कलीसिया में होने वाले संघर्षों अर्थात् झगड़ों का निपटारा कैसे करना चाहिए?


प्रश्न: कलीसिया में होने वाले संघर्षों अर्थात् झगड़ों का निपटारा कैसे करना चाहिए?

उत्तर:
कलीसिया में ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं, जहाँ पर संघर्ष विकसित हो सकते हैं। तथापि, उनमें से अधिकांश तीन श्रेणियों में से किसी एक में आते हैं: विश्‍वासियों के मध्य निर्लज्जता से भरे हुए पाप के कारण संघर्ष, नेतृत्व के साथ संघर्ष, और विश्‍वासियों के मध्य में झगड़ों का होना। स्वीकृत रूप से, बहुत से विषय एक दूसरे के साथ जुड़े हुए होते हैं और वास्तव में इन श्रेणियों में से दो या अधिक में सम्मिलित होते हैं।

जो विश्‍वासी निर्लज्जता से भरे हुए पाप को करते हैं, वे कलीसिया में संघर्ष या झगड़े का कारण बन जाते हैं, जैसा कि 1 कुरिन्थियों 5 में देखा जाता है। ऐसी कलीसिया जो उसके सदस्यों के मध्य पाप का निपटारा नहीं करती अन्य समस्याओं को आने के लिए द्वार को खोल देती है। कलीसिया अविश्‍वासियों के प्रति न्यायी बनने के लिए नहीं बुलाया गया है, परन्तु कलीसिया से अपेक्षा की जाती है कि वह विश्‍वासियों का सामना करे और उन्हें पुनर्स्थापित करे, जो अपने पापों से पश्चाताप नहीं करते जैसे कि 1 कुरिन्थियों 5:11 में सूचीबद्ध किया गया है: "...पर मेरा कहना यह है कि यदि कोई भाई कहलाकर, व्यभिचारी, या लोभी, या मूर्तिपूजक, या गाली देने वाला या पियक्कड़ या अन्धेर करने वाला हो।" ऐसे विश्‍वासियों को तब तक कलीसिया में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि वे पश्चाताप करने की इच्छा नहीं रखते हैं। मत्ती 18:15-17 एक विश्‍वासी का सामना करके उसे समझाने और उसको पुनर्स्थापित करने के लिए एक संक्षिप्त प्रक्रिया का प्रबन्ध करता है। सामना किया जाना बहुत अधिक सावधानी, नम्रता और पुनर्स्थापना के लक्ष्य से ही किया जाना चाहिए (गलातियों 6:1)। कलीसियाएँ जो प्रेमपूर्ण तरीके से पाप कर रहे विश्‍वासियों को अनुशासित करती हैं, कलीसिया को एक बहुत बड़े संघर्ष से बचा लेती है।

कई बार, विश्‍वासी कलीसिया के अगुवों की नीतियों या कार्यों से सन्तुष्ट न हो। आरम्भिक कलीसिया के इतिहास में घटित हुई घटना इसका एक उदाहरण है (प्रेरितों के काम 6:1-7)। यरूशलेम की कलीसिया के विश्‍वासियों ने प्रेरितों से शिकायत की कि कुछ लोग जैसा उन्होंने सोचा था, वैसे देखभाल का कार्य नहीं कर रहे थे। परिस्थिति का समाधान निकाला गया और कलीसिया में वृद्धि होने लगी (प्रेरितों के काम 6:7)। आरम्भिक कलीसिया ने संघर्ष को सेवकाई में सुधार करने के लिए एक अवसर के रूप में उपयोग किया। तथापि, जब कलीसियाओं के पास सरोकारों के निपटारे की स्पष्ट प्रक्रिया नहीं होती है, तब लोग स्वयं अपने ही मंचों से समस्याओं को उत्पन्न करने की मंशा रखते हैं। लोग कलीसिया में दूसरों के लिए समूह निर्मित करने लगते हैं, या फिर यहाँ तक कि एक ही जैसे "विचार रखने" वाले विश्‍वासी एक ही स्थान पर इकट्ठे हो जाते हैं। अगुवे इन समस्याओं को स्वार्थहीन, प्रेम चरवाहे होने के द्वारा हटाने में सहायता प्रदान कर सकते हैं। अगुवों को सेवक और स्वामी के स्थान पर आदर्श से भरे हुए नमूनों को प्रस्तुत करना चाहिए (1 पतरस 5:1-3)। कलीसिया के हताश सदस्यों को अगुवों का सम्मान करना चाहिए (इब्रानियों 13:7, 17), दूसरों पर क्रोधित होने में धीमा (1 तीमुथियुस 5:19), और दूसरों से नहीं अपितु उनके बारे में उनसे प्रेम में होकर सत्य बोलने वाले होना चाहिए (इफिसियों 4:15)। ऐसे समयों में जब ऐसा प्रतीत हो कि अगुवा ही किसी बात के लिए प्रतिउत्तर नहीं दे रहा है, एक व्यक्ति को मत्ती 18:15-17 में दी हुई पद्धति को यह सुनिश्चित करते हुए अनुसरण करना चाहिए कि किसी के पास किसी तरह की कोई उलझन नहीं कि कोई दूसरा अपने दृष्टिकोण के ऊपर कैसे खड़ा हुआ है।

