समाज पर बाइबल का कितना अधिक प्रभाव होना चाहिए?


प्रश्न: समाज पर बाइबल का कितना अधिक प्रभाव होना चाहिए?

उत्तर:
यह विषय सदैव से ही रहा है कि परमेश्‍वर का वचन उन संस्कृतियों में एक भिन्नता को ले आती है, जहाँ इसका परिचय कराया जाता है। पहली शताब्दी में थिस्सलुनीके में, एक भीड़ ने सड़कों के ऊपर कुछ मसीही विश्‍वासियों को घसीटते हुए लाते हुए चिल्ला कर कह रहे थे कि, "ये लोग जिन्होंने जगत को उलटा पुलटा कर दिया है, यहाँ भी आ गए हैं" (प्रेरितों के काम 17:6, बी एस आई हिन्दी बाइबल)। यह केवल सही बात है कि बाइबल का समाज पर प्रभाव होना चाहिए, क्योंकि इसका समाज में रहने वाले व्यक्तियों पर प्रभाव पड़ता है।

परमेश्‍वर संसार और मनुष्य जो इसमें रहते हैं, उनका सृष्टिकर्ता है (उत्पत्ति 1)। आरम्भ से ही, परमेश्‍वर ने संसार और लोगों को एक निश्‍चित तरीके से "कार्य" करने के लिए सृजा किया। जब समाज उन सिद्धान्तों का पालन नहीं करता है, जो परमेश्‍वर ने हमें बाइबल में दिए हैं, तो जीवन भी काम नहीं करता है। परमेश्‍वर ही एकमात्र ऐसी अन्तर्दृष्टि के साथ है कि जीवन हमारे सर्वोत्तम लाभ के लिए कैसे कार्य करे और इसके लिए वह उसके वचन के द्वारा हमारे साथ उस ज्ञान को साझा करता है। बाइबल का वर्णन इब्रानियों 4:12 में "जीवित और प्रबल" के रूप में किया गया है। इसका अर्थ है कि, बाइबल आज भी जीवन में लागू किए जाने के लिए और प्रासंगिक है, क्योंकि यह सबसे पहले लिखी गई थी।

जब कोई राष्ट्र परमेश्‍वर का सम्मान करता है, तो यह परमेश्‍वर की सारी सृष्टि के लिए सम्मान को विकसित करता है। जहाँ परमेश्‍वर का कोई सम्मान नहीं है, वहाँ एक समाज उसकी सृष्टि का सम्मान करने में भी असफल हो जाएगी, और परिणामस्वरूप लोग दु:ख उठाएँगे।

आरम्भ से ही, लोगों के पास एक विकल्प था कि परमेश्‍वर के मार्ग का पालन करना है या नहीं। परन्तु विकल्प सदैव परिणामों को लाते हैं। पुराना नियम में दिया हुआ इस्राएल का इतिहास सामाजिक व्यवस्था और धारणाओं को लिपिबद्ध करता है और जिन्हें परमेश्‍वर ने उन्हें दिया था। जब इस्राएल परमेश्‍वर की व्यवस्था पर बना रहता था, तब उसका समाज अच्छी रीति से कार्य करता था, परन्तु जब वह परमेश्‍वर के रूपरेखित तरीके से विचलित हो जाते थे, तो उनका समाज सदैव गर्त की ओर चला जाता था। आज समाज से बाइबल के प्रभाव को दूर करने के लिए या बाइबल के वैश्विक दृष्टिकोण को कम करने के प्रयासों से मानव जाति का घमण्ड प्रकट होता है, जो कहता है, "हम जिसने हमें बनाया है उससे कहीं अधिक अच्छी रीति से जानते हैं।"

इनमें से कोई भी यह नहीं कहता है कि हमें प्राचीन इस्राएल जैसे लोकतंत्र को स्थापित करना चाहिए। सरकार की उस पद्धति में परमेश्‍वर के उद्देश्य एक निश्‍चित समय और स्थान के लिए थे। यद्यपि, जब बाइबल को सही तरीके से समझा जाता है, तो समाज पर इसका प्रभाव केवल कम अपराध, कम तलाक, कम आलस्य, और अधिक दान देने का कारण बन सकता है। जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के दूसरे राष्ट्रपति जॉन एडम्स ने लिखा है कि, "मान लीजिए कि कुछ दूर के क्षेत्र में एक राष्ट्र अपने एकमात्र कानून के रूप में बाइबल की पुस्तक को अपना लेता है और प्रत्येक सदस्य को उसके द्वारा दिए गए नियमों के द्वारा अपने आचरण को नियन्त्रित करने के लिए कहता है! प्रत्येक सदस्य अपने विवेक, स्वभाव, मितव्ययिता और व्यवसाय; और अपने साथियों के प्रति न्याय प्रियता, दयालुता और दान देने के लिए; और सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर की ओर पवित्रता, प्रेम और सम्मान के लिए इन नियमों को पालन करने के लिए मजबूर होगा. . . तब यह कितना बड़ा आदर्शलोक होगा, वह क्षेत्र एक स्वर्ग बन जाएगा" (जॉन एडम्स की डायरी और आत्मकथा, खण्ड — 3, पृष्ठ 9)। पवित्रशास्त्र अपने सबसे अच्छा रूप में ऐसे कहता है: "क्या ही धन्य है वह जाति जिसका परमेश्‍वर यहोवा है" (भजन संहिता 33:12)।

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