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प्रश्न

क्या उत्तर पाई हुई प्रार्थना के लिए शर्तें हैं?

उत्तर


उत्तर : कुछ लोग बिना किसी शर्त के प्रार्थना करना चाहते हैं। परन्तु बाइबल आधारित सच्चाई यह है कि प्रार्थना की शर्तें होती हैं। यह सच है कि यीशु ने कहा, "और जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्‍वास से माँगोगे वह सब तुम को मिलेगा" (मत्ती 21:22)। परन्तु, इस कथन में भी, हमारे लिए प्रार्थना करने की एक शर्त: विश्‍वास को दिया गया है। जैसे-जैसे हम बाइबल की जाँच करते हैं, हम पाते हैं कि प्रार्थना करने की अन्य शर्तें भी हैं।

प्रार्थना के विषय में बाइबल आधारित के दस निर्देशों को यहाँ दिया गया है, जो प्रार्थना की शर्तों को दर्शाते हैं:

1) स्वर्गीय पिता से प्रार्थना करें (देंखें मत्ती 6:9)। प्रार्थना करने की यह शर्ते स्पष्ट प्रतीत होती दिखाई देती है, परन्तु यह महत्वपूर्ण है। हम झूठे देवताओं, स्वयं, स्वर्गदूतों, बुद्ध, या कुँवारी मरियम से प्रार्थना नहीं करते हैं। हम बाइबल के परमेश्‍वर से प्रार्थना करते हैं, जिसने स्वयं को यीशु मसीह में प्रकट किया और जिसका आत्मा हम में वास करता है। हमारे "पिता" के रूप में उसके आने का तात्पर्य यह है कि हम पहले उसकी सन्तान हैं – ऐसा हमें मसीह में विश्‍वास करने के द्वारा बनाया गया है (यूहन्ना 1:12 को देखें)।

2) अच्छी वस्तुओं के लिए प्रार्थना करें (देखें मत्ती 7:11)। हम सदैव अच्छे को नहीं समझते या नहीं पहचानते हैं, परन्तु परमेश्‍वर जानता है, और वह अपनी सन्तान को वह देने के लिए उत्सुक है, जो उनके लिए सबसे अच्छा क्या है। पौलुस ने तीन बार एक दुःख से चंगा होने के लिए प्रार्थना की, और प्रत्येक समय परमेश्‍वर ने कहा, "नहीं।" क्यों एक प्रेम परमेश्‍वर पौलुस को चँगा करने से इन्कार कर देता है? क्योंकि परमेश्‍वर के पास उसके लिए कुछ अधिक उत्तम था, अर्थात्, एक जीवन जिसे अनुग्रह के द्वारा यापन किया गया था। पौलुस ने चंगाई के लिए प्रार्थना करना बन्द कर दिया और अपनी कमजोरी में आनन्दित होना आरम्भ किया (2 कुरिन्थियों 12:7-10)।

3) आवश्यक वस्तुओं के लिए प्रार्थना करें (देखें फिलिप्पियों 4:19)। परमेश्‍वर के राज्य को प्रथम स्थान पर रखना प्रार्थना की शर्तों में से एक है (मत्ती 6:33)। प्रतिज्ञा यह है कि परमेश्‍वर हमारी सभी आवश्यकताओं को पूरा करेगा, न कि हमारी सभी इच्छाओं को पूरा करेगा। इसमे भिन्नता है।

4) एक धार्मिकता से भरे हुए मन से प्रार्थना करें (देखें याकूब 5:16)। बाइबल प्रार्थना का उत्तर देने की शर्त के रूप में एक शुद्ध विवेक को रखने की बात करती है (इब्रानियों 10:22)। यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने पापों को परमेश्‍वर के सामने अंगीकार करें। "यदि मैं मन में अनर्थ की बात सोचता, तो प्रभु मेरी न सुनता" (भजन संहिता 66:18)।

5) एक आभारी मन से प्रार्थना करें (देखें फिलिप्पियों 4:6)। प्रार्थना का एक भाग धन्यवाद देने का एक दृष्टिकोण होता है।

