क्या परमेश्वर झूठ बोल सकता है?


प्रश्न: क्या परमेश्वर झूठ बोल सकता है?

उत्तर:
परमेश्वर पवित्र है (यशायाह 6:3), और यही गुण उसके लिए झूठ बोलने को असम्भव बनाता है। परमेश्वर की पवित्रता उसकी नैतिक और आचार सम्बन्धी पूर्णता है, यह उसकी पूर्ण अखण्डता है जो उसे उसके सभी प्राणियों से अलग करती है। इस तरह परमेश्वर की पवित्रता उसकी श्रेष्ठता से सम्बन्धित है। परमेश्वर पवित्रता के किसी भी मापदण्ड के अनुरूप नहीं है; वह स्वयं ही मापदण्ड है। परमेश्वर असीमित शुद्धता के साथ पूर्णतया पवित्र है जो कि परिवर्तित होने में असमर्थ है। परमेश्‍वर की पवित्रता के कारण, जब परमेश्वर बोलता है, तो वह झूठ नहीं बोल सकता है। वह कभी धोखा नहीं देता; वह जो कहता या करता है यह उसे कभी विकृत या गलत प्रस्तुत नहीं करता है। झूठ बोलना उसके स्वभाव के विरुद्ध है।

क्योंकि परमेश्वर झूठ नहीं बोल सकता, परमेश्वर का वचन, बाइबल पूरी तरह से भरोसे के योग्य है (1 राजा 8:56; भजन संहिता 119:160)। “परमेश्‍वर का एक एक वचन ताया हुआ है,” (नीतिवचन 30:5)। परमेश्वर का चरित्र और उसके चरित्र से होने वाला संचार, इस संसार की किसी भी चीज़ की तुलना में शुद्ध होता है: “परमेश्‍वर का वचन पवित्र है, उस चाँदी के समान जो भट्ठी में मिट्टी पर ताई गई, और सात बार निर्मल की गई हो” (भजन संहिता 12:6)।

उत्पत्ति 12 में अब्राहम के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा का आधार स्वयं परमेश्वर का अपरिवर्तनीय स्वभाव था; इसका अर्थ यह है कि, परमेश्वर की चट्टान-जैसी ठोस विशेषता वह सब कुछ कहती है जिसे वह पूरी तरह से विश्वसनीय बनाता है: “परमेश्‍वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा करते समय जब शपथ खाने के लिये किसी को अपने से बड़ा न पाया, तो अपनी ही शपथ खाकर कहा, ‘मैं सचमुच तुझे बहुत आशीष दूँगा, और तेरी सन्तान को बढ़ाता जाऊँगा’“ (इब्रानियों 6:13-14)। मूलपाठ इस कथन के साथ आगे बढ़ता है कि “परमेश्‍वर का झूठा ठहरना अनहोना है” (इब्रानियों 6:18)।

यदि परमेश्वर झूठ बोल सकता, तो वह श्रेष्ठ नहीं होगा; वास्तव में, वह हमारे ही जैसा होगा — मनुष्य में सच्चाई को छिपाने, गलत तरीके से प्रस्तुत करने और विकृत करने की ख्याति पाई जाती है। परन्तु “ईश्‍वर मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और न वह आदमी है कि अपनी इच्छा बदले। क्या जो कुछ उसने कहा उसे न करे? क्या वह वचन देकर उसे पूरा न करे? “(गिनती 23:19)।

आरम्भ से ही, परमेश्वर ने उस पर विश्वास किया है (उत्पत्ति 15:6; इब्रानियों 11:6)। विश्वास, या भरोसा, केवल तभी एक अच्छी बात हो सकती है यदि उसकी विषय वस्तु विश्वास के योग्य हो। एक अविश्वासयोग्य व्यक्ति या वस्तु में विश्वास करना नुकसान से भरा हुआ होता है। यदि परमेश्वर झूठ बोल सकता, तो उसके शब्दों पर सन्देह होगा, और वह हमारे भरोसे के योग्य नहीं होगा। परन्तु, जैसा कि वह है, वह पूरी तरह से भरोसे के योग्य है: “सच्‍चाई और न्याय उसके हाथों के काम हैं; उसके सब उपदेश विश्‍वासयोग्य हैं”(भजन संहिता 111:7)।

यीशु, जिसमें “परमेश्वर का स्वभाव” है (फिलिप्पियों 2:6), “अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण है” (यूहन्ना 1:14)। यीशु ने जो कुछ कहा और सिखाया वह पूर्ण सत्य था। उसने जो कुछ भी किया वह सत्य को दर्शाता है। पीलातुस जैसे लोग सदैव सत्य (यूहन्ना 18:38) के प्रति भ्रमित रहेंगे, परन्तु यीशु “सत्य की गवाही देने” आया था (वचन 37)। यीशु वास्तव में स्वयं सत्य हैं (यूहन्ना 14:6)। यीशु झूठ नहीं बोल सकता क्योंकि परमेश्वर झूठ नहीं बोल सकता, “और जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द [यीशु की आवाज़] सुनता है” (यूहन्ना 18:37, बीएसआई हिन्दी बाइबल)।

परमेश्वर, जो झूठ नहीं बोल सकता, वह सर्वोच्च नैतिक शुद्धता है। वह अपनी सन्तान में भी नैतिक शुद्धता को चाहता है। परमेश्वर झूठ नहीं बोल सकता, और मसीह के अनुयायियों को झूठ नहीं बोलना चाहिए: “इस कारण झूठ बोलना छोड़कर हर एक अपने पड़ोसी से सच बोले, क्योंकि हम आपस में एक दूसरे के अंग हैं” (इफिसियों 4:25)। “हे परमेश्‍वर तेरे तम्बू में कौन रहेगा?” भजन संहिता का लेखक पूछता है। उत्तर, का एक भाग यह है कि, परमेश्वर “उसके साथ है.. जो हृदय से सच बोलता है”(भजन संहिता 15:2)। परमेश्वर की तरह हमें भी सच्चाई से प्रेम करना चाहिए।

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