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प्रश्न

एक मसीही विश्‍वासी का लत के प्रति कैसा दृष्टिकोण होना चाहिए?

उत्तर


शब्द लत या बुरी आदत के दो मूल अर्थ हैं। पहला "शारीरिक या मनोवैज्ञानिक रूप से एक आदत — बना देने वाले पदार्थ के ऊपर निर्भर होने की अवस्था" से है। जि "पियक्कड़" (तीतुस 1:7;2:3), "शराबी" (1 तीमुथियुस 3:3) या "अधिक शराब पीने वाले" (1 तीमुथियुस 3:8) जैसे मसीही विश्‍वासियों को कलीसिया में शिक्षा देने वाले स्थान या अधिकार के उच्च पद पर चुने जाने के लिए अयोग्य ठहराया गया है। यह स्पष्ट है कि कलीसिया का नेतृत्व नम्र और आत्म-संयम वाला होना चाहिए, उदाहरण के लिए, वे दूसरों को भी जो वे करते हैं, सीखा सकते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि "पियक्कड़...परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे" (1 कुरिन्थियों 6:10)। विश्‍वासियों को मद्यपान पर निर्भर नहीं होना चाहिए, और यह तर्क किसी भी अन्य पदार्थ, जैसे नशीली दवाओं, अश्लीलता, जुआ, लालच, तम्बाकू, इत्यादि के अन्य व्यसनों पर भी लागू होता है।

लत या बुरी आदत की दूसरी परिभाषा "ऐसी अवस्था जो किसी के द्वारा बलपूर्वक या आदत के कारण अपने नियन्त्रण में ले ली गई है।" यह यह परमेश्‍वर के अतिरिक्त (कम से कम एक मसीही विश्‍वासी के लिए) किसी अन्य वस्तु के साथ जुनून के साथ जुड़ने की अवस्था के बारे में बोलता है जैसे: खेल, कार्य, खरीददारी और/या "वस्तुओं" को एकत्र करना, यहाँ तक कि परिवार या बच्चे की प्राप्ति इत्यादि का होना। हमें "परमेश्‍वर यहोवा को अपने सारे मन, और सारे जीव और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना है" (व्यवस्थाविवरण 6:5)। यीशु के अनुसार, यह पहली और सबसे बड़ी आज्ञा है (मत्ती 22:37-38)। अब, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि परमेश्‍वर के अतिरिक्त किसी भी अन्य वस्तु की लत गलत है। परमेश्‍वर ही केवल हमारी आदत के अनुसार खोज का विषय होना चाहिए। किसी और वस्तु के साथ स्वयं को व्यस्त रखना हमें उससे दूर कर देता और उसे अप्रसन्न करता है। वही केवल हमारे पूरे ध्यान, प्रेम और सेवा के योग्य है। इन बातों को किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु को भेंट स्वरूप देना मूर्तिपूजा है।

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