एक मसीही का समाजवाद के प्रति कैसे दृष्टिकोण होना चाहिए?


प्रश्न: एक मसीही का समाजवाद के प्रति कैसे दृष्टिकोण होना चाहिए?

उत्तर:
शताब्दियों से अधिकांश दार्शनिकों का यह मानना रहा है कि इतिहास विचारों, यर्थाथवादी वास्तविकताओं की खोजों, या मानवीय तर्क के द्वारा निर्मित हुआ है। परन्तु एक ऐसा प्रसिद्ध दार्शनिक है, जिसने यह तर्क दिया है कि मानव इतिहास के पीछे चलित कारक अर्थशास्त्र है। कार्ल मार्क्स का जन्म 1818 में जर्मन यहूदी माता-पिता से हुआ था और 23 वर्ष की उम्र में उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई थी। तत्पश्चात् उन्होंने यह प्रमाणित करने के लिए एक मिशन आरम्भ किया कि मनुष्य की पहचान एक व्यक्ति के कार्य के ऊपर निर्मित है और आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह से किसी एक व्यक्ति को नियन्त्रित करती है। यह तर्क देते हुए कि यह श्रम है, जिसके ऊपर मनुष्य का अस्तित्व है, मार्क्स का मानना था कि मानवीय समुदाय श्रम विभाजन के द्वारा निर्मित किया गया है।

मार्क्स ने इतिहास का अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि समाज सैकड़ों वर्षों तक कृषि के ऊपर आधारित था। परन्तु औद्योगिक क्रान्ति ने मार्क्स के मन में सब कुछ को परिवर्तित कर दिया, क्योंकि जो लोग स्वयं के लिए स्वतन्त्र रूप से काम करते थे, वे अब अर्थशास्त्र के कारण मजबूर होकर कारखानों में काम करते हैं। मार्क्स ने महसूस किया कि इसने उनकी गरिमा और पहचान को हटा दिया है, क्योंकि उनके श्रम ने यह परिभाषित किया कि वे कौन थे, और वे अब एक शक्तिशाली श्रम लेने वाले कार्यपालक के द्वारा नियन्त्रित दासों के रूप में सीमित हो गए थे। इस दृष्टिकोण का अर्थ था कि पूंजीवाद का अर्थशास्त्र मार्क्स का स्वाभाविक शत्रु था।

मार्क्स ने यह अनुमान लगाया कि पूंजीवाद ने व्यक्तिगत् सम्पत्ति पर बल दिया है और इसलिए, स्वामित्व केवल कुछ ही लोगों के विशेषाधिकार तक सीमित हो गया है। मार्क्स के मन में दो भिन्न "समुदायों" : व्यापार के मालिकों, या बुर्जुआ समुदाय; और श्रमिक वर्ग, या सर्वहारा वर्ग की विचारधारा उभरी। मार्क्स के अनुसार, पूंजीपतियों ने सर्वहारा वर्ग को शोषित करते हुए लाभ परिणामस्वरूप एक व्यक्ति का लाभ दूसरे व्यक्ति का नुकसान के सिद्धान्त के द्वारा उठाया। इसके अतिरिक्त, मार्क्स का मानना था कि व्यापार के मालिकों ने कानून बनाने वालों को प्रभावित करने के लिए सुनिश्चित किया कि श्रमिकों की गरिमा और अधिकारों के नुकसान पर उनके हितों का बचाव होता रहे। अन्त में, मार्क्स को महसूस हुआ कि धर्म "जनता की अफीम" है, जिसके द्वारा धनी श्रमिक वर्ग में जोड़ तोड़ करते हुए उनका उपयोग करते हैं; सर्वहारा वर्ग को, यदि वे परिश्रम से जहाँ पर परमेश्‍वर ने उन्हें (पूंजीपति के अधीन) ठहरा दिया है, वहाँ पर काम करते रहते हैं, तो एक दिन स्वर्ग में प्रतिफल देने का वादा किया जाता है।

सांसारिक स्वप्नलोक में मार्क्स ने कल्पना की कि लोगों ने सामूहिक रूप से अपने आप को स्वामित्व और मनुष्य के सामान्य भलाई के लिए सभी कार्यों को किया है। मार्क्स का लक्ष्य आर्थिक उत्पादन के सभी साधनों को राज्य के स्वामित्व के माध्यम से निजी सम्पत्ति के स्वामित्व को समाप्त करना था। व्यक्तिगत् सम्पत्ति के समाप्त होने के पश्चात् मार्क्स ने महसूस किया कि एक व्यक्ति की पहचान ऊँची हो जाएगी और वह दीवार जिसे मालिक और मजदूर वर्ग के मध्य में कथित रूप से पूँजीवाद ने निर्मित किया है, वह बिखर जाएगी। प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे के लिए मूल्यवान होगा और एक साझे उद्देश्य के लिए एक साथ काम करेगा।

