एक विश्वासी को परमेश्वर के गुणों के प्रति कैसे उत्तर देना चाहिए?


प्रश्न: एक विश्वासी को परमेश्वर के गुणों के प्रति कैसे उत्तर देना चाहिए?

उत्तर:
परमेश्वर अपने वचन (बाइबल) और अपने पुत्र (यीशु मसीह) के माध्यम से स्वयं को विश्वासियों को प्रकट करता है। जितना अधिक हम बाइबल का अध्ययन करते हैं, उतना ही अधिक हम परमेश्वर की विशेषताओं या गुणों को समझते हैं, वे योग्यताएँ जो उसके पास है। नाशवान होने के कारण, हम उस परमेश्वर की सामर्थ्य और वैभव को समझने के लिए संघर्ष करते हैं जिसने समय, स्थान, पदार्थ और सारे जीवन को रचा है। “क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है” (यशायाह 55:9)।

इस लेख के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, हम परमेश्वर की तीन मुख्य विशेषताओं और प्रत्येक के प्रति विश्वासी की प्रतिक्रिया पर ध्यान केन्द्रित करेंगे।

कदाचित् परमेश्‍वर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी पवित्रता की नैतिक विशेषता है। यशायाह 6:3 और प्रकाशितवाक्य 4:8 में परमेश्‍वर की पवित्रता को तीन गुणा अधिक सामर्थी होने का वर्णन किया गया है: “पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्‍वर, सर्वशक्‍तिमान, जो था और जो है और जो आनेवाला है।” केवल तब जब कोई व्यक्ति परमेश्वर की पवित्रता की झलक को देखता है तब ही उसे मानवीय पापों की तुलना में सच्चे पश्चाताप की कोई आशा होती है। जब हम पाप के भयानक परिणाम को जान लेते हैं और विचार करते हैं कि परमेश्वर के पापी पुत्र को हमारा दण्ड सहन करना पड़ा, तो यह हमें हमारे घुटनों पर ले आता है। हम परमेश्वर की पवित्रता का सामना करने से पहले ही चुप हो जाते हैं, पवित्रता के प्रति गूंगा हो जाते हैं जो श्रद्धा की माँग करती है। अय्यूब की तरह, हम कह उठते हैं कि, “मैं तो तुच्छ हूँ — मैं तुझे क्या उत्तर दूँ? मैं अपनी अंगुली दाँत तले दबाता हूँ”(अय्यूब 40:4)। परमेश्वर की पवित्रता को समझना हमें उसकी ओर शान्ति (2 कुरिन्थियों 1:3), दया (रोमियों 9:15), अनुग्रह, और क्षमा (रोमियों 5:17) को प्राप्त करने का कारण बनता है। “हे याह, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा ले, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकेगा? परन्तु तू क्षमा करनेवाला है, जिससे तेरा भय माना जाए” (भजन संहिता 130:3-4)।

कदाचित् परमेश्वर की सबसे प्यारी विशेषता उसका प्रेम है। प्रेम के लिए सम्बन्ध की आवश्यकता होती है, और अनादिकाल से पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अपने सम्बन्ध में एक साथ अस्तित्व में बने हुए है। परमेश्वर ने हमें उसके स्वरूप में रचा है, और हम उसके साथ सम्बन्ध बनाने के लिए बनाए गए थे (उत्पत्ति 1:27; रोमियों 1:19–20)। यह परमेश्वर के प्रेम की सीमा है कि उसने हमारे पापों से हमें छुड़ाने के लिए अपना एकमात्र पुत्र भेजा। “हम ने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिये अपने प्राण दे दिए”(1 यूहन्ना 3:16)। “परमेश्‍वर प्रेम है... हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहले उसने हम से प्रेम किया”(1 यूहन्ना 4:16-19)। परमेश्वर ने मसीह यीशु नाम के व्यक्ति में पाप का समाधान प्रदान किया। यीशु पाप के लिए हमारे दण्ड को लेने और परमेश्वर के न्याय को पूरा करने के लिए आया था (यूहन्ना 1:1-5, 14, 29)। कलवरी पर, परमेश्वर का सही प्रेम और सही न्याय पूरा हुआ। जब हम परमेश्वर के महान प्रेम को समझना आरम्भ करते हैं, तो हमारी प्रतिक्रियाएँ विनम्रता, पश्चाताप और पारस्परिक प्रेम होती हैं। राजा दाऊद की तरह हम प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर हमारे लिए एक शुद्ध मन और एक स्थिर आत्मा को उत्पन्न करेगा (भजन संहिता 34:18; 51:10, 17)। परमेश्वर एक उच्च और पवित्र स्थान पर रहता है, परन्तु उसके साथ ऐसे विश्वासी हैं जो पिसे हुए और दीन आत्मा वाले हैं (यशायाह 57:15)।

