत से विभिन्न समूहों के द्वारा उपयोग किया जाता है, जिनका यदि किसी तरह से मसीही विश्‍वास के साथ कोई सम्पर्क है।

चिन्तनशील आत्मिकता, अपने अभ्यास में ध्यान के ऊपर केन्द्रित है, यद्यपि यह ध्यान बाइबल आधारित दृष्टिकोण वाला नहीं है। यहोशू 1:8 जैसे संदर्भ वास्तव में हमें ध्यान करने के लिए उपदेश देते हैं: "व्यवस्था की यह पुस्तक तेरे चित्त से कभी न उतरने पाए, इसी में दिन रात ध्यान दिए रहना, इसलिये कि जो कुछ उस में लिखा है, उसके अनुसार करने की तू चौकसी करे; क्योंकि ऐसा ही करने से तेरे सब काम सफल होंगे और तू प्रभावशाली होगा।" यहाँ पर ध्यान दें कि हमारे ध्यान का केन्द्र बिन्दु क्या होना चाहिए — परमेश्‍वर का वचन। चिन्तनशील आत्मिकता — चलित ध्यान शाब्दिक रूप से कुछ नहीं अर्थात् शून्य के ऊपर ध्यान केन्द्रित करता है। एक अभ्यासकर्ता को पूर्ण रीति से अपने मन को खाली कर देने अर्थात् "शून्य" कर देने के लिए उत्साहित किया जाता है। सम्भावना यह व्यक्त की जाती है, कि यह एक व्यक्ति को सर्वोच्च आत्मिक अनुभव को पाने के लिए स्वयं को खोल देने में सहायता प्रदान करता है। तथापि, हमें पवित्र शास्त्र में उपदेश दिया गया है, कि हम हमारे मनों को मसीह के मन में परिवर्तित कर लें। अपने मनों को खाली करना इस सक्रिय, विवेकशील परिवर्तन के विपरीत है।

चिन्तनशील आत्मिकता साथ ही परमेश्‍वर के साथ रहस्यवादी अनुभव की खोज करने के लिए उत्साहित करती है। रहस्यवाद ऐसी मान्यता है, कि परमेश्‍वर का ज्ञान, आत्मित सत्य, और सर्वोच्च वास्तविकता को आत्मनिष्ठक अनुभव के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। अनुभवजन्य ज्ञान का महत्व पवित्र शास्त्र के अधिकार को मिटा देता है। हम परमेश्‍वर को उसके वचन के अनुसार जानते हैं। "सम्पूर्ण पवित्र शास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है, और उपदेश और समझाने और सुधारने और धार्मिकता की शिक्षा के लिए लाभदायक है, ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए (2 तीमुथियुस 3:16-17)। परमेश्‍वर का वचन पूर्ण है। विश्‍वास न करने का कोई भी कारण नहीं पाया जाता है, कि परमेश्‍वर उसके वचन में रहस्यवादी अनुभवों के द्वारा अतिरिक्त सच्चाइयों या शिक्षाओं को जोड़ता है। इसकी अपेक्षा, हमारा विश्‍वास और जो कुछ हम परमेश्‍वर के बारे में जानते हैं, वह सब कुछ इसी सच्चाई के ऊपर आधारित है।

सेन्टर फॉर कन्टेम्प्लेटिव स्पिरीचुवालिटी की बैवसाईट इसका सार बहुत ही अच्छी रीति से करती है: "हम लौकिक और धार्मिक पृष्ठभूमियों की विभिन्नता से आए हुए लोग हैं और हम संसार की सभी महान् आत्मिक परम्पराओं के अध्ययन और आत्मिक अभ्यास के द्वारा अपनी यात्रा को समृद्ध करना चाहते हैं। हम एक प्रेमी आत्मा के निकटता में आने की इच्छा रखते हैं, जो सारी सृष्टि में व्याप्त है और जो सभी प्राणियों के लिए हमारी दया को प्रेरित करती है।" इस तरह के लक्ष्यों के बारे में कुछ भी पूर्ण रीति से बाइबल आधारित नहीं है। संसार की "आत्मिक परम्पराओं" का अध्ययन करना व्यर्थता का एक अभ्यास मात्र है, क्योंकि मसीह को महिमा देनी वाली परम्पराओं के अतिरिक्त कोई भी आत्मिक परम्परा झूठ है। परमेश्‍वर की निकटता में आने का केवल एक ही मार्ग जिसे उसने ठहराया — यीशु मसीह और उसका वचन है।



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