मार्क्स की सोच में कम से कम चार त्रुटियाँ पाई जाती हैं। सबसे पहले, उसका यह दावा है कि किसी एक व्यक्ति का लाभ दूसरे व्यक्ति के खर्च पर आना चाहिए, एक मिथक है; पूँजीवाद की संरचना सभों के लिए बहुत सारे स्थानों को छोड़ देती है, ताकि सभी नई खोजों और प्रतिस्पर्धा के माध्यम से अपने जीवन स्तर को आगे बढ़ाएँ। कई समूहों के द्वारा प्रतिस्पर्धा करना और ऐसे उपभोक्ताओं के बाजार में अच्छे प्रदर्शन को करना पूरी तरह से सम्भव है, जो उनके सामान और सेवाओं को चाहते हैं।

दूसरा, मार्क्स अपनी धारणा में गलत था कि किसी उत्पाद का मूल्य उस श्रम की मात्रा के ऊपर आधारित होता है, जो उसमें खर्च किया गया है। एक वस्तु या सेवा की गुणवत्ता को केवल श्रमिक व्यय के प्रयासों की संख्या से निर्धारित नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक मुख्य बढ़ई अकुशल कारीगरों की तुलना में फर्नीचर का एक टुकड़ा अधिक तेज़ और सुन्दरता से बना सकता है, और इसलिए उसका काम पूँजीवाद जैसे आर्थिक पद्धति में कहीं अधिक (और सही तरीके से) मूल्यवान होगा।

तीसरा, मार्क्स के सिद्धान्त में सरकार की आवश्यकता पाई जाती है, जो भ्रष्टाचार से मुक्त है और अपने विभिन्न पदों के भीतर संभ्रान्तवाद की सम्भावना के होने का इन्कार कर देता है। यदि इतिहास ने कुछ भी दिखाया है, तो वह यह है कि सत्ता पतित मनुष्य को भ्रष्ट कर देती है, और पूर्ण सत्ता पूरी तरह से भ्रष्ट कर देती है। एक देश या सरकार परमेश्‍वर के विचार को मार सकती है, परन्तु कोई और परमेश्‍वर के स्थान को ले लेगी। यह कोई और अक्सर एक व्यक्ति या समूह होता है जो जनसँख्या पर शासन करना आरम्भ करता है और किसी भी मूल्य पर अपने विशेषाधिकार को यथास्थिति बनाए रखने का प्रयास करता है।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात, मार्क्स इसलिए भी गलत था कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके कार्य से बनती है, जिसे वह करता है। यद्यपि, धर्मनिरपेक्ष समाज निश्चित रूप से लगभग हर किसी को इस पर विश्‍वास करने के लिए मजबूर कर देता है, बाइबल यह कहती है कि सभी के मूल्य समान है, क्योंकि सभी को सनातन परमेश्‍वर के स्वरूप में रचा गया है।, यही वह स्थान है, जहाँ पर मनुष्य के सच्चे मूल्य निहित हैं।

क्या मार्क्स सही था? क्या अर्थशास्त्र उत्प्रेरक है, जो मानवीय इतिहास को चला रही है? नहीं, जो मानवीय इतिहास को ब्रह्माण्ड का सृष्टिकर्ता निर्देशित करता है, जो प्रत्येक देश के उदय और पतन सहित सभी वस्तुओं को अपने में नियन्त्रित करता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्‍वर ही उस प्रत्येक को अपने नियन्त्रण में रखता है, जो प्रत्येक देश का मुखिया होता है, जैसा कि पवित्रशास्त्र कहता है, "परमप्रधान परमेश्‍वर मनुष्यों के राज्य में प्रभुता करता है, और उसको जिसे चाहे उसे दे देता है, और वह छोटे से छोटे मनुष्य को भी उस पर नियुक्त कर देता है" (दानिय्येल 4:17)। इसके अतिरिक्त, यह परमेश्‍वर ही है जो एक व्यक्ति को उसके श्रम के प्रति कुशलता प्रदान करता और उससे सम्पन्नता आती है, न कि यह सरकार से आती है: "सुन, जो भली बात मैं ने देखी है, वरन् जो उचित है, वह यह कि मनुष्य खाए और पीए और अपने परिश्रम से जो वह धरती पर करता है, अपनी सारी आयु भर जो परमेश्‍वर ने उसे दी है, सुखी रहे: क्योंकि उसका भाग यही है। वरन् हर एक मनुष्य जिसे परमेश्‍वर ने धन सम्पत्ति दी हो, और उनसे आनन्द भोगने और उसमें से अपना भाग लेने और परिश्रम करते हुए आनन्द करने को शक्ति भी दी हो : यह परमेश्‍वर का वरदान है" (सभोपदेशक 5:18–19)।

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