बाइबल के साहित्य के विभिन्न रूप क्या है?


प्रश्न: बाइबल के साहित्य के विभिन्न रूप क्या है?

उत्तर:
बाइबल के बारे में सबसे दिलचस्प तथ्यों में से एक यह है, कि जबकि यह परमेश्‍वर का संवाद है (मत्ती 5:17; मरकुस 13:31; लूका 1:37; प्रकाशितवाक्य 22:18-19), तथापि मनुष्य लेखन प्रक्रिया के अंश थे। जैसा कि इब्रानियों 1:1 कहता है, "पूर्व युग में परमेश्‍वर ने बापदादों से थोड़ा थोड़ा करके और भाँति-भाँति से भविष्यद्वक्‍ताओं के द्वारा बातें की।" वाक्यांश "भाँति-भाँति" में विभिन्न साहित्यिक शैलियाँ सम्मिलित हैं। बाइबल के मानवीय लेखकों ने भिन्न-भिन्न सन्देशों को भिन्न-भिन्न समय पर संवाद करने के लिए साहित्य के भिन्न-भिन्न रूपों का उपयोग किया।

बाइबल में ऐतिहासिक साहित्य (1 और 2 राजा), नाटकीय साहित्य (अय्यूब), कानूनी दस्तावेज (निर्गमन और व्यवस्था का अधिकांश भाग), गीत काव्य साहित्य (सुलैमान के गीत अर्थात् श्रेष्ठगीत और भजन संहिता), भविष्यद्वाणी साहित्य (अधिकांश यशायाह), ज्ञान अर्थात् प्रज्ञा साहित्य (नीतिवचन और सभोपदेशक), प्रकाशनात्मक साहित्य (प्रकाशितवाक्य और दानिय्येल के कुछ अंश), लघु कथाएँ (रूत), उपदेश (प्रेरितों के काम में लिपिबद्ध किए हुए), भाषण और घोषणाएँ (दानिय्येल में राजा नबूकदनेस्सर की जैसी), प्रार्थनाएँ (भजन संहिता के कई भजनों में), दृष्टान्त (जैसे जैसा कि यीशु ने बताया), तथ्य (जैसे कि योताम ने कहा), और पत्र (इफिसियों और रोमियों) इत्यादि पाए जाते हैं।

विभिन्न शैलियाँ परस्पर एक दूसरे में व्याप्त हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, भजन संहिता के भजनों में से कई भी प्रार्थनाएँ पाई जाती हैं। कुछ पत्रों में कविताएँ पाई जाती हैं। प्रत्येक प्रकार के साहित्य में अद्वितीय विशेषताएँ होती हैं और इसलिए उन तक उचित विचार से पहुँचा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, योताम की कहानी (न्यायियों 9:7-15) की व्याख्या उसी तरह से नहीं की जा सकती है, जैसे दस आज्ञाओं (निर्गमन 20:1-17) की व्याख्या की जा सकती है। ऐतिहासिक कहानी की व्याख्या करनी रूपक और काव्य साहित्य की पद्धतियों की व्याख्या के लिए निर्भर होने वाली पद्धित से भिन्न होती है।

दूसरा पतरस 1:21 कहता है कि "भक्‍त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्‍वर की ओर से बोलते थे।" आज की शब्दावली का उपयोग करके हम कह सकते हैं कि बाइबल का प्रबन्ध सम्पादक परमेश्‍वर का पवित्र आत्मा था। परमेश्‍वर ने बाइबल की 66 पुस्तकों में से प्रत्येक के ऊपर अपनी लेखनी के चिन्ह को रखा, फिर यह चाहे साहित्यिक शैली ही क्यों न हो। परमेश्‍वर ने लिखित शब्दों को "श्‍वास" दिया (2 तीमुथियुस 3:16-17)। क्योंकि मानवीय जाति में साहित्य के विभिन्न रूपों को समझने और उनकी सराहना करने की क्षमता है, इसलिए परमेश्‍वर ने अपने वचन का संवाद करने के लिए कई शैलियों का उपयोग किया। बाइबल के पाठक एक सामान्य उद्देश्य को खोजेंगे जो संग्रह के अंशों को एक कर देता है। वह मंशा, प्रतिछाया, दोहराए गए विषयों और पुनरावर्ती होने के लिए पात्रों की खोज करेगा। इसके माध्यम से, वह पाएगा कि बाइबल संसार की सबसे महान साहित्यिक उत्कृष्ट कृति है — और यही परमेश्‍वर का वचन है।

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