पीड़ा के बारे में बाइबल क्या कहती है?



प्रश्न: पीड़ा के बारे में बाइबल क्या कहती है?

उत्तर:
शब्द "पीड़ा" या इसके कुछ रूप पवित्रशास्त्र में 70 से अधिक बार दिखाई देते हैं। इस शब्द का सबसे पहला प्रयोग प्रसव में पीड़ा की उत्पत्ति की व्याख्या करता है: "फिर स्त्री से उसने कहा, 'मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊँगा, तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी और वह तुझ पर प्रभुता करेगा'" (उत्पत्ति 3:16)। यहाँ पर सन्दर्भ यह है कि आदम और हव्वा ने पाप किया है और प्रसव की पीड़ा पाप के परिणामों में से एक है। पाप के कारण, पूरी भूमि शापित हो गई और परिणामस्वरूप मृत्यु ने इस संसार में प्रवेश किया (रोमियों 5:12)। इसलिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पीड़ा मूल पाप के कई परिणामों में से एक है।

जबकि बाइबल में विशेष रूप से यह नहीं बताया गया है, तथापि हम चिकित्सा विज्ञान से जानते हैं कि पीड़ा एक उपहार है। इसके बिना हमें पता ही नहीं होता कि हमें चिकित्सीय परामर्श की आवश्यकता थी। वास्तव में, पीड़ा का अभाव कुष्ठ रोग से जुड़ी हुई समस्याओं में से एक है। बच्चे कभी नहीं सीखेंगे कि गर्म स्टोव को स्पर्श करना एक बुरा विचार है, न ही हम इसके साथ जुड़ी हुई पीड़ा के बिना एक खतरनाक चिकित्सा स्थिति के प्रति सतर्क रहेंगे। आत्मिक रीति से बोलना, पीड़ा के कई लाभों में से एक याकूब के द्वारा व्यक्त किया गया है: "हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरा आनन्द की बात समझो, यह जानकर कि तुम्हारे विश्‍वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है" (याकूब 1:2-3)। याकूब के अनुसार, जब हम पीड़ादायक परीक्षाओं को धैर्य के साथ सहन करते हैं, तो हम यह जानकर आनन्द प्राप्त कर सकते हैं कि परमेश्‍वर हमारे साथ धैर्य के साथ और मसीह की जैसे चरित्र को बनाने के लिए काम कर रहा है। यह मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक पीड़ा के साथ ही शारीरिक पीड़ा पर भी लागू होता है।

पीड़ा साथ ही परमेश्‍वर के अनुग्रह का अनुभव करने के लिए एक अवसर को भी प्रदान करती है। जो कुछ पौलुस ने कहा है, उसके ऊपर विचार करें: "पर उसने मुझ से कहा, 'मेरा अनुग्रह ही तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।' इसलिये मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूँगा कि मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया करती रहे" (2 कुरिन्थियों 12:9)। पौलुस "शरीर में चुभाए हुए काँटे" के बारे में बात कर रहा है, जो उसे परेशान कर रहा था। हम नहीं जानते कि यह क्या था, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह पौलुस के लिए दर्दनाक रहा है। उसने यह स्वीकार किया कि परमेश्‍वर का अनुग्रह उसे इसलिए दिया जा रहा था कि वह इसे सह सके। परमेश्‍वर अपनी सन्तान को पीड़ा को सहन करने के लिए अनुग्रह प्रदान करता है।

परन्तु सच्चा शुभ सन्देश यह है कि यीशु हमारे स्थान पर हमारे पापों के लिए मर गया है: "इसलिए कि मसीह ने भी अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने, पापों के कारण एक ही बार दु:ख उठाया; वह शरीर के भाव से तो घात किया गया, पर आत्मा के भाव से जिलाया गया" (1 पतरस 3:18)। यीशु मसीह में विश्‍वास करने के द्वारा, परमेश्‍वर विश्‍वासी को अनन्तकालीन जीवन और उन सभी आशीषों को प्रदान करता है, जो इसमें सम्मिलित हैं। जिनमें से एक "वह उनकी आँखों के सभी आँसू पोंछ डालेगा और इसके बाद मृत्यु न रहेगी और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी, पहली बातें जाती रहीं" (प्रकाशितवाक्य 21:4)। जिस पीड़ा को हम अनुभव करते हैं, वह इस पतित, पाप-के-द्वारा-शापित संसार में जीवन यापन करते समय स्वाभाविक हिस्सा है, यह उन लोगों के लिए अतीत की बात हो जाएगी, जो मसीह के ऊपर विश्‍वास के द्वारा, उसके साथ स्वर्ग में अनन्त काल का जीवन व्यतीत करते हैं।

संक्षेप में, यद्यपि पीड़ा सुखद नहीं है, तथापि हमें इसके लिए परमेश्‍वर को धन्यवाद देना चाहिए, क्योंकि यह हमें चेतावनी देती है कि हमारे शरीर में कुछ गलत है। साथ ही, यह हमें पाप के भयानक परिणाम को प्रतिबिम्बित करने और हमारे लिए उद्धार होने के लिए एक मार्ग बनाने के लिए परमेश्‍वर के प्रति बहुत अधिक आभारी बना देती है। जब कोई पीड़ा में होता है, तो यह समझने का एक उत्कृष्ट समय है कि यीशु ने हमारी ओर से अत्यधिक कष्टदायी भावनात्मक और शारीरिक पीड़ा का सामना किया। ऐसी कोई पीड़ा नहीं है, जिससे यीशु के क्रूस के ऊपर चढ़ने की भयावह घटनाओं की तुलना की जा सके, और उसने हमें अपने पापों को छुड़ाने और अपने पिता की महिमा करने के लिए स्वेच्छा से उस पीड़ा का सामना किया।

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