बाइबल हमें चेतावनी देती है कि एक कलीसिया में एक दूसरे विश्‍वासी के मध्य में संघर्ष वाली बातें हो सकती हैं। कुछ संघर्ष घमण्ड और स्वार्थ के कारण उत्पन्न होते हैं (याकूब 4:1-10)। कुछ संघर्ष ठोकरों के कारण आ जाते हैं, जिन्हें क्षमा नहीं किया गया है (मत्ती 18:15-35)। परमेश्‍वर ने हमें शान्ति को बनाए रखने के लिए कहा है (रोमियों 12:18; कुलुस्सियों 3:12-15)। यह प्रत्येक विश्‍वासी का दायित्व है कि वह संघर्ष के समाधान का प्रयास करे। समाधान की ओर कुछ मूल कदमों में निम्न बातें सम्मिलित हैं :

1. सही मन के व्यवहार को विकसित करना — अर्थात् नम्र होना (गलातियों 6:1); विनम्रता का होना (याकूब 4:10); क्षमा करना (इफिसियों 4:31,32); और धैर्यवान् होना (याकूब 1:19,20)।

2. संघर्ष के अपने हिस्से का मूल्यांकन करना — मत्ती 7:1-5 (दूसरों की सहायता करने से पहले अपनी आँख में पड़े हुए लठ्ठे को हटाना आवश्यक है)।

3. व्यक्तिगत् रूप से मिलने जाना अपनी चिन्ता को बताने के लिए व्यक्ति (दूसरे को पास नहीं) के पास जाना — मत्ती 18:15. इसे प्रेम के साथ किया जाना चाहिए (इफिसियों 4:15) और केवल अपनी भड़ास निकालने या भावनाओं को बहाने के लिए नहीं करना चाहिए। एक व्यक्ति पर आरोप लगाना मात्र स्वयं की रक्षा को प्रोत्साहित करना होगा। इसलिए, उस व्यक्ति पर आक्रमण करने की अपेक्षा समस्या का समाधान करें। इससे व्यक्ति को स्थिति स्पष्ट करने या अपराध के लिए क्षमा माँगने का सर्वोत्तम अवसर मिलता है।

4. यदि समाधान का प्रथम प्रयास आवश्यक परिणाम की प्राप्ति को नहीं लाया है, तो किसी दूसरे व्यक्ति के साथ आगे कार्य करें जो मध्यस्थता के कार्य में सहायता प्रदान कर सकता है (मत्ती 18:16)। स्मरण रखें आपका लक्ष्य एक तर्क पर विजय की प्राप्ति नहीं है; मेल-मिलाप में अपने साथी विश्‍वासी को जीतना आपका लक्ष्य है। इसलिए, किसी ऐसे से सहायता लें, जो संघर्ष के समाधान में आपकी सहायता कर सकता है।

संघर्ष को उत्तम रीति से निपटारा प्रार्थनापूर्वक और दूसरों के ऊपर प्रेमपूर्ण रीति से नम्रता के साथ ध्यान केन्द्रित करते हुए, सम्बन्धों की पुनर्स्थापना की इच्छा के द्वारा हो सकता है। एक कलीसिया में अधिकत्तर संघर्षों का समाधान हो सकता है, यदि बाइबल आधारित सिद्धान्तों का अनुसरण किया जाता है। तथापि, ऐसे समय आते हैं जब बाहरी परामर्शदान की सहायता की आवश्यकता हो सकती है। हम पीसमेकर(www.hispeace.org). जैसी सेवकाइयों के संसाधनों के उपयोग किए जाने की अनुंशसा करते हैं।

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