अन्त में, हम परमेश्वर की संप्रभुता पर विचार करेंगे (भजन संहिता 71:16; यशायाह 40:10)। परमेश्वर अनन्त है, अनादिकाल से अनन्तकाल तक है (भजन संहिता 90:2)। वह सारे जीवन का स्रोत है (रोमियों 11:33-36)। वह अपनी सृष्टि से स्वतन्त्र है (प्रेरितों के काम 17:24–28)। अब्राहम, शमूएल, यशायाह, दानिय्येल, और दाऊद सभी ने परमेश्वर को अपने प्रभु यहोवा के रूप में स्वीकार किया: “हे यहोवा! हे हमारे मूल पुरुष इस्राएल के परमेश्‍वर! अनादिकाल से अनन्तकाल तक तू धन्य है। हे यहोवा! महिमा, पराक्रम, शोभा, सामर्थ्य और वैभव, तेरा ही है; क्योंकि आकाश और पृथ्वी में जो कुछ है, वह तेरा ही है; हे यहोवा! राज्य तेरा है, और तू सभों के ऊपर मुख्य और महान् ठहरा है। धन और महिमा तेरी ओर से मिलती हैं, और तू सभों के ऊपर प्रभुता करता है। सामर्थ्य और पराक्रम तेरे ही हाथ में हैं, और सब लोगों को बढ़ाना और बल देना तेरे हाथ में है। इसलिये अब हे हमारे परमेश्‍वर! हम तेरा धन्यवाद करते और तेरे महिमायुक्‍त नाम की स्तुति करते हैं” (1 इतिहास 29:10–13 में दाऊद के वचन)। विश्वासी प्रभु परमेश्वर को सम्मान देता है जिसने हमें खरीदा है और आनन्द से उसके अधीन हो जाता है (याकूब 4:7; यहूदा 1:4)।

राजा दाऊद ने परमेश्वर के गुणों के बारे में बताया है कि: “यहोवा राजा है; उसने माहात्म्य का पहिरावा पहिना है; यहोवा पहिरावा पहिने हुए, और सामर्थ्य का फेटा बाँधे है। इस कारण जगत स्थिर है, वह नहीं टलने का। हे यहोवा, तेरी राजगद्दी अनादिकाल से स्थिर है, तू सर्वदा से है...विराजमान यहोवा अधिक महान् है। तेरी चितौनियाँ अति विश्‍वासयोग्य हैं; हे यहोवा, तेरे भवन को युग युग पवित्रता ही शोभा देती है” (भजन संहिता 93:1-2, 4-5)।

परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने के लिए, विश्वास करने वाले कुछ लोगों को विशेषाधिकार दिया गया है कि परमेश्वर उनसे सीधे बात करें। उनमें से कुछ ने इस तरह से उत्तर दिया:

मूसा ने यहोवा परमेश्वर की महिमा को देखने के लिए कहा, और प्रभु परमेश्वर अपनी सारी भलाई के साथ मूसा के आगे से होकर निकलने के लिए सहमत हो गया। “सुन, मेरे पास एक स्थान है, यहाँ तू उस चट्टान पर खड़ा हो; और जब तक मेरा तेज तेरे सामने होकर चलता रहे, तब तक मैं तुझे चट्टान की दरार में रखूँगा और जब तक मैं तेरे सामने से होकर न निकल जाऊँ तब तक अपने हाथ से तुझे ढाँपे रहूँगा” (निर्गमन 33:21–22)। मूसा की प्रतिक्रिया में झुकना और दण्डवत् करना सम्मिलित था (निर्गमन 34:6–8)। मूसा की तरह, विश्वासी झुकेंगे और प्रभु परमेश्वर की आराधना, विस्मय से भरते हुए करेंगे क्योंकि हम उस महिमा का चिंतन करते हैं जो हमारा परमेश्वर है।

अय्यूब ने परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास को कभी नहीं खोया, यहाँ तक कि मन को सबसे अधिक तोड़ देने वाली परिस्थितियों में भी जिसने उसकी परीक्षा उसके मन के भीतरी भाग तक जा कर ली। “वह मुझे घात करेगा, तौभी मैं उसी में आशा रखूँगा; मैं अपनी चाल चलन का पक्ष लूँगा” (अय्यूब 13:15)। जब परमेश्वर ने प्रचण्ड वायु में से होकर बात की, तब अय्यूब को पूरी तरह से चुप करा दिया गया। अय्यूब ने स्वीकार किया कि वह उन बातों के बारे में बात कर रहा है जो उसे समझ में नहीं आईं थीं, उसके लिए ये बातें बहुत ही अधिक अद्भुत थीं। “इसलिये मुझे अपने ऊपर घृणा आती है, और मैं धूल और राख में पश्‍चाताप करता हूँ” (अय्यूब 42:6; की तुलना अय्यूब 42:1-6 से करें)। अय्यूब की तरह ही, परमेश्‍वर के प्रति हमारी प्रतिक्रिया विनम्रता से भरी हुई आज्ञापालन और विश्वास होनी चाहिए, जो उसकी इच्छा के अनुरूप के हो, चाहे हम इसे समझें या नहीं।

यशायाह को सिंहासन पर बैठे हुए प्रभु यहोवा और सारापों का दर्शन मिला, साराप ऊँची आवाज में पुकार रहे थे, “सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है; सारी पृथ्वी उसके तेज से भरपूर है” (यशायाह 6:3)। यह इतना अधिक विस्मित करने वाला दर्शन था कि यशायाह पुकार उठा, “हाय! हाय! मैं नष्‍ट हुआ; क्योंकि मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूँ; और अशुद्ध होंठवाले मनुष्यों के बीच में रहता हूँ, क्योंकि मैं ने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिराज को अपनी आँखों से देखा है” (यशायाह 6:5; की तुलना यशायाह 6:1-5 से करें)। यशायाह को पता चल गया कि वह पवित्र परमेश्वर की उपस्थिति में एक पापी था, और उसकी प्रतिक्रिया पश्चाताप थी। यूहन्ना को प्राप्त हुए स्वर्ग के दर्शन में परमेश्वर के सिंहासन ने उसे बहुत अधिक विस्मित होने के लिए प्रेरित किया। यूहन्ना नीचे गिर गया मानो कि वह महिमा पाए हुए प्रभु के चरणों में मृत हो गया था (प्रकाशितवाक्य 1:17-18)। यशायाह और यूहन्ना की तरह, हमें भी परमेश्वर के वैभव की उपस्थिति में विनम्र होना है।

बाइबल में परमेश्वर के कई अन्य गुणों अर्थात् विशेषताओं को प्रकाशित किया गया है। परमेश्वर की विश्वासयोग्यता हमें उस पर भरोसा करने की ओर ले जाती है। उसका अनुग्रह हमें आभार व्यक्त करने के लिए उकसाता है। उसकी सामर्थ्य विस्मय को उत्पन्न करती है। उसका ज्ञान हमें उस से ज्ञान प्राप्ति के लिए पूछने का कारण बनता है (याकूब 1:5)। जो लोग परमेश्वर को जानते हैं वे पवित्रता और सम्मान के साथ अपने जीवन में कार्य करेंगे (1 थिस्सलुनीकियों 4:4-5)।

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