क्या परमेश्वर पाप कर सकता है? यदि परमेश्वर पाप नहीं कर सकता, तो क्या वह वास्तव में सर्वसामर्थी है?


प्रश्न: क्या परमेश्वर पाप कर सकता है? यदि परमेश्वर पाप नहीं कर सकता, तो क्या वह वास्तव में सर्वसामर्थी है?

उत्तर:
इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, हमें पहले यह विचार करना चाहिए कि परमेश्वर कौन है। मानवीय मन, यद्यपि, पर्याप्त रूप से यदि उसने हमारे लिए विशेष प्रकाशनों को न दिया होता तो इसे नहीं समझ सकता है कि वह कौन है। प्रकाशन का एक तरीका परमेश्वर की सृष्टि के माध्यम से पाया जाता है (भजन संहिता 19:1-6)। सृष्टि की जटिलता, रूपरेखा, और व्यवस्था हमें इस बात को स्वीकार करने के लिए मार्गदर्शन देती है कि कोई एक विस्मित करने वाला है जो इसे अस्तित्व में लाया और इसे बनाए रखता है।

एक और तरीका परमेश्वर के लिखित वचन के माध्यम से पाया जाता है। पवित्रशास्त्र के अंशों से, हम उन गुणों या विशेषताओं का पता लगा सकते हैं, जो परमेश्वर में निहित हैं, इस प्रकार यह हमें उसके चरित्र की एक झलक प्रदान करते हैं। एक धर्मविज्ञानी कहता है कि उसकी विशेषताएँ “उसकी पूर्णताएँ हैं।” उनमें से कुछ: उसकी शाश्वतता (भजन संहिता 90:2); उसकी अपरिवर्तनीयता, या अपरिवर्तनीय गुण (याकूब 1:17); उसका प्रेम (1 यूहन्ना 4:8); उसका सर्वसामर्थी होना, या स्वयं में पूरी तरह सामर्थी होने के नाते, उसका सर्वशक्तिमान होना (प्रकाशितवाक्य 1:8); उसकी सर्वव्यापकता, या हर समय हर स्थान पर विद्यमान रहना (भजन संहिता 139:7-11); पवित्रता, परम शुद्धता और बुराई से अलग होना (हबक्कूक 1:13); उसकी धार्मिकता या न्यायी होना (भजन संहिता 11:7); और उसका सत्य (तीतुस 1:2) होना इत्यादि हैं।

यह परमेश्वर का एक संक्षिप्त चित्र है, जिसने तीन व्यक्तियों, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रूप में, और गुण, या पूर्णता में स्वयं को प्रकट किया है, जो ईश्वरत्व के प्रत्येक सदस्य के लिए सत्य हैं। क्योंकि परमेश्वर पवित्र, धर्मी और सत्य है, और वह स्वयं के साथ कुछ भी असंगत नहीं कर सकता है, इसलिए हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि परमेश्वर पाप नहीं कर सकता है। चूँकि पवित्रता, धार्मिकता और परमेश्वर की अन्य पूर्णताएँ ऐसे गुण हैं जो स्वयं परमेश्वर के हैं, यदि परमेश्वर पाप करता है, तो वह परमेश्वर होने से रुक जाएगा। सच्चाई यह है कि परमेश्वर “पवित्र, पवित्र, पवित्र” है जो उसे ऐसा कुछ भी करने से रोकता है जो अपवित्र है, अर्थात् पाप से भरा हुआ है।

यद्यपि, हम इस अद्भुत तथ्य को समझे बिना समाप्त नहीं कर सकते कि हमारे पवित्र परमेश्वर ने मानव जाति के पाप में स्वयं को सम्मिलित किया। उसने पाप का दण्ड देने के लिए अपने एक और एकमात्र पुत्र को इस पृथ्वी पर भेजा। “इसलिये कि मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दु:ख उठाया, ताकि हमें परमेश्‍वर के पास पहुँचाए; वह शरीर के भाव से तो घात किया गया, पर आत्मा के भाव से जिलाया गया” (1 पतरस 3:18)। “वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिये हुए क्रूस पर चढ़ गया, जिससे हम पापों के लिये मरकर धार्मिकता के लिये जीवन बिताएँ : उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए” (1 पतरस 2:24)। “इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्‍वर की महिमा से रहित हैं, परन्तु उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं। उसे परमेश्‍वर ने उसके लहू के कारण एक ऐसा प्रायश्‍चित ठहराया, जो विश्‍वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहले किए गए और जिन पर परमेश्‍वर ने अपनी सहनशीलता के कारण ध्यान नहीं दिया। उनके विषय में वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे” (रोमियों 3:23-25)।

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