बाइबल का व्याख्याशास्त्र क्या है?


प्रश्न: बाइबल का व्याख्याशास्त्र क्या है?

उत्तर:
बाइबल का व्याख्याशास्त्र या अर्थानुवाद विज्ञान बाइबल के पाठ को समझने के सिद्धान्तों और विधियों का अध्ययन है। दूसरा तीमुथियुस 2:15 विश्‍वासियों को व्याख्याशास्त्र में सम्मिलित होने का आदेश देता है: "अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्जित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो।" बाइबल के व्याख्याशास्त्र का उद्देश्य हमें यह जानने में सहायता प्रदान करना है कि बाइबल की सही व्याख्या कैसे करें, इसे कैसे समझें और इसे कैसे जीवन में लागू करें।

बाइबल के व्याख्याशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि बाइबल की व्याख्या शाब्दिक रूप से की जानी चाहिए। हम बाइबल को अपने सामान्य या सादे अर्थ में समझना चाहते हैं, जब तक कि सन्दर्भ स्पष्ट रूप से प्रतीकात्मक होने की मंशा न रखता हो या भाषण देने वाले पात्र पहले से ही निर्धारित नहीं किए गए हों। बाइबल कहती है कि इसका क्या अर्थ है और इसका अर्थ यह होता है कि यह क्या कहता है। उदाहरण के लिए, जब यीशु मरकुस 8:19 में "पाँच हजार" लोगों को भोजन खिलाए जाने की बात करता है, तो व्याख्याशास्त्र के नियम में कहा गया है कि हमें इसे पाँच हजार ही वास्तव में समझना चाहिए- वहाँ पर भूखे लोगों की भीड़ थी, जो गिनती में पाँच हजार थे, जिन्हें वास्तविक रोटी और मछली से एक आश्‍चर्यकर्म-कार्य करने वाले उद्धारकर्ता के द्वारा भोजन खिलाया गया था। गिनती को "आत्मिक" बनाने या शाब्दिक रूप से आश्‍चर्यकर्म के न होने से इन्कार करने का कोई भी प्रयास पाठ के साथ अन्याय करना और भाषा के उद्देश्य को अनदेखा करना है, जो इसे इसी तरह से बताना चाहता है। कुछ अनुवादक पवित्रशास्त्र की रेखाओं के बीच में से पढ़ने के प्रयास में गलती करते हैं, जो गूढ़ अर्थों के साथ आते हैं, परन्तु जो वास्तव में मूलपाठ में नहीं हैं, जैसे कि प्रत्येक सन्दर्भ में एक गुप्त आत्मिक सत्य है, जिसे हमें साधारण भाषा में बताने का प्रयास करना चाहिए। बाइबल का व्याख्याशास्त्र हमें पवित्रशास्त्र के इच्छित अर्थ और बाइबल के सन्दर्भों को रूपरेखा के प्रति विश्‍वासयोग्य बनाए रखता है, जिन्हें शाब्दिक रूप से समझा जाना चाहिए।

बाइबल के व्याख्याशास्त्र का दूसरा महत्वपूर्ण नियम यह है कि सन्दर्भों को उनके ऐतिहासिक, व्याकरणिक और प्रासंगिक रूप के अनुसार ही व्याख्या किया जाना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से एक सन्दर्भ की व्याख्या करने का अर्थ यह है कि हमें उसकी संस्कृति, पृष्ठभूमि और परिस्थिति को समझने की आवश्यकता है, जो मूलपाठ को प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए, योना 1:1-3 में योना के भाग जाने को पूरी तरह से समझने के लिए, हमें इस्राएलियों से सम्बन्धित अश्शूरियों के इतिहास की शोध करनी चाहिए। एक सन्दर्भ की व्याख्या करने के लिए व्याकरण के नियमों का पालन करना चाहिए और इब्रानी और यूनानी भाषा की बारीकियों को पहचानना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, जब पौलुस तीतुस 2:13 में "अपने महान परमेश्‍वर और उद्धारकर्ता, यीशु मसीह" के बारे में लिखता है, तो व्याकरण के नियमों के अनुसार कि परमेश्‍वर और उद्धारकर्ता समानांतर शब्द हैं और वे दोनों ही यीशु मसीह के अर्थ को देने का आग्रह कर रहे हैं — दूसरे शब्दों में, पौलुस स्पष्ट रूप से यीशु को "अपना महान परमेश्‍वर" कहता है। एक सन्दर्भ को व्याख्या करने में अर्थात् अर्थ निर्धारित करने का प्रयास करते समय एक अनुच्छेद या वचन के सन्दर्भ के ऊपर विचार करना भी सम्मिलित है। सन्दर्भ में अध्याय, पुस्तक, और, सबसे व्यापक रूप में, पूरी बाइबल के तुरन्त बाद और पहले आने वाले सन्दर्भ भी सम्मिलित हैं। उदाहरण के लिए, सभोपदेश की पुस्तक में कई उलझा देने वाले कथन तब स्पष्ट हो जाते हैं, जब उन्हें उनके सन्दर्भ में रखा जाता है- सभोपदेशक की पुस्तक पृथ्वी पर "सूर्य के नीचे" के दृष्टिकोण से लिखी गई है (सभोपदेशक 1:3)। वास्तव में, इस पुस्तक में सूर्य के नीचे अर्थात् धरती पर वाक्यांश लगभग तीस बार दोहराया गया है, जो इस संसार में "व्यर्थता" के सन्दर्भ को स्थापित करता है।

बाइबल के व्याख्याशास्त्र का तीसरा नियम यह है कि पवित्रशास्त्र सदैव पवित्रशास्त्र का सबसे अच्छा अनुवादक है। इस कारण से, हम सदैव सन्दर्भ के अर्थ को निर्धारित करने का प्रयास करते समय पवित्रशास्त्र के साथ पवित्रशास्त्र की तुलना करते हैं। उदाहरण के लिए, यशायाह के द्वारा यहूदा की ओर से मिस्र से सहायता लेने और उनके घोड़ों पर निर्भरता के लिए दी गई ताड़ना (यशायाह 31:1) की प्रेरणा, कुछ सीमा तक, परमेश्‍वर की ओर से दिए गए स्पष्ट आदेश से थी कि उसके लोग घोड़ों की खोज में मिस्र नहीं जाएंगे (व्यवस्थाविवरण 17:16 )।

कुछ लोग बाइबल के व्याख्याशास्त्र का अध्ययन करने से बचते हैं, क्योंकि वे गलती से यह मानते हैं कि यह परमेश्‍वर के वचन से नई सच्चाइयों को सीखने की क्षमता को सीमित कर देगा या पवित्र आत्मा की पवित्रशास्त्र को प्रकाशित करने को बाधित करेगा। परन्तु उनका भय निराधार हैं। बाइबल का व्याख्याशास्त्र प्रेरित मूलपाठ की सही व्याख्या की खोज करने के बारे में है। बाइबल के व्याख्याशास्त्र का उद्देश्य हमें पवित्रशास्त्र को गलत तरीके से लागू करने या अपने पूर्वाग्रह को सच्चाई की समझ में रंग देने की अनुमति देना है। परमेश्‍वर का वचन सत्य है (यूहन्ना 17:17)। हम सच्चाई को देखना चाहते हैं, सच्चाई को जान सकते हैं, और सच्चाई के अनुसार अपने सर्वोत्तम प्रयास में जीवन यापन कर सकते हैं, और यही कारण है कि बाइबल का व्याख्याशास्त्र महत्वपूर्ण हैं।

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