6) परमेश्‍वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करें (देखें 1 यूहन्ना 5:14)। प्रार्थना करने के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इसे परमेश्‍वर की इच्छा के भीतर किया जाना चाहिए। यीशु ने प्रत्येक समय ऐसे ही प्रार्थना की, यहाँ तक गतसमनी की वाटिका में भी: "तौभी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो" (लूका 22:42)। हम किसी भी बात के लिए जिसे हम चाहते हैं, बड़ी ईमानदारी और विश्‍वास के साथ प्रार्थना कर सकते हैं, परन्तु, यदि परमेश्‍वर की इच्छा कुछ और ही है, तो हम प्रार्थना करने के भ्रम में हैं।

7) यीशु मसीह के अधिकार में प्रार्थना करें (देखें यूहन्ना 16:24)। यीशु ही वह कारण है, जो हम अनुग्रह के सिंहासन तक पहुँचाने में सक्षम करता है (इब्रानियों 10:19-22), और वही हमारा मध्यस्थ है (1 तीमुथियुस 2:5)। प्रार्थना करने की शर्त यह है कि हम उसके नाम में प्रार्थना करते हैं।

8) हियाव के साथ निरन्तर प्रार्थना करें (देखें लूका 18:1)। वास्तव में, बिना रूके प्रार्थना करें (1 थिस्सलुनीकियों 5:17)। प्रभावी प्रार्थना की शर्तों में से एक यह है कि हम हार नहीं मानते हैं।

9) स्वार्थरहित प्रार्थना करें (देखें याकूब 4:3)। हमारे मूल भाव महत्वपूर्ण हैं।

10) विश्‍वास के साथ प्रार्थना करें (देखें याकूब 1:6)। विश्‍वास के बिना, परमेश्‍वर को प्रसन्न करना अनहोना है (इब्रानियों 11:6), जो अकेला ही असम्भव कार्य को कर सकता है (लूका 1:37)। विश्‍वास के बिना, प्रार्थना ही क्यों की जाए?

सूर्य को खड़े होने के लिए यहोशू की प्रार्थना उतनी ही निर्भीक है, जितनी कि यह विनती थी, जिसने प्रार्थना की इन सभी शर्तों तो पूरा किया (यहोशू 10:12-14)। वर्षा को रोक देने के लिए एलिय्याह की प्रार्थना – और इसके पश्‍चात् प्रार्थना की गई कि वर्षा फिर से आरम्भ हो जाए — इन सभी शर्तों को पूरा करती हैं (याकूब 5:17-18)। लाजर की कब्र के सामने खड़े होकर यीशु का प्रार्थना करना इन सभी शर्तों को पूरा करती है (यूहन्ना 11:41)। इन सभों ने परमेश्‍वर से उसकी इच्छा के अनुसार प्रार्थना अच्छी और आवश्यक वस्तुओं के लिए विश्‍वास में होकर की।

यहोशू, एलिय्याह और यीशु के उदाहरण हमें सिखाते हैं कि, जब हमारी प्रार्थना परमेश्‍वर की प्रभुता से सम्पन्न इच्छा के साथ पँक्तिबद्ध हो जाती है, तो अद्भुत बातें घटित होने लगती हैं। पहाड़ों से घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे उखाड़े जा सकते हैं (मरकुस 11:23)। जिस संघर्ष का सामना हम प्रार्थनाओं के उत्तर को पाने के लिए करते हैं, वह हमारी प्रार्थनाओं को परमेश्‍वर की इच्छा के साथ पँक्तिबद्ध होना का है, जिस से हमारी इच्छाएँ उसकी इच्छाओं के अनुरूप हो जाती हैं। परमेश्‍वर की इच्छा और हमारी अपनी के मध्य में एकता लक्ष्य है। हम वही चाहते हैं, जो वह चाहता है; न तो कुछ ज्यादा, न कुछ कम। और हम ऐसा कुछ नहीं चाहते जो वह नहीं चाहता है।

भक्ति से पूर्ण, प्रभावी प्रार्थना में शर्तें होती हैं, और परमेश्‍वर हमें प्रार्थना करने के लिए आमन्त्रित करता है। हम कब बड़ी प्रार्थना कर सकते हैं? जब हम यह विश्‍वास करते हैं कि परमेश्‍वर हम से कुछ बड़ा चाहता है। हम कब निर्भीकता के साथ प्रार्थना कर सकते हैं? जब हम विश्‍वास करते हैं कि परमेश्‍वर कुछ निर्भीकता से भरे हुए कार्य को चाहता है। हमें कब प्रार्थना करनी चाहिए? सभी समय में हमें प्रार्थना करनी चाहिए।

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